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उत्तराखंडः बड़ा होकर पुल बनाऊंगा...ताकि बाढ़ में न बहे लोग
गुप्तकाशी/संदीप थपलियाल
Updated Sun, 14 Jul 2013 01:36 PM IST
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शरीर पर किताबों का बोझ और मन में कुछ बनने की चाह लिए छोटे-छोटे बच्चों ने 45 किलोमीटर का दुर्गम सफर पैदल ही तय किया। उफनते गदेरों और पहाड़ी रास्तों पर नाजुक कदम उनके मजबूत इरादों को बयां कर रहे थे।
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पहाड़ में आई आपदा के बाद उत्पन्न हुई विकट स्थितियों में शायद ही कोई उस ओर रुख करना चाहेगा, लेकिन डर और हादसे से बेखौफ बच्चे एक दूसरे का हाथ पकड़कर पहाड़ी और दुर्गम रास्तों पर भी कदम-कदम बढ़ाए जा रहे थे।
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किताबी बस्तों का बोझ लेकर केदारघाटी के दूरस्थ गांव चौमासी से पैदल 45 किलोमीटर चलकर गुप्तकाशी पहुंचे मासूम नवीन, रोहित, गौरव और रोशनी तिंदोरी।
13 वर्षीय नवीन और 11वर्षीय रोहित भाई हैं, जबकि 12 साल की रोशनी और 10 साल के गौरव, नवीन के ताऊ के बच्चे हैं। इसमें से कोई अधिकारी बनना चाहता है तो कोई इंजीनियर बनकर गांवों के रास्ते दुरुस्त करना चाहता है।
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केदारनाथ्ा में चाचा बह गए
तीन भाइयों के सिर मुंडे हैं। पूछने पर बताते हैं कि उनके परिवार में चाचा की शादी इसी साल हुई थी, लेकिन केदारनाथ पैदल मार्ग पर रामबाड़ा में आपदा के दौरान उनकी मौत हो गई। उन्होंने बताया कि अभी स्कूल बंद हैं, लेकिन पढ़ाई के लिए वह पहले ही यहां पहुंच गए हैं।
वहीं चौमासी के महिपाल और बलवीर तिंदोरी ने बच्चों के सुखद भविष्य को देखते हुए अपने बच्चों का एडमिशन इसी वर्ष अप्रैल माह में सीबीएसई पैटर्न के डा. जैक्सवीन नेशनल स्कूल गुप्तकाशी में कराया है। हिंदी मीडियम स्कूल से आए बच्चे अभी यहां के बच्चों के साथ चलने की कोशिश कर रहे थे कि छुट्टियां आ गई।
45किलोमीटर का दुर्गम रास्ता पैदल किया तय
छुट्टियों में बच्चे जीप में बैठकर घर तक गए। लेकिन लौटे तो 45 किलोमीटर का दुर्गम रास्ता पैदल ही तय करना पड़ा। स्कूल के शिक्षक सुरजीत बिष्ट और विनोद गैरोला ने बताया कि मौसम की खराबी के कारण स्कूल बंद चल रहे हैं। ये बच्चे स्कूल के हॉस्टल में रहते हैं। स्कूल न खुलने तक उनकी पढ़ाई हॉस्टल में चलती रहेगी।
बच्चों की जुबानी
'मैं और रोहित भाई हैं। मेरे पिता केदारनाथ में खच्चर चलाते थे। जलप्रलय के बाद से खच्चर लापता है। पिताजी घर पर हैं।'
नवीन, कक्षा 07
'सुबह छह बजे घर से चलना शुरू किया था। शाम चार बजे गुप्तकाशी पहुंचे। गदेरों में पिताजी ने बैग ले लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद इंजीनियर बनूंगा। पुल बनाऊंगा। मेरे गांव के लोगों को गदेरे में नहीं जाना पड़ेगा।'
रोहित, कक्षा 06
'गुप्तकाशी में पढ़ने के लिए ताऊ (जैक्सवीन स्कूल के चेयरमैन लखपत राणा) ने बोला था। पिता जी रोजगार गारंटी का कार्य करते हैं। सरकारी अधिकारी बनूंगी, तो गांव की समस्याओं का निराकरण करुंगी।'
रोशनी, कक्षा 06
'रास्ते में कविल्ठा में थोड़ा सा दाल-भात खाया था। पानी में चप्पल बहे, तो पिताजी तैरकर लाए। मेरे गांव के पुल बह गए हैं। रास्ते नहीं है।'
गौरव कक्षा 05