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जिले के इकलौते कारगिल शहीद खीम सिंह ने लिखी थी अदभुत शौर्य गाथा
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कारगिल शहीद खीम सिंह कुंवर।
- फोटो : CHAMPAWAT
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कारगिल युद्ध में जीत को दो दशक पूरे हो चुके हैं। बेहद कठिन हालातों में पाकिस्तान की सेना के इरादों को नाकाम करने के लिए भारतीय सेना के कई जवानों ने युद्ध में कुर्बानी दी। चंपावत जिले से कारगिल युद्ध में जिस एकमात्र सैनिक ने शहादत दी वह बनबसा के ग्राम पचपकरिया के खीम सिंह कुंवर थे। 9 पैरा में नायक के पद पर तैनात खीम सिंह कुंवर ने कुपवाड़ा सेक्टर में शहीद होने से पूर्व पाकिस्तान के पांच दुश्मनों को मार गिराया।
अदम्य साहस का परिचय देने वाले शहीद खीम सिंह कुंवर बनबसा के ग्राम पचपकरिया में 12 फरवरी 1972 में कृषक गंगा सिंह कुंवर के घर जन्मे। इंटर की पढ़ाई के बाद वे फौज में भर्ती हुए। शहादत के वक्त गर्भवती पत्नी मंजू ने शहीद की मौत के कुछ महीनों बाद बेटे को जन्म दिया जो अब 17 वर्ष का है। शहीद की पत्नी मंजू पचपकरिया में ससुराल को छोड़ कर बरेली में शिफ्ट हो गई हैं। मंजू सिंह इस वक्त बरेली में रेलवे विभाग में कार्यरत हैं।
शहीद की स्मृति को संजोने के लिए वर्ष 2000 में बनबसा बस स्टेशन के नजदीक बने शहीद स्मारक बनाया गया। स्मारक खस्ताहालत होने के चलते नगर पंचायत उसकी मरम्मत करवा रहा है। नगर पंचायत अध्यक्ष रेणु अग्रवाल का कहना है कि जल्द ही शहीद स्मारक की मरम्मत पूरी हो जाएगी।
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शहीद का छोटा भाई भी है सैनिक
बनबसा (चंपावत)। कारगिल युद्ध में बड़े भाई के शहीद होने के बाद भी छोटे भाई राजेंद्र सिंह ने दूसरी सेवा नहीं अपनाई। भाई की शहादत के बाद उन्होंने सेना में जाना तय किया। इन दिनों वे जम्मू कश्मीर में तैनात हैं।
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अदम्य साहस का परिचय देने वाले शहीद खीम सिंह कुंवर बनबसा के ग्राम पचपकरिया में 12 फरवरी 1972 में कृषक गंगा सिंह कुंवर के घर जन्मे। इंटर की पढ़ाई के बाद वे फौज में भर्ती हुए। शहादत के वक्त गर्भवती पत्नी मंजू ने शहीद की मौत के कुछ महीनों बाद बेटे को जन्म दिया जो अब 17 वर्ष का है। शहीद की पत्नी मंजू पचपकरिया में ससुराल को छोड़ कर बरेली में शिफ्ट हो गई हैं। मंजू सिंह इस वक्त बरेली में रेलवे विभाग में कार्यरत हैं।
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शहीद की स्मृति को संजोने के लिए वर्ष 2000 में बनबसा बस स्टेशन के नजदीक बने शहीद स्मारक बनाया गया। स्मारक खस्ताहालत होने के चलते नगर पंचायत उसकी मरम्मत करवा रहा है। नगर पंचायत अध्यक्ष रेणु अग्रवाल का कहना है कि जल्द ही शहीद स्मारक की मरम्मत पूरी हो जाएगी।
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शहीद का छोटा भाई भी है सैनिक
बनबसा (चंपावत)। कारगिल युद्ध में बड़े भाई के शहीद होने के बाद भी छोटे भाई राजेंद्र सिंह ने दूसरी सेवा नहीं अपनाई। भाई की शहादत के बाद उन्होंने सेना में जाना तय किया। इन दिनों वे जम्मू कश्मीर में तैनात हैं।