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कांग्रेस को रणनीतिक रूप से काम करने का मिला फायदा-compat
Updated Tue, 20 Nov 2018 11:59 PM IST
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कोटद्वार। कोटद्वार नगर निगम के पहले चुनाव में कांग्रेस को भाजपा में बगावत और भीतरघात लाभ मिला। कांग्रेस ने अपनी प्रत्याशी हेमलता नेगी की जीत के लिए पूरी रणनीति के साथ काम किया। भाजपा की बागी निर्दलीय प्रत्याशी ने जनता की सहानुभूति हासिल कर चुनाव प्रचार में तो बढ़त हासिल की, लेकिन वह लोगों के दिलों को पूरी तरह से नहीं जीत पाई। भाजपा बगावत के साथ ही जबरदस्त भीतरघात की शिकार हो गई, जिसके कारण भाजपा अपने कैडर वोट को भी नहीं संभाल पाई। यही वजह रही कि सत्तारूढ़ दल के दो विधायक होने के बावजूद भाजपा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।
कोटद्वार नगर निगम का चुनाव कई मायनों में खास था। मेयर पद के लिए इस बार भाजपा ने जहां लैंसडौन के विधायक दलीप रावत की पत्नी नीतू रावत को मैदान में उतारा, वहीं कांग्रेस ने भी पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की पत्नी हेमलता नेगी पर दांव खेला। भाजपा में टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे पूर्व जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान ने टिकट न मिलने पर अपनी पत्नी विभा चौहान को मैदान में उतारकर परिवारवाद खिलाफ खुली जंग का ऐलान किया। भाजपा से पूर्व पालिकाध्यक्ष शशि नैनवाल और पूर्व जिला पंचायत सदस्य सुधा सती ने भी पार्टी से विद्रोह कर परिवारवाद के खिलाफ मैदान में ताल ठोकी। हिंदूवादी संगठनों की नाराजगी भी भाजपा पर भारी पड़ी। भाजपा इस चुनाव में डैमेज कंट्रोल नहीं कर सकी। वहीं, कांग्रेस में भी परिवारवाद के खिलाफ आवाज तो उठी, लेकिन कांग्रेस इसे कंट्रोल करने में सफल रही।
गत विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से की गई घोषणाओं पर अमल न होने और जिला निर्माण के बजाय नगर निगम और जिला विकास प्राधिकरण थोपना भी भाजपा को महंगा पड़ गया। यही कारण रहा कि वह बागी और निर्दलीय प्रत्याशी विभा चौहान से भी काफी पिछड़ गई। भाजपा के बागी निर्दलीय प्रत्याशी विभा चौहान के साथ भीड़ तो जुटी रही, लेकिन इस भीड़ को वह वोट में तब्दील करने में नाकाम रही।
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कोटद्वार नगर निगम का चुनाव कई मायनों में खास था। मेयर पद के लिए इस बार भाजपा ने जहां लैंसडौन के विधायक दलीप रावत की पत्नी नीतू रावत को मैदान में उतारा, वहीं कांग्रेस ने भी पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की पत्नी हेमलता नेगी पर दांव खेला। भाजपा में टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे पूर्व जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान ने टिकट न मिलने पर अपनी पत्नी विभा चौहान को मैदान में उतारकर परिवारवाद खिलाफ खुली जंग का ऐलान किया। भाजपा से पूर्व पालिकाध्यक्ष शशि नैनवाल और पूर्व जिला पंचायत सदस्य सुधा सती ने भी पार्टी से विद्रोह कर परिवारवाद के खिलाफ मैदान में ताल ठोकी। हिंदूवादी संगठनों की नाराजगी भी भाजपा पर भारी पड़ी। भाजपा इस चुनाव में डैमेज कंट्रोल नहीं कर सकी। वहीं, कांग्रेस में भी परिवारवाद के खिलाफ आवाज तो उठी, लेकिन कांग्रेस इसे कंट्रोल करने में सफल रही।
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गत विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से की गई घोषणाओं पर अमल न होने और जिला निर्माण के बजाय नगर निगम और जिला विकास प्राधिकरण थोपना भी भाजपा को महंगा पड़ गया। यही कारण रहा कि वह बागी और निर्दलीय प्रत्याशी विभा चौहान से भी काफी पिछड़ गई। भाजपा के बागी निर्दलीय प्रत्याशी विभा चौहान के साथ भीड़ तो जुटी रही, लेकिन इस भीड़ को वह वोट में तब्दील करने में नाकाम रही।
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