मां सा दुलार: आपदा पीड़ित तीन बच्चों की परवरिश कर रही अनीता
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इन तीन बच्चों के पिता खड़क सिंह और मां मधु देवी मई 2013 में होटल कारोबार के लिए काजुला (केदार घाटी) गए थे। लेकिन 15 जून से तीन दिन तक आई भीषण आपदा के बाद से उनकी कोई खैर-खबर नहीं मिली। रोलपा (नेपाल) निवासी खड़क और मधु के ये तीनों बच्चे तबसे माता-पिता के बगैर जिंदगी काट रहे हैं। लेकिन उनकी मामी अनीता ने बच्चों को माता-पिता की कमी नहीं अखरने दी।
तबसे वे इन बच्चों की परवरिश कर रही हैं। कमल विवेकानंद इंटर कॉलेज में दसवीं में पढ़ रहा है। जबकि सुनील सातवीं व मुस्कान छठी कक्षा में पढ़ रही है। पढ़ाई-लिखाई, खान-पान और अन्य सभी जिम्मेदारियों को वे पूरी शिद्दत के साथ निभा रही हैं। उन्होंने इन बच्चों को माता-पिता के नहीं होने का अहसास तक नहीं होने दिया। ये भी तब, जब खुद अनीता के अपने दो छोटे बच्चें हैं। परिवार की माली स्थिति भी सामान्य है। अनीता के पति करन सिंह और ननद कमला देवी भी इस सेवा भाव में हाथ बंटाते हैं।
मजदूर मां की मेहनत से बेटे ने पाया एजीएम का मुकाम
लोहाघाट (चंपावत)। लोहाघाट विकासखंड के रायनगर चौड़ी गांव की पार्वती देवी ने घोर आर्थिक संकट से जूझकर भरपेट खाना न खाकर अपने को सफलता के मुकाम तक पहुंचाया है। मेहनत मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करने वाली पार्वती देवी के सामने तीन बच्चों को स्कूल भेजने की कड़ी चुनौती थी। जैसे-तैसे वह परिवार का गुजारा करती थी।
पार्वती ने 22 नवंबर 1994 में अपने जीवन की पहला बचत खाता पिथौरागढ़ जिला सहकारी बैंक में दो हजार रुपये से खोला था। पति की आजीविका भी काफी कम थी। ऐसे में पार्वती देवी अपने खाते में मेहनत मजदूरी कर पाई-पाई जोड़कर जमा करती थी। जमा हुए रुपये से घर का खर्चा चलाने के साथ बच्चों की स्कूल की फीस और अन्य खर्चे चलाती थी। आज भी वह पासबुक पार्वती ने संभाल कर रखी हुई है। मां की मेहनत को देखते हुए पार्वती के बड़ा बेटा मुकुल स्कूल जाने से पहले सुबह अखबार बांटता था, उसके बाद स्कूल जाता था। पार्वती की मेहनत उस समय रंग लाई, जब उनका बेटा मुकुल 1997 में सूर्या कंपनी में तैनात हुआ। जो विभिन्न पदों में रहते हुए वर्तमान में सूर्या रोशनी आंध्रप्रदेश में सहायक महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत है। उनका दूसरा लड़का सुनील दिल्ली में वरिष्ठ तकनीशियन और सबसे छोटा बेटा कवींद्र ग्वालियर में एक निजी मोबाइल कंपनी में विक्रय अधिशासी के पद पर है। वक्त बदला, लेकिन पार्वती का स्वभाव, रहन-सहन नहीं बदला। उन्हें अपने बेटों की सफलता पर काफी गर्व है। पार्वती का कहना है कि वह अपने बच्चों को असहाय, निर्धन लोगों को सहारा देने के लिए प्रेरित करती रहती हैं।
लकड़ियां बीनकर बच्चों को ऊंचाईयों तक पहुंचाया
लोहाघाट (चंपावत)। गांधी चौक मुहल्ले में रहने वाली लक्ष्मी आमा (84) लोगों के लिए एक प्रेरणास्रोत हैं। जिन्होंने घोर कठिनाइयां झेलते हुए अपने बच्चों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। साथ ही गरीब असहाय लोगों की मदद के लिए बच्चों को प्रेरित करती रही हैं। 30 वर्ष की उम्र में ही लक्ष्मी आमा के सिर से पति का साया उठ गया। उनके सामने पांच बच्चों के लालन-पालन की चुनौती थी। उस समय आमा का सबसे बड़ा बेटा 12 साल और सबसे छोटा बेटा ढाई वर्ष का था।
घोर आर्थिक तंगी के चलते परिवार में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी बेहद कठिन हो गया था। आमा को कई बार बच्चों के साथ भूखे पेट भी सोना पड़ता था। आमा ने हिम्मत जुटाते हुए जंगलों से लकड़ियां बीनकर बेचना शुरू कर दिया। जिससे घर का चूल्हा जलने लगा। आमा ने अपने बच्चों को पढ़ाने का मन बनाया। 1975 में आमा का सबसे बड़े बेटा भुवन का चयन भूमि संरक्षण विभाग में हुआ। जिससे घर की व्यवस्था पटरी पर आने लगा। भुवन में आगे बढ़ने की काफी ललक थी। 1977 में उनका चयन राजकीय पालीटेक्निक में स्टोर कीपर के लिए हुआ। बड़े बेटे भुवन राजकीय पालीटेक्निक से वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के पद से एक वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हुए हैं। आमा के तीन अन्य बेटों किशन, ललित और जगदीश इलेक्ट्रानिक और इलेक्ट्रिकल के क्षेत्र में काम करने लगे। धीरे-धीरे उनका व्यवसाय आगे बढ़ने लगा। 1997 में उनके बेटे किशन का असामयिक निधन हो गया। जिनके बच्चों की भी जिम्मेदारी भी आमा के ऊपर आ गई। उनके तीनों बेटे आमा की प्रेरणा से असहाय, दीन दुखियों की मदद करने के साथ कई बच्चों की पढ़ाई का भी खर्च उठाते आ रहे हैं। आमा के बच्चों का कहना है कि उन्होंने बेहद गरीबी में दिन काटे थे।