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ज्ञान देने वाले गुरुओं को समर्पित है गुरुपूर्णिमा पर्व

Tue, 12 Jul 2022 08:57 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Tue, 12 Jul 2022 08:57 PM IST
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Gurupurnima festival is dedicated to the gurus who give knowledge
तमाम वेद पुराणों का लेखन करने वाले महर्षि वेदव्यास की स्मृति में गुरु पूजा का पर्व बुधवार को श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। गुरुजनों की पूजा होगी और व्यासजी का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। मान्यता है कि राजा दक्ष को दिया वचन निभाने के लिए भगवान आशुतोष इसी दिन एक मास के लिए कनखल आ जाते हैं दक्षेश्वर बनकर विराजमान होते हैं। पूर्णिमा से ही गंगाजल की महायात्रा के लिए शिवभक्तों का आगमन शुरू हो जाएगा।
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ऋषि मुनियों के आश्रमों में चलने वाले गुरुकुलों से गुरु पूजा की परंपरा शुरू हुई। शास्त्रों के अनुसार यह पर्व आरंभ में प्राचीन सप्तऋषियों के आश्रमों से शुरू हुआ था। भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, कश्यप, अत्री, वशिष्ठ और विश्वामित्र के गुरुकुलों में आषाढ़ पूर्णिमा के दिन विद्यार्थी संसार का ज्ञान कराने वाले गुरुओं को यथाशक्ति भावांजलि दिया करते थे। यह दिन तमाम वेद शास्त्रों का ज्ञान कराने वाले महर्षि वेदव्यास का जन्म दिवस भी है। कालांतर में इसी दिन भगवान बुद्ध और महावीर की पूजा उनके अनुयायी करने लगे। धीरे-धीरे गुरु पूजा व्यास पूजा के रूप में मठ मंदिरों, अखाड़ों, आश्रमों एवं शिक्षण संस्थाओं में पहुंच गई। यज्ञोपवीत पहनाकर जिस कुल गुरु ने पहला गुरुमंत्र दिया, उसकी वार्षिक पूजा भी इसी दिन की जाती है।
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पुराणों के अनुसार भगवान शंकर इस ब्रह्मांड और जगत के अनादि गुरु हैं। गुरु की महिमा का गान उनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय ने किया। शिव पुराण एवं स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णन है कि अपनी सवारी मूषक पर सवार गणेश को शिव ने जब अपनी परिक्रमा कर प्रथम पूज्य देव के पद पर आसीन किया, तब गणेश एवं अन्य देवताओं ने शिव को प्रथम गुरुपद पर आसीन कर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन उनकी पूजा की थी। तभी से गुरु पूजा शिवलोक में हो रही है।
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मान्यता है कि अपने ससुर राजा दक्ष को दिया वचन निभाने के लिए शिव गुरु पूर्णिमा के दिन कनखल आते हैं। पूरे श्रावण मास में दक्षेश्वर बनकर विराजमान रहते हैं। उनके प्रतिरूप देश भर के शिवालयों में साकार हो उठते हैं। करोड़ों शिवभक्त पूरे सावन भोले भंडारी का जलाभिषेक पूजा के रूप में करते हैं। शास्त्रीय मान्यता है कि जिसने कभी गुरु धारण न किया हो वह माता-पिता को पूजे। शिव और हनुमान को पूजे। तीनों अजन्मा अनादि देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी आदि गुरु माना गया है। कुलगुरु और कुल पुरोहित को भी गुरु रूप में पूजा जा सकता है।
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