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अपर सचिव ने खुद को सौंपी जांच
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Fri, 14 Apr 2017 09:51 PM IST
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शासन ने मातृसदन की शिकायत पर एक वरिष्ठ अधिकारी की जांच कनिष्ठ अधिकारी को सौंप दी। कनिष्ठ अधिकारी एक कदम और आगे निकले, उन्होंने घुमा फिराकर खुद को ही जांच के लिए चिट्ठी लिख डाली। मामला मुख्य सचिव एस रामास्वामी, औद्योगिक सचिव शैलेश बगोली और अपर सचिव विनय शंकर पांडेय से जुड़ा है। मातृसदन ने पूरे मामले पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को चिट्ठी भेजकर जीरो टॉलरेंस के मायने पूछे हैं।
मातृसदन में पत्रकार वार्ता करते हुए स्वामी शिवानंद ने बताया कि गंगा में खनन को लेकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में गलत तथ्य पेश करने पर उन्होंने बीते आठ जनवरी को सीपीसीबी में औद्योगिक सचिव शैलेष बगोली की शिकायत की थी। साथ ही आठ फरवरी को एक शिकायती पत्र मुख्य सचिव एस रामास्वामी को भी भेजा था। इस पत्र का संज्ञान लेने के बाद जांच अपर सचिव विनय शंकर पांडेय को सौंप दी गई।
विनय शंकर पांडेय ने मार्च के महीने में जांच आगे निदेशक भूतत्व एवं खनिकर्म निदेशालय उत्तराखंड को सौंप दी। ताअज्जुब की बात यह है कि विनय शंकर पांडेय ही खुद सालभर से निदेशक खनिकर्म का चार्ज संभाल रहे हैं। स्वामी शिवानंद ने आरोप लगाया कि ऐसा अद्भुत मामला पूरे देश में शायद ही कहीं सामने आया हो कि कोई अधिकारी खुद को ही जांच के लिए चिट्ठी लिखता है और खुद से रिपोर्ट भी मांगता है। उन्होंने कहा कि विनय शंकर पांडेय खुद शैलेष बगौली के अधीनस्थ हैं, ऐसे में वह अपने वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई तो दूर जांच ही कैसे करेंगे। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भेजे गए पत्र में स्वामी शिवानंद ने कहा कि आपके महीने भर के कार्यकाल में भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच गया है, यह उसका उदाहरण है। ऐसे में आपका जीरो टॉलरेंस वाला बयान जुमला नहीं तो और क्या है।
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स्वामी शिवानंद ने मुख्यमंत्री से औद्योगिक सचिव शैलेष बगोली और निदेशक खनिकर्म विनय शंकर पांडेय को उद्योग व खनन विभाग से हटाने और मामले की जांच मंडलायुक्त डी सेंथिल पांडियन से कराने की मांग भी की। स्वामी शिवानंद ने कहा कि सेंथिल पांडियन ही ऐसे अधिकारी हैं, जिन पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी भरोसा
चींटी की गति से भी देर में पहुंचा पत्र जांच को लेकर अपर सचिव विनय शंकर पांडेय की ओर से 9 मार्च को जारी पत्र मातृसदन को 13 अप्रैल को मिला है। स्वामी शिवानंद ने कहा कि यदि चींटी अपनी औसत गति से देहरादून से हरिद्वार के लिए रोजाना 12 घंटे चले तो वह 25 दिन में हरिद्वार पहुंच सकती है, लेकिन यह पत्र 34 दिन में देहरादून से हरिद्वार पहुंचा है। यह बहुत गंभीर प्रश्न है।
सुप्रीम कोर्ट में गलत तथ्य दिए तो जिम्मेदार
खनन पर लगी रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विशेष याचिका को लेकर भी मातृसदन ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और औद्योगिक सचिव को पत्र भेजा है। गंगा में खनन को लेकर कुछ तथ्य भेजते हुए कहा गया है कि यदि आपने सुप्रीम कोर्ट में इन तथ्यों को छिपाया है तो तथ्य छिपाने के जिम्मेदार आप खुद होंगे। इससे पहले स्वामी शिवानंद ने यह आरोप भी लगाया था कि सरकार कोर्ट में रेत के खनन पर बहस कर गुमराह करती है और नदियों में पत्थरों का खनन करती है।
इंदिरा हृदयेश के बयान पर बिफरे शिवानंद
नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के बयान पर स्वामी शिवानंद ने कड़ी आपत्ति जताई। बृहस्पतिवार को हरिद्वार पहुंची इंदिरा हृदयेश ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए चुगान की पैरवी की थी। इस पर स्वामी शिवानंद ने आरोप लगाया कि शराब माफिया से मिलने वाला धन केवल सत्ता पक्ष को जाता है, जबकि खनन माफिया सत्ता और विपक्ष दोनों को हिस्सा देते हैं। उन्होंने कहा कि इंदिरा हृदयेश बीते चुनाव में हरीश रावत की दशा से सबक लें। इंदिरा को चुगान का अर्थ समझाते हुए स्वामी शिवानंद ने कहा कि पेड़ से खुद गिरने वाले आम को चुगने पर उसे चुगान कहा जा सकता है। दो वैज्ञानिक रिपोर्ट में ऊपर से पत्थर न आने की बात साबित हो चुकी है तो गंगा में खनन या चुगान का क्या औचित्य है।
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मातृसदन में पत्रकार वार्ता करते हुए स्वामी शिवानंद ने बताया कि गंगा में खनन को लेकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में गलत तथ्य पेश करने पर उन्होंने बीते आठ जनवरी को सीपीसीबी में औद्योगिक सचिव शैलेष बगोली की शिकायत की थी। साथ ही आठ फरवरी को एक शिकायती पत्र मुख्य सचिव एस रामास्वामी को भी भेजा था। इस पत्र का संज्ञान लेने के बाद जांच अपर सचिव विनय शंकर पांडेय को सौंप दी गई।
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विनय शंकर पांडेय ने मार्च के महीने में जांच आगे निदेशक भूतत्व एवं खनिकर्म निदेशालय उत्तराखंड को सौंप दी। ताअज्जुब की बात यह है कि विनय शंकर पांडेय ही खुद सालभर से निदेशक खनिकर्म का चार्ज संभाल रहे हैं। स्वामी शिवानंद ने आरोप लगाया कि ऐसा अद्भुत मामला पूरे देश में शायद ही कहीं सामने आया हो कि कोई अधिकारी खुद को ही जांच के लिए चिट्ठी लिखता है और खुद से रिपोर्ट भी मांगता है। उन्होंने कहा कि विनय शंकर पांडेय खुद शैलेष बगौली के अधीनस्थ हैं, ऐसे में वह अपने वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई तो दूर जांच ही कैसे करेंगे। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भेजे गए पत्र में स्वामी शिवानंद ने कहा कि आपके महीने भर के कार्यकाल में भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच गया है, यह उसका उदाहरण है। ऐसे में आपका जीरो टॉलरेंस वाला बयान जुमला नहीं तो और क्या है।
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स्वामी शिवानंद ने मुख्यमंत्री से औद्योगिक सचिव शैलेष बगोली और निदेशक खनिकर्म विनय शंकर पांडेय को उद्योग व खनन विभाग से हटाने और मामले की जांच मंडलायुक्त डी सेंथिल पांडियन से कराने की मांग भी की। स्वामी शिवानंद ने कहा कि सेंथिल पांडियन ही ऐसे अधिकारी हैं, जिन पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी भरोसा
चींटी की गति से भी देर में पहुंचा पत्र जांच को लेकर अपर सचिव विनय शंकर पांडेय की ओर से 9 मार्च को जारी पत्र मातृसदन को 13 अप्रैल को मिला है। स्वामी शिवानंद ने कहा कि यदि चींटी अपनी औसत गति से देहरादून से हरिद्वार के लिए रोजाना 12 घंटे चले तो वह 25 दिन में हरिद्वार पहुंच सकती है, लेकिन यह पत्र 34 दिन में देहरादून से हरिद्वार पहुंचा है। यह बहुत गंभीर प्रश्न है।
सुप्रीम कोर्ट में गलत तथ्य दिए तो जिम्मेदार
खनन पर लगी रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विशेष याचिका को लेकर भी मातृसदन ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और औद्योगिक सचिव को पत्र भेजा है। गंगा में खनन को लेकर कुछ तथ्य भेजते हुए कहा गया है कि यदि आपने सुप्रीम कोर्ट में इन तथ्यों को छिपाया है तो तथ्य छिपाने के जिम्मेदार आप खुद होंगे। इससे पहले स्वामी शिवानंद ने यह आरोप भी लगाया था कि सरकार कोर्ट में रेत के खनन पर बहस कर गुमराह करती है और नदियों में पत्थरों का खनन करती है।
इंदिरा हृदयेश के बयान पर बिफरे शिवानंद
नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के बयान पर स्वामी शिवानंद ने कड़ी आपत्ति जताई। बृहस्पतिवार को हरिद्वार पहुंची इंदिरा हृदयेश ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए चुगान की पैरवी की थी। इस पर स्वामी शिवानंद ने आरोप लगाया कि शराब माफिया से मिलने वाला धन केवल सत्ता पक्ष को जाता है, जबकि खनन माफिया सत्ता और विपक्ष दोनों को हिस्सा देते हैं। उन्होंने कहा कि इंदिरा हृदयेश बीते चुनाव में हरीश रावत की दशा से सबक लें। इंदिरा को चुगान का अर्थ समझाते हुए स्वामी शिवानंद ने कहा कि पेड़ से खुद गिरने वाले आम को चुगने पर उसे चुगान कहा जा सकता है। दो वैज्ञानिक रिपोर्ट में ऊपर से पत्थर न आने की बात साबित हो चुकी है तो गंगा में खनन या चुगान का क्या औचित्य है।