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क बार भी द्वारिका न जा पाए शारदापीठाधीश्वर
Updated Wed, 25 Apr 2018 12:09 AM IST
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हरिद्वार।
वर्ष 2016 फरवरी में शिवरात्रि के दिन भूमापीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ का अभिषेक द्वारिका की शारदापीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में किया गया था। 26 महीने बाद शंकराचार्य पद छोड़कर वे फिर भूमापीठाधीश्वर हो गए हैं। काशी में धर्म महासंघ की बैठक बुुलाकर दो दिन पूर्व पद छोड़ दिया। उनके पद छोड़ने के अनेक अर्थ निकाले गए हैं।
गौरतलब है कि अच्युतानंद जगद्गुरु शंकराचार्य तो बन गए थे, लेकिन जिस शारदापीठ पर वे आसीन हुए थे, उसके द्वारिका मुख्यालय वे एक बार भी नहीं जा पाए। साथ ही शारदापीठ पर पहले से ही आसीन जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के दर्जनों शिष्यों ने उनके खिलाफ देश के अनेक राज्यों में मुकदमे दर्ज करा दिए। अच्युतानंद को चुनौती देते हुए दशकों से शंकराचार्य पद पर आसीन स्वामी स्वरूपानंद ने तो पिछली बार अपना चातुर्मास ही द्वारिका में किया था। अच्युतानंद एक बार भी वहां जाने का साहस नहीं जुटा पाए। देशभर में फैले उनके भक्तों ने जगह-जगह उनका स्वागत किया। इसके बावजूद द्वारिका की धरती और पीठ उन्हें नसीब नहीं हो पाई। स्वरूपानंद के शिष्य उन्हें जगह-जगह घेर भी रहे थे। इसी बीच उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश पर काशी धर्म महासंघ ने ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य पर आवेदन मांग कर नया शंकराचार्य चुनने का उपक्रम शुरू किया। स्वामी स्वरुपानंद के भक्तों ने उन्हें जबलपुर में धर्म महासंघ की बैठक बुलाकर एक बार फिर ज्योतिर्पीठ और शारदापीठ के दोनों पदों पर आसीन कर दिया। तब से स्वामी अच्युतानंद तीर्थ काफी आहत चल रहे थे।
दो दिन पूर्व उन्होंने काशी पहुंचकर धर्म महासंघ की बैठक बुलाई। इस बैठक में उन्होंने दो पृष्ठों का एक पत्र पढ़ा और शारदापीठ का शंकराचार्य पद छोड़ दिया। अच्युतानंद पहले ही दंडी स्वामी है, लेकिन शारदापीठ का दंड भी उन्होंने महासंघ के हवाले कर दिया। स्वामी अच्युुतानंद ने बताया कि शंकराचार्य के पद को कुछ लोगों ने विवादित बना दिया था। यह पद लेकर उनका संवेदनशील हृदय व्यथित और द्रवीभूत हो चला था। इसलिए उन्होंने पाया कि शंकराचार्य जैसे पद पर रहकर वे अपने दायित्वों का पालन नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि मेरी रुचि राष्ट्र निर्माण एवं सेवा कार्यों में लगने की है। अब वे भूमापीठाधीश्वर पद पर रहकर पूर्व की भांति अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे। स्वामी अच्युतानंद तीर्थ काशी से वापस लौट आए हैं।
वर्ष 2016 फरवरी में शिवरात्रि के दिन भूमापीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ का अभिषेक द्वारिका की शारदापीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में किया गया था। 26 महीने बाद शंकराचार्य पद छोड़कर वे फिर भूमापीठाधीश्वर हो गए हैं। काशी में धर्म महासंघ की बैठक बुुलाकर दो दिन पूर्व पद छोड़ दिया। उनके पद छोड़ने के अनेक अर्थ निकाले गए हैं।
गौरतलब है कि अच्युतानंद जगद्गुरु शंकराचार्य तो बन गए थे, लेकिन जिस शारदापीठ पर वे आसीन हुए थे, उसके द्वारिका मुख्यालय वे एक बार भी नहीं जा पाए। साथ ही शारदापीठ पर पहले से ही आसीन जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के दर्जनों शिष्यों ने उनके खिलाफ देश के अनेक राज्यों में मुकदमे दर्ज करा दिए। अच्युतानंद को चुनौती देते हुए दशकों से शंकराचार्य पद पर आसीन स्वामी स्वरूपानंद ने तो पिछली बार अपना चातुर्मास ही द्वारिका में किया था। अच्युतानंद एक बार भी वहां जाने का साहस नहीं जुटा पाए। देशभर में फैले उनके भक्तों ने जगह-जगह उनका स्वागत किया। इसके बावजूद द्वारिका की धरती और पीठ उन्हें नसीब नहीं हो पाई। स्वरूपानंद के शिष्य उन्हें जगह-जगह घेर भी रहे थे। इसी बीच उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश पर काशी धर्म महासंघ ने ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य पर आवेदन मांग कर नया शंकराचार्य चुनने का उपक्रम शुरू किया। स्वामी स्वरुपानंद के भक्तों ने उन्हें जबलपुर में धर्म महासंघ की बैठक बुलाकर एक बार फिर ज्योतिर्पीठ और शारदापीठ के दोनों पदों पर आसीन कर दिया। तब से स्वामी अच्युतानंद तीर्थ काफी आहत चल रहे थे।
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दो दिन पूर्व उन्होंने काशी पहुंचकर धर्म महासंघ की बैठक बुलाई। इस बैठक में उन्होंने दो पृष्ठों का एक पत्र पढ़ा और शारदापीठ का शंकराचार्य पद छोड़ दिया। अच्युतानंद पहले ही दंडी स्वामी है, लेकिन शारदापीठ का दंड भी उन्होंने महासंघ के हवाले कर दिया। स्वामी अच्युुतानंद ने बताया कि शंकराचार्य के पद को कुछ लोगों ने विवादित बना दिया था। यह पद लेकर उनका संवेदनशील हृदय व्यथित और द्रवीभूत हो चला था। इसलिए उन्होंने पाया कि शंकराचार्य जैसे पद पर रहकर वे अपने दायित्वों का पालन नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि मेरी रुचि राष्ट्र निर्माण एवं सेवा कार्यों में लगने की है। अब वे भूमापीठाधीश्वर पद पर रहकर पूर्व की भांति अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे। स्वामी अच्युतानंद तीर्थ काशी से वापस लौट आए हैं।
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