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लोगों के जेहन में कार्बेट से जुड़ी कई यादें
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत।
Updated Mon, 24 Jul 2017 11:36 PM IST
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जिम कार्बेट का जन्मदिन आज
- फोटो : अमर उजाला
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चंपावत। अतीत में आदमखोर बाघ, तेंदुओं को मार गिराने में महारत रखने वाले अंग्रेज शिकारी जिम कार्बेट का नाम पूरे प्रदेश में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। अतीत में कुमाऊं क्षेत्र में दहशत का पर्याय बने कई आदमखोर बाघ, तेंदुओं को अपने अचूक निशाने से मारने वाले कार्बेट को चंपावत जिले के सीमांत क्षेत्र से बेहद गहरा लगाव था। कलढूंगा, मंच में स्थित वन विभाग के डाक बंगलों में आज भी जिम कार्बेट से जुड़ी कई स्मृतियां मौजूद हैं।
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कार्बेट का जन्म 25 जुलाई 1875 को गर्नी हाउस नैनीताल में हुआ था। वर्ष 1907 से 1938 के बीच कार्बेट ने कुमाऊं के विभिन्न स्थानों पर 33 नरभक्षी बाघ, तेंदुओं को मारा था। इनमें 19 बाघ, 14 तेंदुए थे। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इन नरभक्षियों ने विभिन्न गांवों में 1200 से अधिक लोगों को मारा था। कार्बेट ने सीमांत दुबड़जैनल, ऊंचाकोट, चौड़ाराजपुरा, गौड़ी, किसकोट, मौनपोखरी आदि इलाकों में मौत का पर्यायवाची बन चुके नरभक्षी बाघ, तेंदुओं को मारकर ग्रामीणों को राहत पहुंचाई थी।
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पड़ोसी मुल्क नेपाल से लगे सीमावर्ती मंच-तामली क्षेत्र में भी कार्बेट को बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है। सीमांत कलढूंगा समेत मंच में स्थित वन विभाग के डाक बंगले में कार्बेट ने भी कई दिनों तक प्रवास किया था। आजादी मिलने से पूर्व तक सीमावर्ती क्षेत्र कार्बेट की कर्मस्थली रहा था। वर्ष 1940 में दुबडजैनल में ही कार्बेट ने कई लोगों को अपना शिकार बना चुकी बाघिन को मारा था।
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क्षेत्र के बूढ़े-बुजुर्ग आज भी बड़ी शिद्दत से कार्बेट से जुड़ी यादों को बयां करते हैं। क्षेत्र के शेर सिंह महर बताते हैं कि वर्ष 1940 में कार्बेट ने स्थानीय शिकारियों के सहयोग से नरभक्षी बाघ के आतंक से निजात दिलाई थी। उस दौर में नरभक्षी बन चुकी बाघिन ने नीड़, बोयल, गुरखोली, ठूलाकोट, ल्वारगी, बकोड़ा, सोराई आदि गांवों में 35 से अधिक लोगों को मार दिया था।
चंपावत। सीमांत क्षेत्र के ग्रामीण अतीत के दौर को याद करते हुए बताते हैं कि उस समय संचार के साधन न होने से जब भी गांववालों पर कोई विपत्ति अथवा नरभक्षी बाघ का आतंक होने पर वे अपने प्रिय कार्बेट को तार भेजते थे। बुजुर्ग माधो सिंह बताते हैं कि तार मिलते ही जिम तुरंत अपनी ड्यूटी से छुट्टी लेकर पहुंच जाते थे। जिम को हमेशा अकेले शिकार करना पसंद था। वे हमेशा जंगल में पैदल घूमते और शिकार करते थे। कार्बेट ने कई बार अपनी जान जोखिम में डालकर कई लोगों की जान बचाई थी।
चंपावत। नरभक्षियों के शिकार के साथ ही कार्बेट को पुस्तकें लिखने का भी शौक था। उन्होंने शिकार कथा पर मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं, द मैन ईटर लैपर्ड ऑफ रुद्रप्रयाग, माई इंडिया, जंगल लोर, द टेंपल टाइगर एंड मोर मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं, ट्री टॉपर्स आदि विश्व प्रसिद्ध पुस्तकें लिखी हैं। कार्बेट ने अपनी कई पुस्तकों में चंपावत जिले के आदमखोर बाघ, तेंदुओं के साथ ही यहां की धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं के बारे में भी बारीकी से उल्लेख किया है। पांच साल पूर्व वन विभाग की ओर से जिले में जिम कार्बेट से जुड़ी चीजों सहेजकर एक म्यूजियम बनाने की कार्ययोजना बनाई थी लेकिन शासन स्तर पर प्रस्ताव को मंजूरी न मिलने से कोई पहल नहीं हो सकी।