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उत्तराखंड को आपदा से उबारेगी ये तकनीक
अमर उजाला, बिशन सिंह बोरा, देहरादून
Updated Tue, 03 Sep 2013 09:31 AM IST
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प्रदेश में आई भयंकर आपदा से इस साल दो हजार 88 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बह गई, जिससे लोगों के भूखों मरने तक की नौबत हो गई है। लेकिन खेती की इस तकनीक से ऐसी जगहों पर बिना मिट्टी के कई फसलें उगाई जा सकती हैं।
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इजराइल की सायललेस (मिट्टी रहित) खेती का तरीका अपनाकर ऐसी खेती मुमकिन है।
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इसका सफल प्रयोग चांदपुर खुर्द सहसपुर में दून के डालनवाला निवासी श्रीप्रकाश सिन्हा कर रहे हैं। सिन्हा दावा करते हैं कि ऐसी खेती में न सिर्फ लागत कम है, बल्कि रोग भी अपेक्षाकृत कम लगते हैं।
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कैसे होती है ये खेती
इस तकनीकी में पौधे चपटे गमले की शक्ल वाली मोटी पॉलीथिन में नारियल के रेशे भरे जाते हैं। इसे ‘कोको पिट’ (नारियल का गड्ढा) कहा जाता है। इसमें पोषक तत्वों और पानी की आपूर्ति करने के बाद पौधे लगाए जाते हैं।
अगर बड़े पैमाने पर खेती करनी है तो इसके लिए पूरी तरह से आटोमेटिक मशीन भी लगा सकते हैं। कंप्यूटर पर आधारित यह मशीन एक क्लिक पर ड्रिप विधि से पौधों में एक साथ ही पोषक तत्व और पानी की आपूर्ति करती है।
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अगर पॉली हाउस बनाकर यह खेती की जाए तो एक लेयर (स्तर) में एक किस्म के पौधे और दूसरे लेयर में दूसरे पौधे लगाए जा सकते हैं।
अब करेले की तैयारी
श्रीप्रकाश सिन्हा ने इस विधि से चार से पांच फीट ऊंचे टमाटर के पौधे उगाए हैं। इसमें प्रत्येक पौधे से औसतन 15 से बीस किलोग्राम तक टमाटर का उत्पादन हो रहा है।
अब वे करेले की खेती की तैयारी कर रहे हैं। कोकोपिट में टमाटर और करेला सहित कोई भी फसल उगाई जा सकती है। किसान पॉली हाउस में इसे लगाकर बेमौसमी फसलों का उत्पादन कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
आपदाग्रस्त इलाकों के लिए मुफीद
प्रदेश में आपदा से इस साल दो हजार 88 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बह गई। इसमें सबसे अधिक नुकसान रुद्रप्रयाग और टिहरी में हुआ है।
कृषि वैज्ञानिकों की माने तो भूमि को उपजाऊ बनाने में कई साल लग जाते हैं। ऐसे स्थानों पर भी सायलसेल खेती लाभ पहुंचा सकती है।
लागत
क्षेत्रफल----------------लागत
एक कोकोपिट - 40 रुपए
आटोमेटिक मशीन - 20 लाख
1000 स्क्वायर मीटर - दस लाख रुपए
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