{"_id":"5846f5e94f1c1be672448a8d","slug":"mining-on-movements-and-commands-in-vain","type":"story","status":"publish","title_hn":"खनन पर आंदोलनों और आदेशों का नतीजा सिफर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खनन पर आंदोलनों और आदेशों का नतीजा सिफर
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Tue, 06 Dec 2016 11:01 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
गंगा में खनन के खिलाफ मातृसदन 18 साल से संघर्ष कर रहा है। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट व एनजीटी की ओर से दर्जनों आदेश जारी हुए। इतना ही नहीं मातृसदन के एक युवा संत को अपने प्राणों की बली भी देनी पड़ी। लेकिन जिले में गंगा व सहायक नदियों में खनन की विभीषिका पर नजर डालें तो इन सबका नतीजा ढाक के तीन पात दिखाई देता है। यहां अहम सवाल ये है कि मातृसदन के 50 से ज्यादा आंदोलनों के बीच उच्च वैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन शासन प्रशासन के अलावा आखिर कौन कराएगा। दूसरा सवाल ये है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि कड़े कदम नहीं उठाए जा सकते हैं।
गंगा में पोकलैंड जैसी मशीनों से जमकर खनन सिर्फ मोक्षदायिनी गंगा की अविरलता के लिए ही खतरा नहीं है, बल्कि पर्यावरण के नजरिये से भी घातक है। केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सहित तमाम वैज्ञानिक रिपोर्ट में इस बात के प्रमाण मिलते हैं। सवाल है कि इस पर लगाम कैसे लगाई जाए। मातृसदन जैसी संस्थाओं का आंदोलन हो या सुप्रीम कोर्ट जैसे सर्वोच्च अदालतों के आदेश, इनका क्रियान्वयन शासन प्रशासन को करना होता है। हरिद्वार में गंगा में खनन को लेकर बड़ा दुर्भाग्य ये रहा है कि राजनीतिक शह के चलते बड़े से बड़े आदेशों को भी किनारे रख दिया गया। स्टोन क्रशरों को गंगा से पांच किलोमीटर दूर हटाने के संबंध में हाईकोर्ट का आदेश हो या फिर गंगा में अब तक की विभीषिका का आंकलन करने के संबंध में एनजीटी का आदेश हो, अफसर इनमें किसी भी आदेश का पालन कराने में नाकाम रहे हैं। इसके पीछे राजनीतिक कारण जगजाहिर हैं। लेकिन अदालतों के आदेशों को भी जब किनारे कर दिया जाएगा, तो सवाल उठने लाजिमी हैं।
मातृसदन के मौजूदा आंदोलन पर शासन प्रशासन की पल पल नजर है। इच्छा मृत्यु को लेकर स्वामी शिवानंद के जल त्याग करने से सरकार और अफसरों की चिंता जरूर बढ़ी है, पर न्यायालयों के आदेशों का पालन कराने या खनन रोकने लेकर प्रभावी रणनीति बनाने की जहमत अभी तक नहीं उठाई जा रही है। इससे साफ पता चलता है कि खनन माफिया कितने प्रभावशाली और रसूखदार हैं। खनन को लेकर इतना हो हल्ला मचने के बावजूद गंगा व सहायक नदियों का सीना चीरकर हर रोज करोड़ों रुपये की सामग्री उत्तराखंड से लेकर यूपी तक ठिकाने लगाई जा रही है।
विज्ञापन
किसी भी दल का रुख स्पष्ट नहीं
गंगा व सहायक नदियों को लेकर किसी भी राजनीतिक दल का रुख स्पष्ट नहीं है। खनन के समर्थन में यदा कदा ही सही अलग अलग दलों के नेता सड़क पर उतरते हैं, लेकिन खनन के विरोध में उनकी मंशा साफ नहीं है। ऐसे में उनके सत्ता में आने पर खनन पर रोक की उम्मीद मातृसदन को भी नहीं है। इससे जुड़ा पहलू ये भी है कि सरकारें आती और जाती रही और गंगा मेें खनन का खेल चलता रहा।
गंगा में पोकलैंड जैसी मशीनों से जमकर खनन सिर्फ मोक्षदायिनी गंगा की अविरलता के लिए ही खतरा नहीं है, बल्कि पर्यावरण के नजरिये से भी घातक है। केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सहित तमाम वैज्ञानिक रिपोर्ट में इस बात के प्रमाण मिलते हैं। सवाल है कि इस पर लगाम कैसे लगाई जाए। मातृसदन जैसी संस्थाओं का आंदोलन हो या सुप्रीम कोर्ट जैसे सर्वोच्च अदालतों के आदेश, इनका क्रियान्वयन शासन प्रशासन को करना होता है। हरिद्वार में गंगा में खनन को लेकर बड़ा दुर्भाग्य ये रहा है कि राजनीतिक शह के चलते बड़े से बड़े आदेशों को भी किनारे रख दिया गया। स्टोन क्रशरों को गंगा से पांच किलोमीटर दूर हटाने के संबंध में हाईकोर्ट का आदेश हो या फिर गंगा में अब तक की विभीषिका का आंकलन करने के संबंध में एनजीटी का आदेश हो, अफसर इनमें किसी भी आदेश का पालन कराने में नाकाम रहे हैं। इसके पीछे राजनीतिक कारण जगजाहिर हैं। लेकिन अदालतों के आदेशों को भी जब किनारे कर दिया जाएगा, तो सवाल उठने लाजिमी हैं।
विज्ञापन
मातृसदन के मौजूदा आंदोलन पर शासन प्रशासन की पल पल नजर है। इच्छा मृत्यु को लेकर स्वामी शिवानंद के जल त्याग करने से सरकार और अफसरों की चिंता जरूर बढ़ी है, पर न्यायालयों के आदेशों का पालन कराने या खनन रोकने लेकर प्रभावी रणनीति बनाने की जहमत अभी तक नहीं उठाई जा रही है। इससे साफ पता चलता है कि खनन माफिया कितने प्रभावशाली और रसूखदार हैं। खनन को लेकर इतना हो हल्ला मचने के बावजूद गंगा व सहायक नदियों का सीना चीरकर हर रोज करोड़ों रुपये की सामग्री उत्तराखंड से लेकर यूपी तक ठिकाने लगाई जा रही है।
विज्ञापन
किसी भी दल का रुख स्पष्ट नहीं
गंगा व सहायक नदियों को लेकर किसी भी राजनीतिक दल का रुख स्पष्ट नहीं है। खनन के समर्थन में यदा कदा ही सही अलग अलग दलों के नेता सड़क पर उतरते हैं, लेकिन खनन के विरोध में उनकी मंशा साफ नहीं है। ऐसे में उनके सत्ता में आने पर खनन पर रोक की उम्मीद मातृसदन को भी नहीं है। इससे जुड़ा पहलू ये भी है कि सरकारें आती और जाती रही और गंगा मेें खनन का खेल चलता रहा।