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श्रावणी पूर्णिमा पर रविवार को कैलाश लौट जाएंगे महारुद्र
Updated Sat, 25 Aug 2018 11:20 PM IST
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कौशल सिखौला
हरिद्वार। एक महीने से ससुराल आकर दक्ष को दिया वचन निभाते हुए दक्षेश्वर बने महारुद्र भगवान शंकर श्रावणी पूर्णिमा के दिन कैलाश पर लौट जाएंगे। उनकी वापसी धरती पर देव-ऋषि और पितृ तर्पण के बाद होगी। प्रात:काल हजारों पुरोहित हेमाद्री संकल्प से घंटों चलने वाला पवित्र स्नान करेंगे और श्रावणी उपाकर्म के साथ रक्षा सूत्रों तथा यज्ञोपवीतों का संधान किया जाएगा।
श्रावणी का यह रक्षा सूत्र बंधन धरती का सबसे पुराना सतयुगीन पर्व है। शेष पर्व द्वापर अथवा त्रेता में शुरू हुए। इस दिन राष्ट्र एवं विश्व रक्षा के लिए वैदिक मंत्रों से सारे कष्टों के नाश करने वाला लंबा कुशा स्नान किया जाता है। हेमाद्री संकल्प, तर्पण और उपाकर्म ये तीनों इस पर्व के अंग है। गंगा आदि पवित्र नदियों के तटों पर नैष्ठिक साधक अनेक प्रकार से स्नान करते हैं। इन स्नानों में धान्य, कुशोदक, भस्म, मृतिका, गोमेय, पंचगव्य, गो रज, फल पुष्प, सर्वोषधि आदि से लंबा स्नान किया जाता है। हेमाद्रि संकल्प के दस स्नान महत्वपूर्ण है। वैदिक पर्व होने से यजुर्वेदीय, ऋग्वेदीय, सामवेदीय तथा अथर्ववेदीय परंपराओं में इस पर्व के विधान में अलग-अलग बताए गए है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार श्रावणी का यह पर्व सृष्टि और प्रकृति के प्रति समर्पण का पर्व है। यह संस्कार शिखा बंधन से शुरू होता है और देव ऋषि तर्पण पर संपन्न होता है। वैदिक मंत्रों के माध्यम से मानव मात्र को द्विज बनाने के परंपरा इस पर्व से शुरू हुई।
श्रावणी उपाकर्म के बाद संधानित रक्षा सूत्र और यज्ञोपवीत वर्ष भर धारण किए जाते हैं। भाइयों की कलाईयों पर बहनों द्वारा राखी बांधने के पर्व तो बाद में शुरू हुए, पहले चारों वर्णों की कलाई पर पुरोहित ही रक्षा सूत्र बांधते थे। कुछ क्षेत्रों में आज भी बहनों के स्थान पर पुरोहित ही रक्षा सूत्र बांधते हैं। वैदिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन संधानित रक्षा सूत्र अपनी कलाई पर वर्ष भर बांधे रखेगा, उसे मृत्यु का भी भय उस वर्ष नहीं रहता। देश के सभी तीर्थों पर यह लंबा और अनूठा पर्व पूरे दिन मनाया जाएगा। वास्तव में श्रावणी पर्व सृष्टि के आगमन का दिन है। इसी दिन से इस सृष्टि की शुरुआत ब्रह्मांड में हुई थी।
हरिद्वार। एक महीने से ससुराल आकर दक्ष को दिया वचन निभाते हुए दक्षेश्वर बने महारुद्र भगवान शंकर श्रावणी पूर्णिमा के दिन कैलाश पर लौट जाएंगे। उनकी वापसी धरती पर देव-ऋषि और पितृ तर्पण के बाद होगी। प्रात:काल हजारों पुरोहित हेमाद्री संकल्प से घंटों चलने वाला पवित्र स्नान करेंगे और श्रावणी उपाकर्म के साथ रक्षा सूत्रों तथा यज्ञोपवीतों का संधान किया जाएगा।
श्रावणी का यह रक्षा सूत्र बंधन धरती का सबसे पुराना सतयुगीन पर्व है। शेष पर्व द्वापर अथवा त्रेता में शुरू हुए। इस दिन राष्ट्र एवं विश्व रक्षा के लिए वैदिक मंत्रों से सारे कष्टों के नाश करने वाला लंबा कुशा स्नान किया जाता है। हेमाद्री संकल्प, तर्पण और उपाकर्म ये तीनों इस पर्व के अंग है। गंगा आदि पवित्र नदियों के तटों पर नैष्ठिक साधक अनेक प्रकार से स्नान करते हैं। इन स्नानों में धान्य, कुशोदक, भस्म, मृतिका, गोमेय, पंचगव्य, गो रज, फल पुष्प, सर्वोषधि आदि से लंबा स्नान किया जाता है। हेमाद्रि संकल्प के दस स्नान महत्वपूर्ण है। वैदिक पर्व होने से यजुर्वेदीय, ऋग्वेदीय, सामवेदीय तथा अथर्ववेदीय परंपराओं में इस पर्व के विधान में अलग-अलग बताए गए है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार श्रावणी का यह पर्व सृष्टि और प्रकृति के प्रति समर्पण का पर्व है। यह संस्कार शिखा बंधन से शुरू होता है और देव ऋषि तर्पण पर संपन्न होता है। वैदिक मंत्रों के माध्यम से मानव मात्र को द्विज बनाने के परंपरा इस पर्व से शुरू हुई।
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श्रावणी उपाकर्म के बाद संधानित रक्षा सूत्र और यज्ञोपवीत वर्ष भर धारण किए जाते हैं। भाइयों की कलाईयों पर बहनों द्वारा राखी बांधने के पर्व तो बाद में शुरू हुए, पहले चारों वर्णों की कलाई पर पुरोहित ही रक्षा सूत्र बांधते थे। कुछ क्षेत्रों में आज भी बहनों के स्थान पर पुरोहित ही रक्षा सूत्र बांधते हैं। वैदिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन संधानित रक्षा सूत्र अपनी कलाई पर वर्ष भर बांधे रखेगा, उसे मृत्यु का भी भय उस वर्ष नहीं रहता। देश के सभी तीर्थों पर यह लंबा और अनूठा पर्व पूरे दिन मनाया जाएगा। वास्तव में श्रावणी पर्व सृष्टि के आगमन का दिन है। इसी दिन से इस सृष्टि की शुरुआत ब्रह्मांड में हुई थी।
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