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आश्रम से निकाले गए थे आसाराम, प्रवेश पर था प्रतिबंध
अमर उजाला, गिरीश रंजन तिवारी, नैनीताल
Updated Tue, 03 Sep 2013 10:07 AM IST
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विवादित संत आसाराम की प्रारंभिक दीक्षा और आध्यात्मिक सफर नैनीताल से शुरू हुआ था।
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हालांकि जिन गुरु लीला शाह के सानिध्य में उन्होंने जप-तप और समाज सेवा की दीक्षा ली थी उन्हीं ने आसाराम (आसूमल) को आश्रम से बाहर कर दिया था।
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आश्रम में आसाराम के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। नब्बे के दशक में आसाराम के चेलों ने फिर आश्रम में डेरा डाल दिया था। तब प्रबंधकों ने उनके आश्रम में निवास पर प्रतिबंध लगा दिया।
कभी कोई शिष्य नहीं था
लीला शाह आश्रम में आज भी आसाराम के चेले आते रहते हैं। सच्चाई यह है कि जिस संत लीला शाह को आसाराम अपना गुरु बताते हैं, उनका कभी कोई शिष्य नहीं था। उन्होंने आसाराम को कभी अपना शिष्य नहीं स्वीकारा था।
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स्वामी जी को अपना गुरु बताते हैं
नैनीताल में आश्रम की तमन्ना आसाराम के पुत्र नारायण सांई ने पूरी की। उसने मंगोली में हाल ही में एक आश्रम बनाया है। नैनीताल में हनुमानगढ़ी के निकट स्वामी लीला शाह का आश्रम है।
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आसाराम स्वामी जी को अपना गुरु बताते हैं। लीला शाह ने इस आश्रम की स्थापना 1940 में की थी। वह प्रतिवर्ष गर्मियों में तीन माह यहां तप और साधना करते थे। 1960 से यहां आसूमल का आना शरू हुआ।
सिलसिला वर्षों तक चला
वह एक माह यहां रहते थे किंतु लीला शाह के आगमन के बाद चले जाते थे। यह सिलसिला वर्षों तक चला। 1950 से 1996 तक इस आश्रम की व्यवस्था गणेश दत्त भट्ट संभालते थे। वह अब भी इस आश्रम के निकट रहते हैं।
श्री भट्ट के अनुसार लीला शाह जाने-माने तपस्वी थे। उन्होंने नैनीताल में दशकों तक तपस्या की। उनका मुख्य ध्येय कन्याओं और निर्बलों की सेवा, गौसेवा और दहेज विरोध करना था।
कुश्ती के शौकीन भी
आगरा में आज भी लीला शाह की बहुत बड़ी गौशाला है। 1960 से यहां आसूमल का आगमन शुरु हो गया। बताते हैं कि सादगी पसंद लीला शाह आसूमल के हावभाव और तड़क-भड़क से नाराज थे तथा उन्हें समझाते भी थे।
आसूमल जप-तप आसन में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते थे। वह कुश्ती के शौकीन भी थे। लीला शाह ने चार वर्ष बाद आसूमल को यहां आने से मना कर दिया।
अपना शिष्य नहीं बनाया
श्री भट्ट का दावा है कि लीला शाह ने कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया और वह किसी को अपने साथ रखते भी नहीं थे, अकेले रहते थे। महिलाओं को तो वह निकट नहीं आने देते थे।
चरण स्पर्श तक नहीं करने देते थे। श्री भट्ट के मुताबिक आसाराम लाख दावा करें पर लीला शाह ने उन्हें कभी अपना शिष्य स्वीकार नहीं किया।
नैनीताल में संकीर्तन यात्रा निकाली
स्वामी लीला शाह 1973 में देह त्यागने से पूर्व आश्रम के संचालन की जिम्मेदारी श्री भट्ट को सौंप गए थे। 1994 में इस आश्रम का जीर्णोद्धार हुआ और प्रबंधन भी बदल गया। आश्रम से जुड़े एलके असवानी ने बताया कि 28 जून 1999 को आसाराम के शिष्यों ने नैनीताल में संकीर्तन यात्रा निकाली थी।
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इस दौरान उन्होंने इस आश्रम पर कब्जा करने का भरसक प्रयास किया, जिसे बमुश्किल विफल किया गया। छह वर्ष पूर्व आसाराम के पुत्र नारायण सांई ने मंगोली सिल्कोड़िया के बीच गहलना के निकट भेवा गांव में 11 नाली भूमि खरीद कर नारायण सांई आश्रम स्थापित किया।
कौन थे स्वामी लीला शाह
स्वामी लीला शाह का जन्म अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में हैदराबाद टंडेबागे गांव चंडिए में फाल्गुन की 23 तिथि को 1880 में हुआ था।
मूल रूप से सिंधी लीला शाह के पिता टोपणदास और मां हेमीबाई का निधन लीला शाह के दस वर्ष का होने से पूर्व ही हो गया था। बालक लीला शाह का इतनी कम आयु में ही अध्यात्म और जप-तप की तरफ झुकाव हो गया।
वेदांत मुनि स्वामी केशवराम को अपना गुरु मानकर उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने का फैसला किया और समाज सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया।
उन्होंने देश भर में विशेष कर हिमालयी क्षेत्रों में तपस्या की तथा विदेशों में भी आश्रम स्थापित किए। उनका मुख्य आश्रम गांधीधाम, आदिपुर कच्छ गुजरात में है। 1973 में 93 वर्ष की आयु में वहीं अनका देहांत हुआ।