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Champawat News: 24 किमी पैदल सफर तय करते हैं स्कूली बच्चे
Fri, 21 Jun 2024 12:31 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Fri, 21 Jun 2024 12:31 AM IST
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चंपावत। ग्राम पंचायत बकोड़ा गांव में 12 किमी सड़क के इंतजार 40 फीसदी से अधिक पलायन हो गया है। गांव तक कई बार सड़क का सर्वे कार्य किया गया, लेकिन निर्माण आज तक शुरू नहीं हो सका। ग्रामीणों का कहना है कि पंचवर्षीय योजना में एक-एक किमी सड़क बनती तो आज गांव आबाद होता।
जिला मुख्यालय से 42 किमी की दूरी पर नेपाल क्षेत्र से लगे बकोड़ा गांव के लिए मूलभूत सुविधाओं के कोई मायने नहीं है। यहां के ग्रामीण आजादी के बाद भी 12 किमी पैदल चलने के लिए मजबूर हैं। गांव में एक समय करीब 1000 की आबादी थी। आज वहां मात्र 500 की आबादी निवास करते हैं। गांव के लोग पेंशन के लिए भी 42 किमी दूर जाते हैं। दी जाती है। गांव तक जरूरत का सामान पहुंचाना भी ग्रामीणों के लिए मुश्किल होता है। इसके लिए उन्हें अधिक किराया देना पड़ता है। ग्रामीण बाजार से कम मूल्य पर बाजार से सामान खरीदकर लाते हैं, लेकिन चीनी, चावल, सब्जी, राशन आदि का उन्हें अधिक किराया देना पड़ता है। 18 हजार रुपये की रेत गांव तक पहुंचते-पहुंचते 30 हजार की हो जाती है। 12 हजार रुपये ढुलान देना पड़ता है।
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सर्वे तक सीमित निर्माण
चंपावत। प्रधान महेंद्र सिंह रावत ने बताया कि उनके कार्यकाल में मंच बकोड़ा सड़क का तीन बार सर्वे कार्य हो चुका है, लेकिन आज तक सर्वे से आगे बात नहीं बन पाई। इससे पहले भी कई बार सर्वे हो चुकी है। ग्राम पंचायत के मष्टा के लोग 18 किमी का सफर कर मंच तक पहुंचते हैं। उनके लिए जिला मुख्यालय की दूरी 60 किमी पड़ती है।
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एक क्विंटल के 700 रुपये
चंपावत। गांव के लोगों के लिए शादी और अन्य काज कराना आसान नहीं होता है। शादी समारोह में गांव तक सामान पहुंचाने में 700 रुपये प्रति क्विंटल खच्चर के हिसाब से देने पड़ते हैं। हजारों की शादी भी लाखों की पहुंच जाती है। बीमारी और गर्भवतियों के लिए डोली ही एंबुलेंस का काम करती है। डोली से बीमारों को मंच लाने में करीब पांच घंटे लग जाते हैं।
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पढ़ाई के लिए 24 किमी की दौड़
चंपावत। बकोड़ा गांव के बच्चों के लिए पढ़ाई भी आसान नहीं है। बच्चों को पढ़ाई के लिए मंंच इंटर कॉलेज जाना पड़ता है। हर रोज बच्चे 24 किमी पैदल चलने के लिए मजबूर हैं। 12 किमी स्कूल जाना और 12 किमी वापस घर आना है। इन समस्याओं को देखते हुए वहां निवासरत लोग भी अब पलायन के लिए तैयार हैं।
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72 साल की उम्र हो गई जैसा गांव था वैसा ही है कोई भी इस क्षेत्र में विकास नहीं हुआ है। सड़क के अभाव में 70 फीसदी से अधिक पलायन क्षेत्र से बढ़ गया है। - किशन सिंह, ग्रामीण बकोड़ा।
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पैदल चलते-चलते उमर बीत गई, लेकिन सड़क का कहीं कोई पता नहीं है। आज भी पेंशन लेने के लिए लोग खच्चर से या पैदल चलकर जिला मुख्यालय में जाते हैं। - चंचला देवी, ग्रामीण, बकोड़ा।
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जिला मुख्यालय से 42 किमी की दूरी पर नेपाल क्षेत्र से लगे बकोड़ा गांव के लिए मूलभूत सुविधाओं के कोई मायने नहीं है। यहां के ग्रामीण आजादी के बाद भी 12 किमी पैदल चलने के लिए मजबूर हैं। गांव में एक समय करीब 1000 की आबादी थी। आज वहां मात्र 500 की आबादी निवास करते हैं। गांव के लोग पेंशन के लिए भी 42 किमी दूर जाते हैं। दी जाती है। गांव तक जरूरत का सामान पहुंचाना भी ग्रामीणों के लिए मुश्किल होता है। इसके लिए उन्हें अधिक किराया देना पड़ता है। ग्रामीण बाजार से कम मूल्य पर बाजार से सामान खरीदकर लाते हैं, लेकिन चीनी, चावल, सब्जी, राशन आदि का उन्हें अधिक किराया देना पड़ता है। 18 हजार रुपये की रेत गांव तक पहुंचते-पहुंचते 30 हजार की हो जाती है। 12 हजार रुपये ढुलान देना पड़ता है।
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सर्वे तक सीमित निर्माण
चंपावत। प्रधान महेंद्र सिंह रावत ने बताया कि उनके कार्यकाल में मंच बकोड़ा सड़क का तीन बार सर्वे कार्य हो चुका है, लेकिन आज तक सर्वे से आगे बात नहीं बन पाई। इससे पहले भी कई बार सर्वे हो चुकी है। ग्राम पंचायत के मष्टा के लोग 18 किमी का सफर कर मंच तक पहुंचते हैं। उनके लिए जिला मुख्यालय की दूरी 60 किमी पड़ती है।
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एक क्विंटल के 700 रुपये
चंपावत। गांव के लोगों के लिए शादी और अन्य काज कराना आसान नहीं होता है। शादी समारोह में गांव तक सामान पहुंचाने में 700 रुपये प्रति क्विंटल खच्चर के हिसाब से देने पड़ते हैं। हजारों की शादी भी लाखों की पहुंच जाती है। बीमारी और गर्भवतियों के लिए डोली ही एंबुलेंस का काम करती है। डोली से बीमारों को मंच लाने में करीब पांच घंटे लग जाते हैं।
पढ़ाई के लिए 24 किमी की दौड़
चंपावत। बकोड़ा गांव के बच्चों के लिए पढ़ाई भी आसान नहीं है। बच्चों को पढ़ाई के लिए मंंच इंटर कॉलेज जाना पड़ता है। हर रोज बच्चे 24 किमी पैदल चलने के लिए मजबूर हैं। 12 किमी स्कूल जाना और 12 किमी वापस घर आना है। इन समस्याओं को देखते हुए वहां निवासरत लोग भी अब पलायन के लिए तैयार हैं।
72 साल की उम्र हो गई जैसा गांव था वैसा ही है कोई भी इस क्षेत्र में विकास नहीं हुआ है। सड़क के अभाव में 70 फीसदी से अधिक पलायन क्षेत्र से बढ़ गया है। - किशन सिंह, ग्रामीण बकोड़ा।
पैदल चलते-चलते उमर बीत गई, लेकिन सड़क का कहीं कोई पता नहीं है। आज भी पेंशन लेने के लिए लोग खच्चर से या पैदल चलकर जिला मुख्यालय में जाते हैं। - चंचला देवी, ग्रामीण, बकोड़ा।