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रवींद्र जन्मोत्सव पर हुई राष्ट्रीय संगोष्ठि।
Updated Mon, 07 May 2018 01:44 AM IST
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नैनीताल। शांति निकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालय और रामगढ़ की स्थानीय जनता के सहयोग से दो दिवसीय रवीन्द्र नाथ टैगोर जन्मोत्सव का शुभारंभ वृंदावन ऑचर्ड मल्ला रामगढ़ में हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल और उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. सविता मोहन ने किया।
मुख्य अतिथि प्रो. डीके नौड़ियाल ने कहा कि गुरुदेव ने मानवीय संवेदना की जो सूक्ष्म विवेचना की है वह दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि कुमाऊं की धरती में एक खास बात है कि यह महापुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। उन्होंने रामगढ़ को साहित्यिक और सांस्कृतिक नगरी के रूप में विकसित करने के लिए एक स्वायत्त संस्था की स्थापना की जरूरत बताई, जो इस दिशा में कार्य करें।
उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. सविता मोहन ने शांति निकेतन से जुड़े संस्मरण बताते हुए कहा कि 1982 में 21 दिन के शांति निकेतन प्रवास से उनके जीवन को एक नई ऊर्जा मिली। उन्होंने रवीन्द्र नाथ दर्शन पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गुरुदेव को अब तक केवल एक साहित्यकार के रूप में ही जाना जाता रहा है, जबकि मूल रूप से गुरुदेव एक शिक्षक और शिक्षाविद् थे। तभी तो उन्होंने तीन-तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना की। जिनका आधार सृजनशीलता, प्रकृति और मातृभाषा या मातृभूमि था।
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विशिष्ट अतिथि पूर्व विदेश सचिव शशांक शेखर ने कहा कि रवीन्द्र नाथ टैगोर एक ऐसा व्यक्तित्व थे जिन्होंने पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकीकरण के लिए सर्वप्रथम प्रयास किए। विदेश में जितना सम्मान टैगोर और महात्मा गांधी को दिया जाता है उसके पीछे उनके मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन दर्शन का हाथ है।
रामानुजम कालेज दिल्ली की डॉ. मधुबत्रा ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया और गुरुदेव के रामगढ़ पर आधारित एक परियोजना प्रस्तुत की।
कार्यक्रम आयोजक प्रो. अतुल जोशी ने रवीन्द्र जन्मोत्सव की पृष्ठभूमि और रूपरेखा प्रस्तुत की। सत्र की अध्यक्षता देवेन्द्र ढैला, संचालन केके पांडे ने किया।
इस मौके पर डॉ. प्रभा पंत, आर के कोठारी, डॉ. एसके पांडे, बीके जोशी, डॉ. दीप चौधरी, देवेंद्र बिष्ट, डॉ. एसडी तिवारी, डॉ. एके उनियाल, हेमंत डालाकोटी, मोहन जोशी, सुरेश डालाकोटी, महिमा जोशी आदि ने विचार रखे।
‘कुमाऊं की धरती महापुरुषों को करती है आकर्षित’
रामगढ़ में रवींद्र जन्मोत्सव पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
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मुख्य अतिथि प्रो. डीके नौड़ियाल ने कहा कि गुरुदेव ने मानवीय संवेदना की जो सूक्ष्म विवेचना की है वह दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि कुमाऊं की धरती में एक खास बात है कि यह महापुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। उन्होंने रामगढ़ को साहित्यिक और सांस्कृतिक नगरी के रूप में विकसित करने के लिए एक स्वायत्त संस्था की स्थापना की जरूरत बताई, जो इस दिशा में कार्य करें।
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उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. सविता मोहन ने शांति निकेतन से जुड़े संस्मरण बताते हुए कहा कि 1982 में 21 दिन के शांति निकेतन प्रवास से उनके जीवन को एक नई ऊर्जा मिली। उन्होंने रवीन्द्र नाथ दर्शन पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गुरुदेव को अब तक केवल एक साहित्यकार के रूप में ही जाना जाता रहा है, जबकि मूल रूप से गुरुदेव एक शिक्षक और शिक्षाविद् थे। तभी तो उन्होंने तीन-तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना की। जिनका आधार सृजनशीलता, प्रकृति और मातृभाषा या मातृभूमि था।
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विशिष्ट अतिथि पूर्व विदेश सचिव शशांक शेखर ने कहा कि रवीन्द्र नाथ टैगोर एक ऐसा व्यक्तित्व थे जिन्होंने पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकीकरण के लिए सर्वप्रथम प्रयास किए। विदेश में जितना सम्मान टैगोर और महात्मा गांधी को दिया जाता है उसके पीछे उनके मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन दर्शन का हाथ है।
रामानुजम कालेज दिल्ली की डॉ. मधुबत्रा ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया और गुरुदेव के रामगढ़ पर आधारित एक परियोजना प्रस्तुत की।
कार्यक्रम आयोजक प्रो. अतुल जोशी ने रवीन्द्र जन्मोत्सव की पृष्ठभूमि और रूपरेखा प्रस्तुत की। सत्र की अध्यक्षता देवेन्द्र ढैला, संचालन केके पांडे ने किया।
इस मौके पर डॉ. प्रभा पंत, आर के कोठारी, डॉ. एसके पांडे, बीके जोशी, डॉ. दीप चौधरी, देवेंद्र बिष्ट, डॉ. एसडी तिवारी, डॉ. एके उनियाल, हेमंत डालाकोटी, मोहन जोशी, सुरेश डालाकोटी, महिमा जोशी आदि ने विचार रखे।
‘कुमाऊं की धरती महापुरुषों को करती है आकर्षित’
रामगढ़ में रवींद्र जन्मोत्सव पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन