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प्रवासी इंजीनियर युवा ने घर के कमरे में किया आयस्टर मशरूम का उत्पादन
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घर के कमरे में उत्पादित आयस्टर मशरूम दिखाता प्रवासी इंजीनियर धीरज पांडेय।
- फोटो : TANAKPUR
टनकपुर (चंपावत)। कोरोना संकट में कंपनी बंद होने के कारण फरीदाबाद से घर लौटे प्रवासी मेकेनिकल इंजीनियर धीरज पांडे ने खाली समय में घर पर ऑइस्टर प्रजाति के मशरूम का उत्पादन कर बेरोजगार युवाओं को मशरूम की खेती के जरिये स्वरोजगार की प्रेरणा दी है। उन्होंने प्रयोग के तौर पर एक छोटे से कमरे में मशरूम का उत्पादन किया है। इसके लिए उन्होंने कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। यू-ट्यूब चैनल से मशरूम की खेती करने का तरीका सीखा। उनका कहना है कि कंपनी ने उन्हें नौकरी पर नहीं बुलाया तो वह मशरूम की खेती को रोजगार का जरिया बनाएंगे।
बनबसा सैनिक छावनी स्थित केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक जीडी पांडेय के पुत्र धीरज पांडे फरीदाबाद की एक कंपनी में मेकेनिकल इंजीनियर हैं। कोरोना संकट में कंपनी बंद हुई तो वह घर वापस लौट आए। इस दौरान खाली समय में उन्होंने मशरूम उत्पादन के प्रयोग की योजना बनाई। उन्होंने यू- ट्यूब चैनल की मदद से मशरूम की खेती की विधि सीखकर अपने घर के ही एक छोटे से कमरे में प्रयोग कर ऑइस्टर प्रजाति के मशरूम का उत्पादन किया है।
धीरज ने बताया कि उसने गेहूं के भूसे में इसका उत्पादन किया है। 200 ग्राम बीज से करीब डेढ़ किलो मशरूम पैदा हुआ है। धीरज का कहना है कि ऑइस्टर मशरूम की खेती युवाओं के लिए स्वरोजगार का बेहतर विकल्प है। कोई भी युवा कम लागत और थोड़ी जगह में मशरूम का उत्पादन कर आत्मनिर्भर बन सकता है। ऑइस्टर प्रजाति के मशरूम का बाजार में दाम एक हजार रुपये किलो तक हैं। इसके दामों का निर्धारण मशरूम की गुणवत्ता पर है। धीरज का कहना है कि यदि कंपनी ने उन्हें नौकरी में वापस नहीं बुलाया तो वह मशरूम की खेती को ही अपना रोजगार बनाएगा।
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बनबसा सैनिक छावनी स्थित केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक जीडी पांडेय के पुत्र धीरज पांडे फरीदाबाद की एक कंपनी में मेकेनिकल इंजीनियर हैं। कोरोना संकट में कंपनी बंद हुई तो वह घर वापस लौट आए। इस दौरान खाली समय में उन्होंने मशरूम उत्पादन के प्रयोग की योजना बनाई। उन्होंने यू- ट्यूब चैनल की मदद से मशरूम की खेती की विधि सीखकर अपने घर के ही एक छोटे से कमरे में प्रयोग कर ऑइस्टर प्रजाति के मशरूम का उत्पादन किया है।
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धीरज ने बताया कि उसने गेहूं के भूसे में इसका उत्पादन किया है। 200 ग्राम बीज से करीब डेढ़ किलो मशरूम पैदा हुआ है। धीरज का कहना है कि ऑइस्टर मशरूम की खेती युवाओं के लिए स्वरोजगार का बेहतर विकल्प है। कोई भी युवा कम लागत और थोड़ी जगह में मशरूम का उत्पादन कर आत्मनिर्भर बन सकता है। ऑइस्टर प्रजाति के मशरूम का बाजार में दाम एक हजार रुपये किलो तक हैं। इसके दामों का निर्धारण मशरूम की गुणवत्ता पर है। धीरज का कहना है कि यदि कंपनी ने उन्हें नौकरी में वापस नहीं बुलाया तो वह मशरूम की खेती को ही अपना रोजगार बनाएगा।
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