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स्वरोजगार का अहम जरिया बनी नीली क्रांति

Sat, 09 Jul 2016 10:09 PM IST
सतीश जोशी ‘सत्तू’, चंपावत
सतीश जोशी ‘सत्तू’, चंपावत Updated Sat, 09 Jul 2016 10:09 PM IST
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The blue revolution important source of self-employment
मछली का तालाब - फोटो : अमर उजाला

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जिले में नीली क्रांति (मत्स्य पालन) स्वरोजगार का अहम जरिया बनते जा रही है। मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास तो किए जा रहे हैं। लेकिन गैर सरकारी स्तर पर क्षेत्र के कुछ प्रगतिशील काश्तकारों की मेहनत अब धीरे-धीरे रंग दिखाने लगी है।

इस मेहनत के पीछे सबसे प्रमुख नाम हैं फूंगर के पूर्व सैनिक और प्रगतिशील काश्तकार ईश्वरी दत्त भट्ट। जिन्होंने रोजगार के लिए सरकारी सहायता के मोहताज लोगों का सामना हकीकत से कराते हुए मत्स्य पालन को नया आयाम दिया है।
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वर्ष 1978 में फौज से रिटायर हुए फूंगर कमैला निवासी भट्ट ने घर आकर कुछ नया करने की ठानी। उन्होंने बेमौसमी सब्जियों का उत्पादन शुरू किया तथा अन्य लोगों को भी इसकी प्रेरणा दी। उन्होंने बाद में अपने घर के आसपास पानी की उपलब्धता वाले स्थानों में मत्स्य पालन को स्वरोजगार का जरिया बनाने का मन बनाया।
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इसी बीच यहां छीड़ापानी में खुले राष्ट्रीय शीत मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र में उन्हें सेवा करने का मौका मिला। यहां वह मत्स्य वैज्ञानिक डॉ. केडी जोशी और डॉ. बीडी त्यागी के संपर्क में आए। जिसके बाद से ही उनकी सोच एवं उद्यम की दिशा बदल गई। वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उन्होंने पहले तो प्रायोगिक तौर पर अपने खेतों में कच्चे तालाब खुदवाकर मत्स्य पालन शुरू किया। बाद में इसे व्यापक पैमाने पर अपना लिया।

लक्ष्मण के काम आई ईश्वरी की प्रेरणा
चंपावत। पूर्व सैनिक ईश्वरी दत्त भट्ट की प्रेरणा से कठाड़ निवासी लक्ष्मण सिंह ने भी मत्स्य पालन के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किया है। एक दशक पूर्व तक बेरोजगारी से संघर्ष करने वाले सिमल्टा न्यायपंचायत के कठाड़ निवासी लक्ष्मण सिंह महर ने फूंगर के प्रगतिशील काश्तकार ईश्वरी दत्त भट्ट की प्रेरणा से अपने घर के आसपास पानी की उपलब्धता वाले स्थानों में मत्स्य पालन को स्वरोजगार का जरिया बनाया है। उनके पास वर्तमान में दस तालाब हैं, जिनमें औसतन तीन माह के बीच मछलियां निकाली जाती हैं। एक समय में एक तालाब से आधा क्विंटल तक मछलियां निकल आती हैं।


मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र बना मददगार
चंपावत। यहां तारकेश्वर में स्थित राष्ट्रीय शीत जल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र मत्स्य पालन को बढ़ावा देने में मददगार साबित हो रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से चलाए जा रहे केंद्र में पर्वतीय जलवायु में होने वाले मछलियों की विभिन्न प्रजातियों पर शोध किया जाता है। वर्तमान में केंद्र में रेनबो ट्राउट, सिल्वर कार्प, महाशीर, असीला, गोल्डन कार्प सहित विभिन्न प्रजातियों के बीज तैयार करने के साथ ही काश्तकारों को मत्स्य पालन का तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है।

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