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Haridwar: शिवभक्तों के कांधों पर सजेगी मुस्लिम कारीगरों की कांवड़, दशकों से कर रहे यही काम

Sat, 09 Jul 2022 10:57 PM IST
देहरादून ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: देहरादून ब्यूरो Updated Sat, 09 Jul 2022 10:57 PM IST
सार

करीब एक महीने पहले ही ज्वालापुर में मुस्लिम समाज के लोग कांवड़ बनाने की तैयारी में जुट गए थे। सिकंदर के परिवार के अलावा सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मेरठ के साथ ही कई अन्य जिलों से मुस्लिम कारीगरों ने हरिद्वार पहुंचकर कांवड़ बनाने का काम शुरू कर दिया था।

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Sikandar's kanwar will be decorated on the shoulders of the innocent
कांवड़ ले जाती एक युवती - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

धर्मनगरी हमेशा गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जानी जाती रही है। हरिद्वार में लगने वाला हिंदू आस्था का कोई पर्व ऐसा नहीं, जिसमें मुस्लिम समाज के लोगों की भागीदारी न रहती हो। अब श्रावण मास की कांवड़ यात्रा शुरू होने वाली है और मुस्लिम कारीगर भोले के भक्तों के लिए मंदिर, शिवलिंग और अन्य आकृति की सुंदर कांवड़ तैयार कर रहे हैं।

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इसी 14 जुलाई से शुरू होने जा रहे कांवड़ यात्रा को लेकर जितना उत्साह शिव भक्तों में है, उतना ही मुस्लिम समाज के लोगों में भी। मुस्लिम समाज के यह वह लोग हैं जो दशकों से कांवड़ बनाने के काम से जुड़े हैं। ज्वालापुर की लाल मंदिर कॉलोनी के रहने वाले सिकंदर और उसके भाई वर्षों से कांवड़ बनाने का काम कर रहे हैं। वर्ष के अन्य दिनों दिहाड़ी मजदूरी करने वाले यह परिवार आजकल सुबह से शाम तक कांवड़ बना रहे हैं। खास बात यह है कि मंदिरों और शिवलिंग के आकार की कांवड़ को इस कदर तसल्ली से कारीगरी कर रहे कि मानो इनको ही अपने कंधे पर रखकर ले जानी हो।
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करीब एक महीने पहले ही ज्वालापुर में मुस्लिम समाज के लोग कांवड़ बनाने की तैयारी में जुट गए थे। सिकंदर के परिवार के अलावा सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मेरठ के साथ ही कई अन्य जिलों से मुस्लिम कारीगरों ने हरिद्वार पहुंचकर कांवड़ बनाने का काम शुरू कर दिया था। इन दिनों इनके पास फुर्सत नहीं है। आज ईद मनाने के बाद यह लोग फिर कांवड़ बनाने में जुट जाएंगे।
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अमर उजाला से बातचीत में सिकंदर अहमद ने बताया कि उनके पिता सादी हुसैन ने करीब पचास वर्ष पहले कांवड़ बनाने का काम शुरू किया था। जबकि इससे पहले उनके दादा भी यही काम करते थे। पिता का डेढ़ साल पहले ही निधन हुआ। अब वह और उनके भाई नईम प्रधान, बबलू, राशिद, साजिद और महबूब इस कार्य को कर रहे हैं।

किसी तरह का भेदभाव नहीं

ज्वालापुर में कांवड़ तैयार करने के बाद सिकंदर हरिद्वार में लगने वाले कांवड़ बाजार में दुकान लगाते हैं। सिकंदर बताते हैं कि साढ़े तीन दशक में किसी तरह का भेदभाव देखने को नहीं मिला। कांवड़ खरीदने वाले भोले के भक्त भी कभी धर्म पूछ खरीदारी नहीं करते। उनका कहना है कि यह देखकर अच्छा लगता है।

कांवड़ के सीजन से होती हैं कई उम्मीदें

कांवड़ बनाने वाले 90 फीसदी कारीगर मुस्लिम हैं। कांवड़ मेले से हर बार कोई न कोई उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। कांवड़ मेला से होने वाली आय से बहन, बेटियों की शादी के साथ ही मकान बनाने का काम करते हैं। दो साल तक कोरोना की पाबंदियों के चलते कांवड़ मेला नहीं हुआ, जिससे इन कारीगरों को काफी नुकसान झेलना पड़ा।

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