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कांग्रेस प्रबंधन के आगे भाजपा ढेर
Updated Wed, 21 Nov 2018 10:31 PM IST
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चंद्रमोहन शुक्ला
कोटद्वार। नगर निगम मेयर के चुनाव में कांग्रेस के प्रबंधन के आगे भाजपा बेदम नजर आई। पूरे चुनाव में भाजपा जहां बिखरी रही, वहीं संगठित कांग्रेस ने पहले मेयर चुनाव में जीत का परचम फहराते हुए इतिहास रच दिया। इस चुुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी विभा चौहान, कांग्रेस प्रत्याशी से मामूली अंतर से हार गई, लेकिन वह और उनके पति पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान कोटद्वार के राजनीतिक क्षितिज पर एक बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं।
भाजपा की ओर से मेयर पद पर लैंसडौन विधायक दिलीप रावत की पत्नी नीतू रावत के प्रत्याशी घोषित होते ही विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस कारण विभा चौहान समेत भाजपा के छह प्रत्याशी अन्य दलों से या निर्दलीय के रूप में मैदान में उतरकर एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते दिखे। बसपा प्रत्याशी शोभा बहुगुणा भंडारी, यूकेडी प्रत्याशी उषा सजवाण, पूर्व पालिकाध्यक्ष शशि नैनवाल, निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य सुधा सती इसमें शामिल थे। यह कोटद्वार के इतिहास का पहला चुनाव था, जिसमें भाजपा का सांगठनिक अनुशासन तार-तार हो गया। पूरा पार्टी कैडर कई गुटों में बंटकर अपने-अपने प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने में जुटा था। इसका खामियाजा पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी नीतू रावत को भुगतना पड़ा। शुरुआती दौर में ही उनका चुुनाव प्रबंधन बेहद कमजोर रहा। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की दुर्गापुरी में जनसभा होने के बावजूद उनका चुनाव प्रचार गति नहीं पकड़ पाया। अपने संबोधन से वह जनता को जोड़ने में भी विफल रही। हालांकि इस क्षेत्र में भाजपा का अच्छा खासा जनाधार है।
वर्ष 2017 में के विधानसभा चुनाव में कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत करीब 41,177 मत लेकर यहां भारी अंतर से विजयी हुए, लेकिन महज डेढ़ साल में ही सत्तारूढ़ दल से हुए मोह भंग और भाजपा के लचर संगठन के कारण भाजपा प्रत्याशी नीतू रावत सिर्फ 11386 मतों पर ही सिमट कर रह गई। भाजपा के भीतर का ही एक बड़ा वर्ग परिवारवाद के मुद्दे पर भाजपा से बुरी तरह खफा बताया जा रहा था और इसके प्रतिक्रिया स्वरूप उसने खुले तौर पर बागी प्रत्याशी विभा चौहान का साथ दिया। परिवारवाद का सवाल कांग्रेस के भीतर भी था, लेकिन कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उसे सतह पर नहीं आने दिया, जिससे पार्टी के भीतर विद्रोह की नौबत नहीं आई।
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कोटद्वार। नगर निगम मेयर के चुनाव में कांग्रेस के प्रबंधन के आगे भाजपा बेदम नजर आई। पूरे चुनाव में भाजपा जहां बिखरी रही, वहीं संगठित कांग्रेस ने पहले मेयर चुनाव में जीत का परचम फहराते हुए इतिहास रच दिया। इस चुुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी विभा चौहान, कांग्रेस प्रत्याशी से मामूली अंतर से हार गई, लेकिन वह और उनके पति पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान कोटद्वार के राजनीतिक क्षितिज पर एक बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं।
भाजपा की ओर से मेयर पद पर लैंसडौन विधायक दिलीप रावत की पत्नी नीतू रावत के प्रत्याशी घोषित होते ही विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस कारण विभा चौहान समेत भाजपा के छह प्रत्याशी अन्य दलों से या निर्दलीय के रूप में मैदान में उतरकर एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते दिखे। बसपा प्रत्याशी शोभा बहुगुणा भंडारी, यूकेडी प्रत्याशी उषा सजवाण, पूर्व पालिकाध्यक्ष शशि नैनवाल, निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य सुधा सती इसमें शामिल थे। यह कोटद्वार के इतिहास का पहला चुनाव था, जिसमें भाजपा का सांगठनिक अनुशासन तार-तार हो गया। पूरा पार्टी कैडर कई गुटों में बंटकर अपने-अपने प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने में जुटा था। इसका खामियाजा पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी नीतू रावत को भुगतना पड़ा। शुरुआती दौर में ही उनका चुुनाव प्रबंधन बेहद कमजोर रहा। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की दुर्गापुरी में जनसभा होने के बावजूद उनका चुनाव प्रचार गति नहीं पकड़ पाया। अपने संबोधन से वह जनता को जोड़ने में भी विफल रही। हालांकि इस क्षेत्र में भाजपा का अच्छा खासा जनाधार है।
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वर्ष 2017 में के विधानसभा चुनाव में कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत करीब 41,177 मत लेकर यहां भारी अंतर से विजयी हुए, लेकिन महज डेढ़ साल में ही सत्तारूढ़ दल से हुए मोह भंग और भाजपा के लचर संगठन के कारण भाजपा प्रत्याशी नीतू रावत सिर्फ 11386 मतों पर ही सिमट कर रह गई। भाजपा के भीतर का ही एक बड़ा वर्ग परिवारवाद के मुद्दे पर भाजपा से बुरी तरह खफा बताया जा रहा था और इसके प्रतिक्रिया स्वरूप उसने खुले तौर पर बागी प्रत्याशी विभा चौहान का साथ दिया। परिवारवाद का सवाल कांग्रेस के भीतर भी था, लेकिन कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उसे सतह पर नहीं आने दिया, जिससे पार्टी के भीतर विद्रोह की नौबत नहीं आई।
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