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ेहन में घर कर गई थी नकारात्मक ऊर्जा
Updated Mon, 05 Feb 2018 11:04 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
आठवीं जमात में पढ़ रहे छात्र सात्विक शर्मा के जेहन में नकारात्मक ऊर्जा इस कदर घर कर गई थी कि उसने खुदकुशी की ठान ही ली थी। उसकी मुख्य वजह ये थी कि छात्र को इल्म था कि वह इस साल पास नहीं होने वाला है। हालांकि माता- पिता ने उसकी हर शर्त पर अपनी मोहर लगा दी थी पर फिर भी छात्र ने मौत से दोस्ती कर ली।
कई साल से हाथ पैर हिलने की बीमारी से ग्रस्त छात्र की तबियत कई माह से बेहद ही खराब चल रही थी। वह स्कूल भी नहीं जा रहा था। छात्र ने अपने पिता से जब यह जिक्र किया था कि उसका कोर्स छूट चुका है इसलिए वह फेल हो सकता है। फेल होने पर स्कूल बदलने की बात पर पिता ने हामी भर ली थी। पर, छात्र के जेहन में नकारात्मक ऊर्जा का ज्वार घुमड़ रहा था। दोपहर तक वह घर से बाहर नहीं निकलता था क्योंकि कही उससे कोई यह न पूछ लें कि वह स्कूल क्यों नहीं गया। बेटे की हर ख्वाहिश माता पिता पूरी कर रहे थे। कुछ दिन पहले छात्र पिस्टल से संबंधित जानकारी का अध्ययन भी कर रहा था और एक मेडिकल स्टोर पर भी जब वह कुछ गलत चीज लेने गया था तब मेडिकल स्टोर स्वामी ने उसे बेहद डांटा था। बड़े ही सरल सहज भाव से छात्र ने यह बात अपनी मां को भी बता दी थी तब मां ने उसे काफी समझाया था। पर, कोई मां बाप शायद ही कभी ऐसा सोचेगा कि उसका लाडला इस हद तक गुजर जाएगा।
बेटा एक बार पिता से बात कर ली होती
इकलौते बेटे को खो चुके पेशे से तीर्थ पुरोहित श्वेकांत शर्मा की जुबां से बार बार यही बोल फूट रहे थे कि बेटा एक बार तो पिता से बात कर ली होती। जीवन भर यही बात तकलीफ देती रहेगी कि वह काश पांच मिनट पहले घर पहुंच गया होता तो उसका बेटा इस तरह का कदम न उठाता। जिला अस्पताल में मौजूद पिता की आंखों से झरने की तरह अश्रुधारा बहती रही, हर कोई उसे संभालने में जुटा रहा। बकौल पिता कि उन्हें जरा भी इल्म नहीं था कि बेटा इतना बड़ा कदम उठा लेगा। दो दिन पहले कार चलाने की ख्वाहिश व्यक्त की थी, कार चलाकर वह बेहद खुश था। पिता बोले कि गाने सुनने के शौकीन रहे बेटे ने अपने रिश्ते के भाई को कमरे से भेज दिया था, काश वह वहां से नहीं गया होता। बोले कि बेटे की खातिर सामाजिक, पारिवारिक कार्यक्रम तक में जाना बंद कर दिया था, जब बेटा बुलाता था तब वह दौड़कर चले आते थे। वह बस पांच मिनट की देरी से घर पहुंचे थे, यदि जल्दी पहुंच गए होते तब शायद बेटा को बचा लेने में कामयाब रहते। बकौल पिता की मां भी चंद मिनट के लिए बाजार गई थी, तब उसने ही अपनी जेब से मां को पैसे दिए थे कि कही कोई कमी पेशी न रह जाए।
हरिद्वार।
आठवीं जमात में पढ़ रहे छात्र सात्विक शर्मा के जेहन में नकारात्मक ऊर्जा इस कदर घर कर गई थी कि उसने खुदकुशी की ठान ही ली थी। उसकी मुख्य वजह ये थी कि छात्र को इल्म था कि वह इस साल पास नहीं होने वाला है। हालांकि माता- पिता ने उसकी हर शर्त पर अपनी मोहर लगा दी थी पर फिर भी छात्र ने मौत से दोस्ती कर ली।
कई साल से हाथ पैर हिलने की बीमारी से ग्रस्त छात्र की तबियत कई माह से बेहद ही खराब चल रही थी। वह स्कूल भी नहीं जा रहा था। छात्र ने अपने पिता से जब यह जिक्र किया था कि उसका कोर्स छूट चुका है इसलिए वह फेल हो सकता है। फेल होने पर स्कूल बदलने की बात पर पिता ने हामी भर ली थी। पर, छात्र के जेहन में नकारात्मक ऊर्जा का ज्वार घुमड़ रहा था। दोपहर तक वह घर से बाहर नहीं निकलता था क्योंकि कही उससे कोई यह न पूछ लें कि वह स्कूल क्यों नहीं गया। बेटे की हर ख्वाहिश माता पिता पूरी कर रहे थे। कुछ दिन पहले छात्र पिस्टल से संबंधित जानकारी का अध्ययन भी कर रहा था और एक मेडिकल स्टोर पर भी जब वह कुछ गलत चीज लेने गया था तब मेडिकल स्टोर स्वामी ने उसे बेहद डांटा था। बड़े ही सरल सहज भाव से छात्र ने यह बात अपनी मां को भी बता दी थी तब मां ने उसे काफी समझाया था। पर, कोई मां बाप शायद ही कभी ऐसा सोचेगा कि उसका लाडला इस हद तक गुजर जाएगा।
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बेटा एक बार पिता से बात कर ली होती
इकलौते बेटे को खो चुके पेशे से तीर्थ पुरोहित श्वेकांत शर्मा की जुबां से बार बार यही बोल फूट रहे थे कि बेटा एक बार तो पिता से बात कर ली होती। जीवन भर यही बात तकलीफ देती रहेगी कि वह काश पांच मिनट पहले घर पहुंच गया होता तो उसका बेटा इस तरह का कदम न उठाता। जिला अस्पताल में मौजूद पिता की आंखों से झरने की तरह अश्रुधारा बहती रही, हर कोई उसे संभालने में जुटा रहा। बकौल पिता कि उन्हें जरा भी इल्म नहीं था कि बेटा इतना बड़ा कदम उठा लेगा। दो दिन पहले कार चलाने की ख्वाहिश व्यक्त की थी, कार चलाकर वह बेहद खुश था। पिता बोले कि गाने सुनने के शौकीन रहे बेटे ने अपने रिश्ते के भाई को कमरे से भेज दिया था, काश वह वहां से नहीं गया होता। बोले कि बेटे की खातिर सामाजिक, पारिवारिक कार्यक्रम तक में जाना बंद कर दिया था, जब बेटा बुलाता था तब वह दौड़कर चले आते थे। वह बस पांच मिनट की देरी से घर पहुंचे थे, यदि जल्दी पहुंच गए होते तब शायद बेटा को बचा लेने में कामयाब रहते। बकौल पिता की मां भी चंद मिनट के लिए बाजार गई थी, तब उसने ही अपनी जेब से मां को पैसे दिए थे कि कही कोई कमी पेशी न रह जाए।
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