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खेती परंपरागत, सोच वैज्ञानिक और उत्पादन दोगुना
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समय के साथ खेतीबाड़ी का तौर-तरीका बदलकर कई किसान दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। हरिद्वार रानीमाजरा गांव के देशराज सैनी ऐसे ही प्रगतिशील किसान हैं। देशराज परंपरागत तरीकों से खेती करने वाले किसानों की तुलना में धान और गन्ने का दोगुना उत्पादन लेते हैं। 85 साल की उम्र में भी खेतीबाड़ी के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ है। देशराज खेती में वैज्ञानिक तौर तरीके अपनाते हैं। वे दूसरे किसानों से अनुभव साझा कर उनकी किस्मत बदलने काम भी कर रहे हैं। देशराज को ब्लाक से लेकर राज्य स्तर तक कई अवार्ड मिल चुके हैं।
इंटर तक पढ़ाई करने वाले देशराज सैनी कभी सरकारी नौकरी के पीछे दौड़े। नौकरी के लिए कई प्रयास किए। 1958 में बीएचईएल में नौकरी भी लग गई। लेकिन देशराज सैनी को नौकरी से संतुष्टि नहीं मिली। वे नौकरी छोड़ खेती-किसानी से जुड़ गए। किसान परिवार से होने के नाते परंपरागत खेतीबाड़ी करने लगे। सामान्य किसानों की तरह गन्ना, धान, गेहूं और सब्जियां उगाने लगे। कुछ दशकों से यही चलता रहा। लेकिन देशराज का सपना कुछ अलग करने का था। इसके लिए वे उद्यान एवं कृषि विभाग के कार्यालयों एवं गोष्ठियों में शामिल हुए। वहां से उनको वैज्ञानिक तौर तरीकों से खेती करने का आइडिया मिला।
वे पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और कोयंबटूर कृषि रिसर्च सेंटर समेत देशभर के कई कृषि अनुसंधान केंद्रों में गए और ट्रेनिंग ली। उन्होंने नई तकनीक से खेती की शुरुआत गन्ने की फसल से की। गन्ना उत्पादन में हरिद्वार राज्य में सबसे आगे है। उत्पादन में सकारात्मक परिणाम सामने आने से देशराज काफी उत्साहित हुए। इसके बाद उन्होंने धान की खेती में कई प्रयोग किए। दूसरे किसानों की तुलना में उन्होंने गन्ने और धान का दोगुना उत्पादन हासिल किया। उनके दावों की सत्यता जांचने के लिए अधिकारियों ने उनके खेतों का निरीक्षण किया और फिर ब्लाक स्तर पर अवार्ड देकर सम्मानित किया गया। इसके बाद देशराज को जिला और राज्य स्तर पर प्रगतिशील किसान का तमगा मिला।
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देशराज आज प्रदेश के किसानों के बीच किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। देशराज ने हरिद्वार जिले में करीब दो सौ किसानों को खुद से जोड़ा है। वे उनसे अनुभव साझा करते हैं, ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके। ब्लाक स्तर पर किसानों के प्रशिक्षण में पहुंचकर उनको अनुभव बांटकर वैज्ञानिक तौर-तरीकों से खेती करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनसे प्रेरित होकर कई किसान उत्पादन बढ़ाकर खेती में आत्मनिर्भर हो रहे हैं।
एक कुंतल बीज से 100 कुंतल गन्ना
देशराज सैनी एक बीघा भूमि पर एक कुंतल बीज से 100 कुंतल गन्ने का उत्पादन लेते हैं। जबकि सामान्य किसान पांच कुंतल बीज लगाकर 60 कुंतल उत्पादन लेते हैं। इसी तरह एक बीघा में धान की चार कुंतल पैदावार लेते हैं, वहीं अन्य किसान ढाई से तीन कुंतल ही पैदावार ले पाते हैं। वे एक बीघा में एक किलो बीज से पौध तैयार करते हैं, जबकि परंपरागत खेती में एक बीघा के लिए तीन से चार किलो बीज से पौध तैयार होती है। देशराज का बीज कम लगता और उत्पादन अधिक होता है। खेती में जैविक और रासायनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं।
गन्ने के साथ करते हैं मिश्रित खेती
देशराज सैनी बताते हैं उनकी करीब 60 बीघा जमीन है। काफी जमीन ठेके पर ली है। देशराज बताते हैं गन्ने के साथ मिश्रित खेती करते हैं। वैज्ञानिक तरीके से गन्ने के साथ आलू, भिंडी और मसूर की दाल लगाते हैं। इससे गन्ना उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता और दूसरी पैदावार भी आसानी से हो जाती है।
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इंटर तक पढ़ाई करने वाले देशराज सैनी कभी सरकारी नौकरी के पीछे दौड़े। नौकरी के लिए कई प्रयास किए। 1958 में बीएचईएल में नौकरी भी लग गई। लेकिन देशराज सैनी को नौकरी से संतुष्टि नहीं मिली। वे नौकरी छोड़ खेती-किसानी से जुड़ गए। किसान परिवार से होने के नाते परंपरागत खेतीबाड़ी करने लगे। सामान्य किसानों की तरह गन्ना, धान, गेहूं और सब्जियां उगाने लगे। कुछ दशकों से यही चलता रहा। लेकिन देशराज का सपना कुछ अलग करने का था। इसके लिए वे उद्यान एवं कृषि विभाग के कार्यालयों एवं गोष्ठियों में शामिल हुए। वहां से उनको वैज्ञानिक तौर तरीकों से खेती करने का आइडिया मिला।
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वे पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और कोयंबटूर कृषि रिसर्च सेंटर समेत देशभर के कई कृषि अनुसंधान केंद्रों में गए और ट्रेनिंग ली। उन्होंने नई तकनीक से खेती की शुरुआत गन्ने की फसल से की। गन्ना उत्पादन में हरिद्वार राज्य में सबसे आगे है। उत्पादन में सकारात्मक परिणाम सामने आने से देशराज काफी उत्साहित हुए। इसके बाद उन्होंने धान की खेती में कई प्रयोग किए। दूसरे किसानों की तुलना में उन्होंने गन्ने और धान का दोगुना उत्पादन हासिल किया। उनके दावों की सत्यता जांचने के लिए अधिकारियों ने उनके खेतों का निरीक्षण किया और फिर ब्लाक स्तर पर अवार्ड देकर सम्मानित किया गया। इसके बाद देशराज को जिला और राज्य स्तर पर प्रगतिशील किसान का तमगा मिला।
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देशराज आज प्रदेश के किसानों के बीच किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। देशराज ने हरिद्वार जिले में करीब दो सौ किसानों को खुद से जोड़ा है। वे उनसे अनुभव साझा करते हैं, ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके। ब्लाक स्तर पर किसानों के प्रशिक्षण में पहुंचकर उनको अनुभव बांटकर वैज्ञानिक तौर-तरीकों से खेती करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनसे प्रेरित होकर कई किसान उत्पादन बढ़ाकर खेती में आत्मनिर्भर हो रहे हैं।
एक कुंतल बीज से 100 कुंतल गन्ना
देशराज सैनी एक बीघा भूमि पर एक कुंतल बीज से 100 कुंतल गन्ने का उत्पादन लेते हैं। जबकि सामान्य किसान पांच कुंतल बीज लगाकर 60 कुंतल उत्पादन लेते हैं। इसी तरह एक बीघा में धान की चार कुंतल पैदावार लेते हैं, वहीं अन्य किसान ढाई से तीन कुंतल ही पैदावार ले पाते हैं। वे एक बीघा में एक किलो बीज से पौध तैयार करते हैं, जबकि परंपरागत खेती में एक बीघा के लिए तीन से चार किलो बीज से पौध तैयार होती है। देशराज का बीज कम लगता और उत्पादन अधिक होता है। खेती में जैविक और रासायनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं।
गन्ने के साथ करते हैं मिश्रित खेती
देशराज सैनी बताते हैं उनकी करीब 60 बीघा जमीन है। काफी जमीन ठेके पर ली है। देशराज बताते हैं गन्ने के साथ मिश्रित खेती करते हैं। वैज्ञानिक तरीके से गन्ने के साथ आलू, भिंडी और मसूर की दाल लगाते हैं। इससे गन्ना उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता और दूसरी पैदावार भी आसानी से हो जाती है।