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अभियान:जर्जर स्कूल खतरे में नौनिहाल
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लोहाघाट जीआईसी के क्षतिग्रस्त कमरों में पढ़ते छात्र।
- फोटो : CHAMPAWAT
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जिले के सबसे पुराने राजकीय इंटर कॉलेज लोहाघाट के भवन जीर्णशीर्ण हाल में हैं। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थी और पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ अभिभावक भी जर्जर कक्षों को देख सहमे हैं। कक्षाएं संचालित करने के लिए अन्य जगह नहीं होने से इन्हीं जीर्णशीर्ण कमरों से छात्र भविष्य गढ़ने को मजबूर है।
1959 में बने इस विद्यालय में 15 कमरे हैं, छठीं कक्षा से लेकर इंटर तक में कुल 337 छात्र हैं। विद्यालय के पास बने दूसरे भवनों में विज्ञान वर्ग की दो कक्षाएं संचालित होती हैं। पुराने जर्जर भवनों के अधिकतर कमरों की खिड़की, दरवाजे, जाली टूटी हुई हैं। भवनों की दीवारों में दरारें आने के साथ प्लास्टर और फर्श टूटा हुआ है। दीमक से खिड़की, दरवाजे, चौखट और छत का काफी हिस्सा जर्जर हो चुके हैं।
फर्श भी जगह-जगह से टूटा हुआ है। विधायक पूरन सिंह फर्त्याल की निधि से मिले 1.20 लाख रुपये से टपकती छतों की मरम्मत की गई।
कॉलेज प्रशासन का कहना है कि भवन को खतरनाक घोषित करने के बावजूद भी छात्र-छात्राओं को अन्यत्र पढ़ाने के लिए दूसरे भवन का कोई विकल्प नहीं है। अभिभावकों ने छात्रों की सुरक्षा के मद्देनजर विद्यालय के जर्जर भवन की शीघ्र मरम्मत की मांग की है।
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विद्यालय भवन के जर्जर हाल को देखते हुए 2017 में मरम्मत के लिए करीब 40 लाख रुपये का आगणन भेजा है, लेकिन यह रकम नहीं मिल सकी है। विद्यालय में दरवाजे, खिड़की, शीशे टूटने के साथ भवन की छत में पड़े टिन-सडगल चुके हैं। थोड़ी सी बरसात में छतें टपकने लगती हैं। मगर विकल्प नहीं होने से अभी इन कमरों का उपयोग करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
हरिनंदन जोशी, प्रधानाचार्य, जीआईसी
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1959 में बने इस विद्यालय में 15 कमरे हैं, छठीं कक्षा से लेकर इंटर तक में कुल 337 छात्र हैं। विद्यालय के पास बने दूसरे भवनों में विज्ञान वर्ग की दो कक्षाएं संचालित होती हैं। पुराने जर्जर भवनों के अधिकतर कमरों की खिड़की, दरवाजे, जाली टूटी हुई हैं। भवनों की दीवारों में दरारें आने के साथ प्लास्टर और फर्श टूटा हुआ है। दीमक से खिड़की, दरवाजे, चौखट और छत का काफी हिस्सा जर्जर हो चुके हैं।
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फर्श भी जगह-जगह से टूटा हुआ है। विधायक पूरन सिंह फर्त्याल की निधि से मिले 1.20 लाख रुपये से टपकती छतों की मरम्मत की गई।
कॉलेज प्रशासन का कहना है कि भवन को खतरनाक घोषित करने के बावजूद भी छात्र-छात्राओं को अन्यत्र पढ़ाने के लिए दूसरे भवन का कोई विकल्प नहीं है। अभिभावकों ने छात्रों की सुरक्षा के मद्देनजर विद्यालय के जर्जर भवन की शीघ्र मरम्मत की मांग की है।
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विद्यालय भवन के जर्जर हाल को देखते हुए 2017 में मरम्मत के लिए करीब 40 लाख रुपये का आगणन भेजा है, लेकिन यह रकम नहीं मिल सकी है। विद्यालय में दरवाजे, खिड़की, शीशे टूटने के साथ भवन की छत में पड़े टिन-सडगल चुके हैं। थोड़ी सी बरसात में छतें टपकने लगती हैं। मगर विकल्प नहीं होने से अभी इन कमरों का उपयोग करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
हरिनंदन जोशी, प्रधानाचार्य, जीआईसी