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शहरी सरकार के वितीय अधिकार बढ़ने से विकास को लगेंगे पंख
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ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
नगर निगम के मेयर और नगर आयुक्त के वित्तीय अधिकार बढ़ाए जाने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि शहर के विकास को पंख लगेंगे। मेयर अब तीन की बजाय छह और नगर आयुक्त पचास हजार की बजाय पांच लाख तक के कार्य नगर निगम बोर्ड और शासन की स्वीकृति के बिना खर्च कर सकेंगे।
बृहस्पतिवार को विधानसभा में नगर निगमों को वित्तीय अधिकार दिए जाने का नगर निगम संशोधन विधेयक पारित किया गया है। अब अगर नगर निगम के बोर्ड फंड में पैसा है तो उसको खर्च करने के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। इससे मेयर की सत्ता भी मजबूत होगी। पार्षदों का बहुमत साथ नहीं होने पर भी मेयर की चलती रहेगी। पार्षद अपने वार्ड में विकास कराने के लिए मेयर से सहयोग करने के राह पर चलेंगे। अब यदि कोई समस्या होगी तो महापौर व नगर आयुक्त के बीच होगी। नगर निगम बोर्ड का वित्तीय अधिकार भी बढ़ा है। बोर्ड को अब तक तीन लाख से दस लाख रुपये तक के विकास कार्य कराने का अधिकार था, जिसे बढ़ाकर 25 लाख रुपये तक कर दिया गया है। अब नगर निगम बोर्ड को विकास कार्यों की वित्तीय स्वीकृति के लिए शासन का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।
नागरिक सुविधाओं का विकास होगा
नगर निगम को वित्तीय अधिकार मिलने से नागरिक सुविधाओं का विकास करने में मदद मिलेगी। आवासीय कालोनियों में पार्कों की साफ-सफाई, जलनिकासी के लिए नालियों का निर्माण, सड़कों की मरम्मत, पुराने मोहल्लों में नाली, पुलिया, स्ट्रीट लाइट के पोल और लाइट, नगर निगम में सम्मिलित नए क्षेत्रों में भी नगर निगम विकास कार्य करा सकेगा।
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वित्तीय अधिकार बढ़ाने के साथ ही प्रदेश सरकार को 74वें संविधान संशोधन की सिफारिशों को लागू करने का विधेयक पारित कर देश में उदाहरण प्रस्तुत करती और भी अच्छा होता। बढ़ती महंगाई को ध्यान में रखते हुए मेयर को कम से कम दस लाख रुपये तक खर्च करने का वित्तीय अधिकार मिलना चाहिए था। नगर निगम को विकास कार्यों का नोडल तो माना जाता है, लेकिन कोई भी विभाग उसकी राय लेता नहीं है, केवल एनओसी तक उसको सीमित किया गया है। 74वें संविधान संशोधन की सिफारिश को लागू किया जाता तो विकास योजना बनाने में भी उसकी भागीदारी होती।
- अनीता शर्मा, मेयर
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नगर निगम के मेयर और नगर आयुक्त के वित्तीय अधिकार बढ़ाए जाने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि शहर के विकास को पंख लगेंगे। मेयर अब तीन की बजाय छह और नगर आयुक्त पचास हजार की बजाय पांच लाख तक के कार्य नगर निगम बोर्ड और शासन की स्वीकृति के बिना खर्च कर सकेंगे।
बृहस्पतिवार को विधानसभा में नगर निगमों को वित्तीय अधिकार दिए जाने का नगर निगम संशोधन विधेयक पारित किया गया है। अब अगर नगर निगम के बोर्ड फंड में पैसा है तो उसको खर्च करने के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। इससे मेयर की सत्ता भी मजबूत होगी। पार्षदों का बहुमत साथ नहीं होने पर भी मेयर की चलती रहेगी। पार्षद अपने वार्ड में विकास कराने के लिए मेयर से सहयोग करने के राह पर चलेंगे। अब यदि कोई समस्या होगी तो महापौर व नगर आयुक्त के बीच होगी। नगर निगम बोर्ड का वित्तीय अधिकार भी बढ़ा है। बोर्ड को अब तक तीन लाख से दस लाख रुपये तक के विकास कार्य कराने का अधिकार था, जिसे बढ़ाकर 25 लाख रुपये तक कर दिया गया है। अब नगर निगम बोर्ड को विकास कार्यों की वित्तीय स्वीकृति के लिए शासन का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।
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नागरिक सुविधाओं का विकास होगा
नगर निगम को वित्तीय अधिकार मिलने से नागरिक सुविधाओं का विकास करने में मदद मिलेगी। आवासीय कालोनियों में पार्कों की साफ-सफाई, जलनिकासी के लिए नालियों का निर्माण, सड़कों की मरम्मत, पुराने मोहल्लों में नाली, पुलिया, स्ट्रीट लाइट के पोल और लाइट, नगर निगम में सम्मिलित नए क्षेत्रों में भी नगर निगम विकास कार्य करा सकेगा।
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वित्तीय अधिकार बढ़ाने के साथ ही प्रदेश सरकार को 74वें संविधान संशोधन की सिफारिशों को लागू करने का विधेयक पारित कर देश में उदाहरण प्रस्तुत करती और भी अच्छा होता। बढ़ती महंगाई को ध्यान में रखते हुए मेयर को कम से कम दस लाख रुपये तक खर्च करने का वित्तीय अधिकार मिलना चाहिए था। नगर निगम को विकास कार्यों का नोडल तो माना जाता है, लेकिन कोई भी विभाग उसकी राय लेता नहीं है, केवल एनओसी तक उसको सीमित किया गया है। 74वें संविधान संशोधन की सिफारिश को लागू किया जाता तो विकास योजना बनाने में भी उसकी भागीदारी होती।
- अनीता शर्मा, मेयर