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ग्यारह हजार पार्थिव शिवलिंगों का पूजन
Updated Thu, 23 Aug 2018 11:04 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार। श्रावण शुक्ल पक्ष के प्रदोष के दिन हरिद्वार के सेवा समिति भवन में पार्थिव शिवलिंगों के पूजन का भव्य समारोह हुआ। सैकड़ों भक्तों ने मिट्टी के ग्यारह हजार शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा- अर्चना की। बाद में शोभायात्रा के साथ शिवलिंगों का विसर्जन गंगाजी में किया गया। टाटवाले बाबा के समाधि स्थल पर संतों की सभा भी हुई।
प्रसिद्ध कथाव्यास पं. रामजी पांडेय पौराणिक के संयोजन में धर्मनगरी के सैकड़ों लोगों ने पार्थिव शिवलिंग तैयार किए। पौराणिक ने बताया कि पार्थिव शिवलिंगों के पूजन का श्रावण में अपार महात्म्य है। ऐसा करने वाले भक्त फिर पुनर्जन्म नहीं लेते। उन्होंने कहा कि शिव ऐसे देवता है जो लगातार देते हैं। वे मांगने वालों से तंग नहीं होते। वे ऐसे औधड़दानी हैं, जो देना पसंद करते हैं। बस भक्त ने मांगा और उन्होंने दिया। भस्मासुर की कथा सुनाते हुए पौराणिक ने कहा कि शिव का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वे सृष्टि के संहारक हैं। जिसका जो चाहे बिगाड़ सकते हैं। प्राण बचाकर तीनों लोकों में भ्रमण कर रहे भस्मासुर को आखिर शिव ने भस्म कर ही दिया। महामंडलेश्वर हरिचेतनानंद ने कहा कि शिव सृष्टि का संचालन भी करते हैं और संहार भी। शिव के बगैर इस प्रकृति की कल्पना असंभव है। महामंडलेश्वर डा. श्यामसुंदर शास्त्री ने कहा कि शिव ऐसे देव है जो तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। वे तो केवल जल से संतुष्ट होते हैं और मनवांछित फल देते हैं। स्वामी हरिहरानंद ने कहा कि सावन महीना शिव को अति प्रिय हैं। रविदेव शास्त्री ने शिवभजन के बारे में बताया।
सेवा समिति भवन में सभी पार्थिव शिवलिंगों का जलाभिषेक गंगा जल सें किया गया। सभी लिंगों को बेलपत्र चढ़ाए गए। आचार्य रामकैलाश शुक्ल ने वैदिक मंत्रों से अनुष्ठान संपन्न कराया। आचार्य संगीता और संदीप तिवारी ने मधुर भजनों की गंगा बहाई। सेवा समिति भवन से भव्य शोभायात्रा बैंडबाजे के साथ प्रारंभ हुई। महिलाओं ने पार्थिव शिवलिंगों को परात में रखकर अपने सर पर उठा रखा था। टाटवाले बाबा के समाधि स्थल पर पुन: हुई सभा के बाद सभी शिवलिंग गंगा में विसर्जित कर दिए गए।
हरिद्वार। श्रावण शुक्ल पक्ष के प्रदोष के दिन हरिद्वार के सेवा समिति भवन में पार्थिव शिवलिंगों के पूजन का भव्य समारोह हुआ। सैकड़ों भक्तों ने मिट्टी के ग्यारह हजार शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा- अर्चना की। बाद में शोभायात्रा के साथ शिवलिंगों का विसर्जन गंगाजी में किया गया। टाटवाले बाबा के समाधि स्थल पर संतों की सभा भी हुई।
प्रसिद्ध कथाव्यास पं. रामजी पांडेय पौराणिक के संयोजन में धर्मनगरी के सैकड़ों लोगों ने पार्थिव शिवलिंग तैयार किए। पौराणिक ने बताया कि पार्थिव शिवलिंगों के पूजन का श्रावण में अपार महात्म्य है। ऐसा करने वाले भक्त फिर पुनर्जन्म नहीं लेते। उन्होंने कहा कि शिव ऐसे देवता है जो लगातार देते हैं। वे मांगने वालों से तंग नहीं होते। वे ऐसे औधड़दानी हैं, जो देना पसंद करते हैं। बस भक्त ने मांगा और उन्होंने दिया। भस्मासुर की कथा सुनाते हुए पौराणिक ने कहा कि शिव का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वे सृष्टि के संहारक हैं। जिसका जो चाहे बिगाड़ सकते हैं। प्राण बचाकर तीनों लोकों में भ्रमण कर रहे भस्मासुर को आखिर शिव ने भस्म कर ही दिया। महामंडलेश्वर हरिचेतनानंद ने कहा कि शिव सृष्टि का संचालन भी करते हैं और संहार भी। शिव के बगैर इस प्रकृति की कल्पना असंभव है। महामंडलेश्वर डा. श्यामसुंदर शास्त्री ने कहा कि शिव ऐसे देव है जो तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। वे तो केवल जल से संतुष्ट होते हैं और मनवांछित फल देते हैं। स्वामी हरिहरानंद ने कहा कि सावन महीना शिव को अति प्रिय हैं। रविदेव शास्त्री ने शिवभजन के बारे में बताया।
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सेवा समिति भवन में सभी पार्थिव शिवलिंगों का जलाभिषेक गंगा जल सें किया गया। सभी लिंगों को बेलपत्र चढ़ाए गए। आचार्य रामकैलाश शुक्ल ने वैदिक मंत्रों से अनुष्ठान संपन्न कराया। आचार्य संगीता और संदीप तिवारी ने मधुर भजनों की गंगा बहाई। सेवा समिति भवन से भव्य शोभायात्रा बैंडबाजे के साथ प्रारंभ हुई। महिलाओं ने पार्थिव शिवलिंगों को परात में रखकर अपने सर पर उठा रखा था। टाटवाले बाबा के समाधि स्थल पर पुन: हुई सभा के बाद सभी शिवलिंग गंगा में विसर्जित कर दिए गए।
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