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वर्षा ऋतु के आगमन और प्रकृति के संरक्षण का पर्व है हरेला
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत
Updated Sat, 15 Jul 2017 11:12 PM IST
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चंपावत में हरेले के साथ बुजुर्ग महिला।
- फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड राज्य में हरेला पर्व को वर्षा ऋतु के आगमन के प्रतीक के साथ ही प्रकृति के संरक्षण पर्व के रूप में मनाया जाता है। कुमाऊं क्षेत्र के पर्वतीय अंचलों में प्रतिवर्ष जुलाई-अगस्त माह में अतीत से ही हरेला मनाने की परंपरा चली आ रही है। बरसात का मौसम शुरू होते ही प्रकृति में बदलाव को हरेला पर्व से जोड़ा जाता है। हरेला कुमाऊं क्षेत्र में हिंदुओं की ओर से मनाया जाने वाला पर्व है, जो कि श्रावण के महीने में मनाया जाता है। हरेला का मतलब होता है हरियाली का पर्व। यह पर्व हरियाली तथा खेती से जुड़ा है, इसलिए किसानों की ओर से खास तौर पर यह पर्व मनाया जाता है।
पर्वतीय अंचल में श्रावण महीना लगने से दस दिन पहले एक बर्तन या टोकरी में मिट्टी भर के सात तरह के अलग-अलग बीज (धान, गेहूँ, जौ, उड़द, गहत, सरसों और सोयाबीन) बोई जाती है। जिसमें रोजाना पानी छिड़क कर पौधे उगने का इंतजार किया जाता है। इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। हरेला पर्व के दिन इन पौधों को काटकर भगवान के चरणों में चढ़ा कर पूजा की जाती है तथा अच्छी फसल की कामना की जाती है। प्रसाद स्वरूप हरेला के कुछ पौधे सिर पर और कान के पीछे रखे जाते हैं। यह भी मान्यता है की हरेला का पौधा जितना बड़ा होगा, उस साल फसल भी उतनी ही अच्छी होगी।
शिव-पार्वती के विवाह के रूप में भी मनता है हरेला
चंपावत। इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार पर्वतीय क्षेत्र में हरेला पर्व के दिन किसान भगवान से अच्छी फसल की प्रार्थना करते हैं। साथ ही हरेला को बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली पहली फसल का प्रतीक माना जाता है। यह भी मान्यता है कि उत्तराखंड के लोग भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह दिवस को भी हरेला पर्व में रूप में मनाते हैं।
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सौभाग्य सूचक होता है हरेला पर्व
चंपावत। पर्यावरणविद विवेकानंद जोशी का कहना है कि नए पेड़ पौधों के रोपण के साथ ही खाद्यान्न की हरियाली से भी हरेले का संबंध है। कर्मकांडी पंडित त्रिलोकीनाथ शास्त्री के अनुसार हरेला पर्व सौभाग्य सूचक है। हरेला बोकर यह परीक्षण किया जाता है कि इस वर्ष कौन से खाद्यान्न की फसल अच्छी होगी। व्यवसायी ललित मोहन पांडेय के अनुसार हरेला हमारी संस्कृति का वाहक है।
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पर्वतीय अंचल में श्रावण महीना लगने से दस दिन पहले एक बर्तन या टोकरी में मिट्टी भर के सात तरह के अलग-अलग बीज (धान, गेहूँ, जौ, उड़द, गहत, सरसों और सोयाबीन) बोई जाती है। जिसमें रोजाना पानी छिड़क कर पौधे उगने का इंतजार किया जाता है। इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। हरेला पर्व के दिन इन पौधों को काटकर भगवान के चरणों में चढ़ा कर पूजा की जाती है तथा अच्छी फसल की कामना की जाती है। प्रसाद स्वरूप हरेला के कुछ पौधे सिर पर और कान के पीछे रखे जाते हैं। यह भी मान्यता है की हरेला का पौधा जितना बड़ा होगा, उस साल फसल भी उतनी ही अच्छी होगी।
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शिव-पार्वती के विवाह के रूप में भी मनता है हरेला
चंपावत। इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार पर्वतीय क्षेत्र में हरेला पर्व के दिन किसान भगवान से अच्छी फसल की प्रार्थना करते हैं। साथ ही हरेला को बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली पहली फसल का प्रतीक माना जाता है। यह भी मान्यता है कि उत्तराखंड के लोग भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह दिवस को भी हरेला पर्व में रूप में मनाते हैं।
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सौभाग्य सूचक होता है हरेला पर्व
चंपावत। पर्यावरणविद विवेकानंद जोशी का कहना है कि नए पेड़ पौधों के रोपण के साथ ही खाद्यान्न की हरियाली से भी हरेले का संबंध है। कर्मकांडी पंडित त्रिलोकीनाथ शास्त्री के अनुसार हरेला पर्व सौभाग्य सूचक है। हरेला बोकर यह परीक्षण किया जाता है कि इस वर्ष कौन से खाद्यान्न की फसल अच्छी होगी। व्यवसायी ललित मोहन पांडेय के अनुसार हरेला हमारी संस्कृति का वाहक है।