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वसंत पर आज खुदेगी होली, होगा सरस्वती पूजन
Updated Sun, 21 Jan 2018 11:53 PM IST
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हरिद्वार। वसंत पंचमी पर सोमवार को पंचपुरी में अनेक स्थानों पर होली खोदी जाएगी। जगह-जगह होली के ध्वज चढ़ाए जाएंगे। इस दिन अनेक स्थानों पर विद्या और संगीत की देवी मां सरस्वती का पूजन भी होगा।
वसंत पंचमी वाग्देवी के पूजन का प्राचीन पर्व है। इस दिन पीले वस्त्र पहनकर मां सरस्वती की पूजा की जाती है। घरों में हल्दी और केसरयुक्त पीले पदार्थ बनते हैं। घरों को पीले फूलों से सजाया जाता है। यह सब वसंत ऋतु के आगमन की प्रतीक्षा में होता है। वसंत के इसी दिन से पतंगबाजी भी जुड़ गई है। पंचपुरी में दिन भर खूब पतंग उड़ाई जाएगी। सायंकाल प्राचीन होलिका दहन स्थलों पर गड्ढे खोदकर ध्वजारोहण होगा। इसी ध्वज पर सवा महीने बाद होली की लकड़ी आदि रखे जाएंगे। इस ध्वज में बुराई की प्रतीक होलिका के साथ उसी दिन आग लगेगी। अभी कुछ वर्ष पूर्व तक होली दहन स्थलों पर बड़े-बड़े पांच फीट गहरे गड्ढे खोदकर होली का हुल्लड़ मनाया जाता था। सवा महीने तक लोगों की टोपियां खुदी हुई होली में गिराई जाती और टोपी वापस पाने के लिए लोगों केे कुछ धनराशि बच्चों को चुकानी पड़ती थी। होली का यह हुल्लड़ पूरे सवा महीने चलता। अब बदलते जमाने के अनुसार मात्र एक छोटा सा गड्ढा खोदा जाता है, ताकि ऊंचा ध्वज स्थापित किया जा सके। वसंत पंचमी का दिन उल्लास का दिन है। इस दिन नये मौसम का आगाज होता है।
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जीवन-जीने का पर्व है वसंत पंचमी
हरिद्वार। इतिहासकार डा. विष्णुदत्त ने बताया कि यह पर्व जीवन को उसके वास्तविक रूप में जीने का पर्व है। पंचमी तिथि को श्रीपंचमी भी कहा जाता है। इसी दिन त्रिपुर सुंदरी शिव प्रिया ललिता का प्राकट्य हुआ था। कालीदास ने ऋतुश्रंहार, श्रीहर्ष ने रत्नावली, भवभूति ने मालतीमाघव और भोज ने सरस्वती कंठाभरण में इस पर्व को उत्सव कहकर संबोधित किया है। इस पवित्रता, उदात्तता और सौंर्दयानुभूति अद्भुत है। डा. राकेश ने कहा कि वसंत पर रंगबिरंगे कपड़ों की दरकार नहीं। नई पीढ़ी को इसे सुवसंत के रूप में लेना चाहिए।
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वसंत पंचमी वाग्देवी के पूजन का प्राचीन पर्व है। इस दिन पीले वस्त्र पहनकर मां सरस्वती की पूजा की जाती है। घरों में हल्दी और केसरयुक्त पीले पदार्थ बनते हैं। घरों को पीले फूलों से सजाया जाता है। यह सब वसंत ऋतु के आगमन की प्रतीक्षा में होता है। वसंत के इसी दिन से पतंगबाजी भी जुड़ गई है। पंचपुरी में दिन भर खूब पतंग उड़ाई जाएगी। सायंकाल प्राचीन होलिका दहन स्थलों पर गड्ढे खोदकर ध्वजारोहण होगा। इसी ध्वज पर सवा महीने बाद होली की लकड़ी आदि रखे जाएंगे। इस ध्वज में बुराई की प्रतीक होलिका के साथ उसी दिन आग लगेगी। अभी कुछ वर्ष पूर्व तक होली दहन स्थलों पर बड़े-बड़े पांच फीट गहरे गड्ढे खोदकर होली का हुल्लड़ मनाया जाता था। सवा महीने तक लोगों की टोपियां खुदी हुई होली में गिराई जाती और टोपी वापस पाने के लिए लोगों केे कुछ धनराशि बच्चों को चुकानी पड़ती थी। होली का यह हुल्लड़ पूरे सवा महीने चलता। अब बदलते जमाने के अनुसार मात्र एक छोटा सा गड्ढा खोदा जाता है, ताकि ऊंचा ध्वज स्थापित किया जा सके। वसंत पंचमी का दिन उल्लास का दिन है। इस दिन नये मौसम का आगाज होता है।
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जीवन-जीने का पर्व है वसंत पंचमी
हरिद्वार। इतिहासकार डा. विष्णुदत्त ने बताया कि यह पर्व जीवन को उसके वास्तविक रूप में जीने का पर्व है। पंचमी तिथि को श्रीपंचमी भी कहा जाता है। इसी दिन त्रिपुर सुंदरी शिव प्रिया ललिता का प्राकट्य हुआ था। कालीदास ने ऋतुश्रंहार, श्रीहर्ष ने रत्नावली, भवभूति ने मालतीमाघव और भोज ने सरस्वती कंठाभरण में इस पर्व को उत्सव कहकर संबोधित किया है। इस पवित्रता, उदात्तता और सौंर्दयानुभूति अद्भुत है। डा. राकेश ने कहा कि वसंत पर रंगबिरंगे कपड़ों की दरकार नहीं। नई पीढ़ी को इसे सुवसंत के रूप में लेना चाहिए।
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