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रिजल्ट का वो इंतजार, वो रोमांच अब कहां
मेहताब आलम हरिद्वार।
Updated Mon, 29 May 2017 11:17 PM IST
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बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट जानने में अब मिनट नहीं लगते। वेबसाइट पर रिजल्ट अपलोड होते ही देश दुनिया के किसी कोने में बैठकर रिजल्ट देखा जा सकता है, लेकिन एक जमाना था जब अखबार के जरिये रिजल्ट आता था और अखबार लेने के लिए आधी रात से न्यूज एजेंसियों पर परीक्षार्थियों की लंबी-लंबी कतारें लग जाती थी। लंबे इंतजार के बाद अखबार मिलने के बाद छीना झपटी और अखबार के छोटे-छोटे अक्षरों में अपना रोल नंबर ढूंढने की बेचैनी का वो माहौल रिजल्ट के रोमांच को सातवें आसमान पर पहुंचा देता था। इंटरनेट के युग में जन्मी नई पीढ़ी ने बहुत कुछ पाया मगर रिजल्ट के इस रोमांच से महरूम है।
इन दिनों देशभर में बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम जारी किए जा रहे हैं। रविवार को सीबीएसई इंटर और सोमवार को आईसीएसई हाईस्कूल का परिणाम जारी किया गया। मंगलवार को उत्तराखंड बोर्ड के नतीजे आने हैं। सालभर की मेहनत का फल जानने के लिए बोर्ड परीक्षार्थियों में उत्सुकता जरूर रहती है, पर रिजल्ट वेबसाइट पर अपलोड होने के चंद मिनट में ही रिजल्ट का पूरा रोमांच खत्म भी हो जाता है। मोबाइल के रूप में हर हाथ में इंटरनेट होने से सबकुछ आसान हो गया है। अलबत्ता एक दशक पहले तक रिजल्ट को लेकर नजारा कुछ और रहता था। पुराने विद्यार्थियों से रिजल्ट की बात की जाए तो वो दिन याद कर आंखों में चमक और चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ पड़ती है। व्यापारी नेता सुरेंद्र भटेजा बताते हैं उस दौरान दिल्ली या मेरठ से अखबार लेकर टैक्सी आधी रात में आती थी। 1972 में अपना हाईस्कूल का रिजल्ट याद करते हुए सुरेंद्र भटेजा बताते हैं कि 14 दिन तक नींद नहीं आई थी। रिजल्ट के दिन पूरी रात जागकर टैक्सी का इंतजार किया और अखबार लेकर ही घर लौटे। पत्रकार आदेश त्यागी बताते हैं कि उन दिनों अखबार अमूमन रात में आता था। अखबार लेने के लिए रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर परीक्षार्थियों की लाइन लग जाती थी। परीक्षार्थी मिलकर अलग अलग जगहों पर अखबार की टैक्सी का पहरा देते थे। अखबार पहुंचने पर खूब छीना झपटी मचती थी। पहले अपना रिजल्ट देखने के लिए अखबार को छिपा लिया करते थे।
अखबार में रिजल्ट आने पर पूरा मोहल्ले बस्ती के लोग बच्चे का रिजल्ट देखते थे। उन्होंने बताया कि आज तक अपना हाईस्कूल का रोल नंबर याद है और मैं साइकिल से जाकर आधी रात को रिजल्ट का अखबार लाया था। सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज भेल के शिक्षक पंकज शर्मा ने बताया कि रिजल्ट को लेकर नींद और भूख उड़ी हुई थी। 1998 में सराय गांव से जटवाड़ा पुल न्यूज एजेंसी तक रात भर में छह चक्कर लगाए थे और रात में पौने दो बजे अखबार की टैक्सी पहुंची तो सबसे पहला अखबार 280 रुपये में खरीदा।
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चिट्ठी में आती थी बधाईयां
अब एग्जाम में पास होते ही मोबाइल से कॉल व मैसेज के अलावा फेसबुक और व्हाटसएप से चंद मिनट में बधाईयों का सिलसिला आम हो जाता है। उस दौर में बच्चे के बोर्ड एग्जाम में पास होने की खबर मिलने पर चिट्ठी से बधाईयां आती थी।
सहारनपुर कराई अखबार की लेमिनेशन
अखबार में केवल पास होने वाले परीक्षार्थियों के रोल नंबर प्रकाशित किए जाते थे। कुछ परीक्षार्थी पास होने के बाद उस अखबार को भी संजोकर रखते थे। शिक्षक पंकज शर्मा बताते हैं कि उनके एक मित्र अखबार में अपना रोल नंबर डार्क कर सहारनपुर से 80 रुपये में पूरे अखबार की लेमिनेशन कराकर लाए थे। उन दिनों अखबार बांटने वाला हॉकर भी पास होने वाले बच्चे के घर से मिठाई का डिब्बा लेता था।
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इन दिनों देशभर में बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम जारी किए जा रहे हैं। रविवार को सीबीएसई इंटर और सोमवार को आईसीएसई हाईस्कूल का परिणाम जारी किया गया। मंगलवार को उत्तराखंड बोर्ड के नतीजे आने हैं। सालभर की मेहनत का फल जानने के लिए बोर्ड परीक्षार्थियों में उत्सुकता जरूर रहती है, पर रिजल्ट वेबसाइट पर अपलोड होने के चंद मिनट में ही रिजल्ट का पूरा रोमांच खत्म भी हो जाता है। मोबाइल के रूप में हर हाथ में इंटरनेट होने से सबकुछ आसान हो गया है। अलबत्ता एक दशक पहले तक रिजल्ट को लेकर नजारा कुछ और रहता था। पुराने विद्यार्थियों से रिजल्ट की बात की जाए तो वो दिन याद कर आंखों में चमक और चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ पड़ती है। व्यापारी नेता सुरेंद्र भटेजा बताते हैं उस दौरान दिल्ली या मेरठ से अखबार लेकर टैक्सी आधी रात में आती थी। 1972 में अपना हाईस्कूल का रिजल्ट याद करते हुए सुरेंद्र भटेजा बताते हैं कि 14 दिन तक नींद नहीं आई थी। रिजल्ट के दिन पूरी रात जागकर टैक्सी का इंतजार किया और अखबार लेकर ही घर लौटे। पत्रकार आदेश त्यागी बताते हैं कि उन दिनों अखबार अमूमन रात में आता था। अखबार लेने के लिए रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर परीक्षार्थियों की लाइन लग जाती थी। परीक्षार्थी मिलकर अलग अलग जगहों पर अखबार की टैक्सी का पहरा देते थे। अखबार पहुंचने पर खूब छीना झपटी मचती थी। पहले अपना रिजल्ट देखने के लिए अखबार को छिपा लिया करते थे।
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अखबार में रिजल्ट आने पर पूरा मोहल्ले बस्ती के लोग बच्चे का रिजल्ट देखते थे। उन्होंने बताया कि आज तक अपना हाईस्कूल का रोल नंबर याद है और मैं साइकिल से जाकर आधी रात को रिजल्ट का अखबार लाया था। सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज भेल के शिक्षक पंकज शर्मा ने बताया कि रिजल्ट को लेकर नींद और भूख उड़ी हुई थी। 1998 में सराय गांव से जटवाड़ा पुल न्यूज एजेंसी तक रात भर में छह चक्कर लगाए थे और रात में पौने दो बजे अखबार की टैक्सी पहुंची तो सबसे पहला अखबार 280 रुपये में खरीदा।
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चिट्ठी में आती थी बधाईयां
अब एग्जाम में पास होते ही मोबाइल से कॉल व मैसेज के अलावा फेसबुक और व्हाटसएप से चंद मिनट में बधाईयों का सिलसिला आम हो जाता है। उस दौर में बच्चे के बोर्ड एग्जाम में पास होने की खबर मिलने पर चिट्ठी से बधाईयां आती थी।
सहारनपुर कराई अखबार की लेमिनेशन
अखबार में केवल पास होने वाले परीक्षार्थियों के रोल नंबर प्रकाशित किए जाते थे। कुछ परीक्षार्थी पास होने के बाद उस अखबार को भी संजोकर रखते थे। शिक्षक पंकज शर्मा बताते हैं कि उनके एक मित्र अखबार में अपना रोल नंबर डार्क कर सहारनपुर से 80 रुपये में पूरे अखबार की लेमिनेशन कराकर लाए थे। उन दिनों अखबार बांटने वाला हॉकर भी पास होने वाले बच्चे के घर से मिठाई का डिब्बा लेता था।