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पारे का रंग कुछ और बढ़ गया कुर्सी की रफ्तार में
ब्यूरो/अमर उजाला,कोटद्वार
Updated Sat, 26 Mar 2016 10:05 PM IST
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साहित्यिक संस्था साहित्यांचल की ओर से होली एवं गुड फ्राइडे के उपलक्ष्य में आयोजित काव्य गोष्ठी में जहां कवियों ने राजनीति उथल-पुुथल पर व्यंग कसे, वहीं सामाजिक सौहार्द और होली के रंगों से रंगी कविताओं ने देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा।
शुक्रवार देर शाम शांति बल्लभ मेमोरियल कालेज मानपुर में आयोजित काव्य गोष्ठी में मुख्य अतिथि कालेज के प्राचार्य अरुण भदोला ने सभी तीज-त्योहारों को आपसी सौहार्द भाव से मनाने पर जोर दिया। गोष्ठी का शुभारंभ रिद्धि भट्ट ने सरस्वती वंदना से किया। कवि शिव प्रसाद कुकरेती ने जहां मानव से मानव का व्यवहार है होली, प्यार भरे संबंधों का व्यवहार है होली, तो वहीं एलके बुड़ाकोटी ने रंगने से खिल गई है होली, प्यार के हुनर में मेरे साथ होली और जेपी बलूनी ने सरल की कविता फागुन का मैना, धरती सजणीं च आके होली कू छमणांट गाकर श्रोताओं की खूब वह-वह लूटी।
जेपी भारद्वाज की गढ़वाली कविता बुरा न मानो होली मिलावटी रंगू कू होली और डा. चंद्रमोहन बड़थ्वाल की कविता होली कू रंग न कैरो बदरंग की प्रस्तुति से जहां आपसी प्रेमभाव से रहने की प्रेरणा दी। वरिष्ठ कवि धर्म सिंह रावत ने टेसू के फूल खिले हैं आओ होली के मन के रंग जमाओ को दर्शकों ने खूब सराहा। जनार्दन बुड़ाकोटी ने रंगों का त्योहार है होली बसंती श्रृगार है होली, डॉ. नंदकिशोर ढौडियाल ने धरती ने आकाश सजाया है होली पर रास रचाया है और जेपी धस्माना ने वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल पर आधारित कविता पारे का रंग कुछ और बढ़ गया कुर्सी की रफ्तार में, कुर्सी की रफ्तार में होली के बाजार में गाकर खूब तालियां बटोरी। वहीं डा. मनोरमा ढौडियाल ने होली पर संस्कृत वाणी में काव्यपाठ कर प्रेम व मानवता का संदेश दिया।
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गोष्ठी की अध्यक्षता डा. ख्यात सिंह चौहान ने और संचालन जानकी प्रसाद धस्माना ने किया। इस मौके पर जीवानंद शर्मा, डा. विनोद कुमार बहुगुणा, चंद्रप्रकाश नैथानी, आरवी कंडवाल, अमित नैथानी, ऋषि कंडवाल, प्रवेश नवानी, राकेश सुंद्रियाल, सरला घिल्डियाल ने कविता पाठ किया।
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शुक्रवार देर शाम शांति बल्लभ मेमोरियल कालेज मानपुर में आयोजित काव्य गोष्ठी में मुख्य अतिथि कालेज के प्राचार्य अरुण भदोला ने सभी तीज-त्योहारों को आपसी सौहार्द भाव से मनाने पर जोर दिया। गोष्ठी का शुभारंभ रिद्धि भट्ट ने सरस्वती वंदना से किया। कवि शिव प्रसाद कुकरेती ने जहां मानव से मानव का व्यवहार है होली, प्यार भरे संबंधों का व्यवहार है होली, तो वहीं एलके बुड़ाकोटी ने रंगने से खिल गई है होली, प्यार के हुनर में मेरे साथ होली और जेपी बलूनी ने सरल की कविता फागुन का मैना, धरती सजणीं च आके होली कू छमणांट गाकर श्रोताओं की खूब वह-वह लूटी।
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जेपी भारद्वाज की गढ़वाली कविता बुरा न मानो होली मिलावटी रंगू कू होली और डा. चंद्रमोहन बड़थ्वाल की कविता होली कू रंग न कैरो बदरंग की प्रस्तुति से जहां आपसी प्रेमभाव से रहने की प्रेरणा दी। वरिष्ठ कवि धर्म सिंह रावत ने टेसू के फूल खिले हैं आओ होली के मन के रंग जमाओ को दर्शकों ने खूब सराहा। जनार्दन बुड़ाकोटी ने रंगों का त्योहार है होली बसंती श्रृगार है होली, डॉ. नंदकिशोर ढौडियाल ने धरती ने आकाश सजाया है होली पर रास रचाया है और जेपी धस्माना ने वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल पर आधारित कविता पारे का रंग कुछ और बढ़ गया कुर्सी की रफ्तार में, कुर्सी की रफ्तार में होली के बाजार में गाकर खूब तालियां बटोरी। वहीं डा. मनोरमा ढौडियाल ने होली पर संस्कृत वाणी में काव्यपाठ कर प्रेम व मानवता का संदेश दिया।
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गोष्ठी की अध्यक्षता डा. ख्यात सिंह चौहान ने और संचालन जानकी प्रसाद धस्माना ने किया। इस मौके पर जीवानंद शर्मा, डा. विनोद कुमार बहुगुणा, चंद्रप्रकाश नैथानी, आरवी कंडवाल, अमित नैथानी, ऋषि कंडवाल, प्रवेश नवानी, राकेश सुंद्रियाल, सरला घिल्डियाल ने कविता पाठ किया।