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वोट कटवा उम्मीदवारों से डरे बड़े दलों के प्रत्याशी
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2022 के विधानसभा चुनाव में हार-जीत का अंतर कम रहने की गुंजाइश ने ही बड़े प्रत्याशियों का सर्दी में भी पसीना निकाल दिया है। जिले की 11 विधानसभा सीटों पर 110 उम्मीदवार हैं। इसमें 45 उम्मीदवार ऐसे हैं, जिनके चेहरों से बड़ी पार्टियों के प्रत्याशी डर रहे हैं।
खुद के बलबूते चुनावी समर में उतरे निर्दलियों पर सबकी निगाहें टिकी होती हैं। बीते कुछ वर्षों में जिले की सीटों पर भले ही निर्दलीय उम्मीदवारों को उतनी सफलता न मिली हो, लेकिन इस बार कुछ सीटों पर उनकी मौजूदगी ने समीकरणों को रोचक बना दिया है। विधानसभा चुनाव के मैदान में राजनीतिक पार्टियों के साथ आजाद उम्मीदवारों ने भी ताल ठोक दी है।
जिले की सभी 11 विधानसभा सीटों में आजाद उम्मीदवारों ने भी चुनाव लड़ने में दिलचस्पी दिखाई है। अब देखना है कि आजाद उम्मीदवार खुद की किस्मत चमकाते हैं या फिर किसी राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार की किस्मत पर वोट काटकर ग्रहण लगाते हैं। क्योंकि आजाद उम्मीदवार मिलाकर चार से पांच हजार वोट काट ले जाते हैं। यही वोट हार-जीत का समीकरण बदलकर रख देता है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक जिले में 2012 की तुलना में 2017 में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या बढ़ गई थी। 2012 में 26 और 2017 में 49 निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में थे। इस बार जिले में 45 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। संवाद
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2017 में थी बीजेपी लहर
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की लहर थी, जिसकी वजह से निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या अधिक होने के बावजूद उन्हें मिला वोट प्रतिशत कम रहा। इस बार पिछले 2 विधानसभा चुनावों की तुलना में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या कम जरूर है, लेकिन वोटिंग प्रतिशत बढ़ने की संभावना है।
दूसरों के वोट बैंक में लगाते हैं सेंध
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जब जीत हार का अंतर बहुत कम होता है, उस स्थिति में निर्दलीय प्रत्याशी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे में हारने वाले प्रत्याशी के वोट बैंक में सेंध लगा देते हैं। जिससे उसे हार का सामना करना पड़ जाता है। ऐसे काफी मामले दिखते रहे हैं। इसलिए कई बार डमी प्रत्याशी को खड़ा करके भी दूसरे प्रत्याशी के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास किया जाता रहा है।
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खुद के बलबूते चुनावी समर में उतरे निर्दलियों पर सबकी निगाहें टिकी होती हैं। बीते कुछ वर्षों में जिले की सीटों पर भले ही निर्दलीय उम्मीदवारों को उतनी सफलता न मिली हो, लेकिन इस बार कुछ सीटों पर उनकी मौजूदगी ने समीकरणों को रोचक बना दिया है। विधानसभा चुनाव के मैदान में राजनीतिक पार्टियों के साथ आजाद उम्मीदवारों ने भी ताल ठोक दी है।
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जिले की सभी 11 विधानसभा सीटों में आजाद उम्मीदवारों ने भी चुनाव लड़ने में दिलचस्पी दिखाई है। अब देखना है कि आजाद उम्मीदवार खुद की किस्मत चमकाते हैं या फिर किसी राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार की किस्मत पर वोट काटकर ग्रहण लगाते हैं। क्योंकि आजाद उम्मीदवार मिलाकर चार से पांच हजार वोट काट ले जाते हैं। यही वोट हार-जीत का समीकरण बदलकर रख देता है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक जिले में 2012 की तुलना में 2017 में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या बढ़ गई थी। 2012 में 26 और 2017 में 49 निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में थे। इस बार जिले में 45 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। संवाद
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2017 में थी बीजेपी लहर
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की लहर थी, जिसकी वजह से निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या अधिक होने के बावजूद उन्हें मिला वोट प्रतिशत कम रहा। इस बार पिछले 2 विधानसभा चुनावों की तुलना में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या कम जरूर है, लेकिन वोटिंग प्रतिशत बढ़ने की संभावना है।
दूसरों के वोट बैंक में लगाते हैं सेंध
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जब जीत हार का अंतर बहुत कम होता है, उस स्थिति में निर्दलीय प्रत्याशी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे में हारने वाले प्रत्याशी के वोट बैंक में सेंध लगा देते हैं। जिससे उसे हार का सामना करना पड़ जाता है। ऐसे काफी मामले दिखते रहे हैं। इसलिए कई बार डमी प्रत्याशी को खड़ा करके भी दूसरे प्रत्याशी के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास किया जाता रहा है।