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मार्च के पहले हफ्ते लौट जाएंगे प्रवासी राजहंस
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राजहंस
- फोटो : HARIDWAR
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तापमान में वृद्धि होने के साथ प्रवासी राजहंस स्वदेश वापसी की उड़ान भरने के लिए गढ़वाल के अलग-अलग इलाकों से हरिद्वार पहुंचने लगे हैं। मिस्सरपुर गंगा घाट में 100 से 120 राजहंस का झुंड पहुंचा है। मिस्सरपुर समेत गंगा के घाटों पर राजहंस के झुंड का आने का सिलसिला जारी है। मार्च पहले सप्ताह तक प्रवासी राजहंस अपने देश लौट जाएंगे।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के जंतु एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के एमेरिटस प्रोफेसर डॉ. दिनेश भट्ट के शोध छात्रों की टीम प्रवासी पक्षियों की निगरानी करती है। शोध छात्र आशीष कुमार आर्य ने बताया कि राजहंस करीब 8600 फीट ऊंचाई के हिमालयी क्षेत्रों को पार कर मंगोलिया, कजाकिस्तान, चीन, नेपाल और भूटान से शीतकालीन प्रवास के लिए भारतीय उपमहाद्वीप में आते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा तट समेत अन्य तालाब और वैटलैंड में आने वाले राजहंस मुख्यत कजाकिस्तान से आते हैं।
डॉ. दिनेश भट्ट ने बताया की प्रवासी पक्षियों का पलायन करना विवशता है। लगभग 40 डिग्री उत्तरी अक्षांश से ऊपर जितने भी शीत प्रदेश हैं, वहां 5 से 6 माह तक बर्फ जमी रहती है। इस प्रतिकूल मौसम में पक्षियों को वहां खाने पीने में काफी दिक्कतें होती हैं। उनका प्राकृतिक आवास बर्फ गिरने से बुरी तरह प्रभावित होता है। जिससे पक्षियों के पास पलायन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। यह पलायन इनके शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं में मौसमी परिवर्तन के असर से संभव हो पाता है।
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प्रो भट्ट ने बताया कि हरिद्वार समेत प्रदेश में तापमान वृद्धि होने लगी है। मार्च तक तापमान और बढ़ जाएगा। अधिकांश पक्षी सेंट्रल फ्लाईवे से शीत प्रवास के बाद भारत से मध्य एवं उत्तरी एशिया के अपने अपने देशों में चले जाएंगे। प्रो. भट्ट के मुताबिक पक्षियों के मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस में जैविक घड़ी होती है। जो अनेक प्रकार से पक्षियों के व्यवहार एवं प्रवास को नियंत्रित करती है। वर्तमान में 22 प्रकार के प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां गंगा तटों पर देखी गई हैं। वापसी के लिए झुंड में दिखने लगे हैं।
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हीमोग्लोबिन संरचना में परिवर्तन करता है राजहंस
पक्षी वैज्ञानिक डॉ. विनय सेठी के मुताबिक राजहंस हिमालय की ऊंचाई जहां ऑक्सीजन की उपलब्धता काफी कम होती है, उड़ान भरता है। हिमालय को पार कर हिंदुस्तान की सरजमी पर शीतकालीन प्रवास पर आता है। राजहंस को कई दफा एवरेस्ट की ऊंचाई पर भी उड़ते देखा गया है। वैज्ञानिक डॉ. सेठी ने दावा किया कि पर्वत श्रृंखलाओं को पार करते समय राजहंस अपने हीमोग्लोबिन की संरचना में परिवर्तन कर ऑक्सीजन की मांग को कम कर लेता है। शीतकाल में पक्षियों के भारत आने के कारण अधिक स्पष्ट हैं।
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गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के जंतु एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के एमेरिटस प्रोफेसर डॉ. दिनेश भट्ट के शोध छात्रों की टीम प्रवासी पक्षियों की निगरानी करती है। शोध छात्र आशीष कुमार आर्य ने बताया कि राजहंस करीब 8600 फीट ऊंचाई के हिमालयी क्षेत्रों को पार कर मंगोलिया, कजाकिस्तान, चीन, नेपाल और भूटान से शीतकालीन प्रवास के लिए भारतीय उपमहाद्वीप में आते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा तट समेत अन्य तालाब और वैटलैंड में आने वाले राजहंस मुख्यत कजाकिस्तान से आते हैं।
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डॉ. दिनेश भट्ट ने बताया की प्रवासी पक्षियों का पलायन करना विवशता है। लगभग 40 डिग्री उत्तरी अक्षांश से ऊपर जितने भी शीत प्रदेश हैं, वहां 5 से 6 माह तक बर्फ जमी रहती है। इस प्रतिकूल मौसम में पक्षियों को वहां खाने पीने में काफी दिक्कतें होती हैं। उनका प्राकृतिक आवास बर्फ गिरने से बुरी तरह प्रभावित होता है। जिससे पक्षियों के पास पलायन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। यह पलायन इनके शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं में मौसमी परिवर्तन के असर से संभव हो पाता है।
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प्रो भट्ट ने बताया कि हरिद्वार समेत प्रदेश में तापमान वृद्धि होने लगी है। मार्च तक तापमान और बढ़ जाएगा। अधिकांश पक्षी सेंट्रल फ्लाईवे से शीत प्रवास के बाद भारत से मध्य एवं उत्तरी एशिया के अपने अपने देशों में चले जाएंगे। प्रो. भट्ट के मुताबिक पक्षियों के मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस में जैविक घड़ी होती है। जो अनेक प्रकार से पक्षियों के व्यवहार एवं प्रवास को नियंत्रित करती है। वर्तमान में 22 प्रकार के प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां गंगा तटों पर देखी गई हैं। वापसी के लिए झुंड में दिखने लगे हैं।
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हीमोग्लोबिन संरचना में परिवर्तन करता है राजहंस
पक्षी वैज्ञानिक डॉ. विनय सेठी के मुताबिक राजहंस हिमालय की ऊंचाई जहां ऑक्सीजन की उपलब्धता काफी कम होती है, उड़ान भरता है। हिमालय को पार कर हिंदुस्तान की सरजमी पर शीतकालीन प्रवास पर आता है। राजहंस को कई दफा एवरेस्ट की ऊंचाई पर भी उड़ते देखा गया है। वैज्ञानिक डॉ. सेठी ने दावा किया कि पर्वत श्रृंखलाओं को पार करते समय राजहंस अपने हीमोग्लोबिन की संरचना में परिवर्तन कर ऑक्सीजन की मांग को कम कर लेता है। शीतकाल में पक्षियों के भारत आने के कारण अधिक स्पष्ट हैं।