{"_id":"5af9c3e54f1c1bd5408b54bc","slug":"181526318053-haridwar-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"भवनों के शिखरों पर भी वे और बाजार में भी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भवनों के शिखरों पर भी वे और बाजार में भी
Updated Mon, 14 May 2018 10:44 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
कौशल सिखौला
हरिद्वार।
धर्मनगरी अब मूर्ति बाजार के रूप में भी अपनी पहचान बना रही है। करीब चार दशक पहले हरिद्वार के बाजारों में देव प्रतिमाएं बिक्री के लिए आई। धीरे-धीरे यहां मूर्ति बाजार बढ़ता गया। मोती बाजार, बड़ा बाजार और सब्जी मंडी क्षेत्र में हर दसवीं दुकान मूर्ति की दुकान में बदल गई। मूर्ति खरीदने के लिए सभी प्रांतों के लोग जयपुर जाते थे। अब हरिद्वार का मूर्ति बाजार परवान चढ़ गया। हरिद्वार में बढ़ते बाजार की साख देखकर राजस्थान से प्रसिद्ध मूर्तिकार परीडा जैसे कई कलाकार हरिद्वार में ही आ बसे। इस समय जयपुर के बाद उत्तर भारत का सबसे बड़ा मूर्ति बाजार हरिद्वार बन चुका है। उत्तरी राज्यों के अधिकांश मंदिरों में हरिद्वार से ले जाई गई प्रतिमाओं की ही प्राण प्रतिष्ठा हुई।
धर्मनगरी में भगवान मंदिरों में तो हैं ही, साथ ही भवनों के शिखरों और बाजार में गोदामों-दुकानों पर भी हैं। चारों ओर भगवान ही भगवान हैं। ऐसी नगरी जहां भगवान पूजे भी जाते हैं और बिकते भी। उत्तर भारत में मूर्तियों के सबसे बड़े बाजार के रूप में ढल चुका है हरिद्वार।
विज्ञापन
यूं तो यह साक्षात जल रूप होकर बह रही मां गंगा की नगरी है। यहां भगवान का मूर्ति रूप नहीं, जीवंत रूप पूजा जाता है। बारहमासी पूजा तो मां गंगा की ही होती थी। समय बदलने के साथ मंदिरों की संख्या बढ़ती गई। मध्य युग का भक्तिकाल आने पर भवनों के प्रवेश द्वार के शिखर पर देवों की मूर्ति स्थापित करने की परंपरा शुरू हुई। कालांतर में तो अखाड़ों और मठों के बड़े-बड़े हाथी द्वार बनने लगे, जिन पर मूर्तियां ही नहीं, अपितु भगवान के चित्र भी उकेरे जाने लगे। कनखल में तो भवनों पर हुई भित्ति चित्रकारी और भित्ति मूर्तिकारी अनेक शोध प्रबंधों का विषय बनी। कालांतर में भारत माता जैसे ऐसे दर्जनों मंदिर बनाए गए, जिनके भीतर बस भगवान ही भगवान विराजमान थे। धीरे-धीरे पंचपुरी के अधिकांश घरों के प्रवेश द्वार पर किसी न किसी देवरूप की मूूर्ति लगाई जाने लगी।
विज्ञापन
हरिद्वार का मूर्ति बाजार एकाएक बढ़ गया है। हालत यह है कि शिवोत्सव, शिवरात्रि और पूजा के अवसर पर हरिद्वार के बाजार में कई प्रकार की मूर्तियों की कमी पड़ जाती है। दिल्ली और जयपुर के बाजार से हरिद्वार की मूर्तियां सस्ती पड़ती है। जबकि अधिकांश प्रतिमाएं राजस्थान और मध्य प्रदेश से ही यहां लाई जाती हैं। मूर्ति बाजार की बढ़ोत्तरी को देखकर कई व्यापारी अपना कारोबार तक बदल रहे हैं।
-महेश जोशी, प्रसिद्ध मूर्ति व्यापारी, मोती बाजार
धर्मनगरी से मूर्तियां लेने के लिए कई राज्यों से लोग पहुंचते हैं। ये लोग मूर्ति ले जाने के लिए वाहन साथ लाते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अधिकांश लोग हरिद्वार से मूर्ति खरीदने आते हैं। आश्चर्य तब होता है जब दिल्ली के लोग भी मूर्ति वहां से खरीदने के बजाय हरिद्वार से खरीदते हैं। उनका कहना है कि यहां चयन के लिए मूर्तियां अधिक मिलती है।
- प्रकाश चंद, व्यापारी मोती बाजार