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 खड़ी होली गायन की तैयारियां जोरों पर

Mon, 27 Feb 2017 10:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत।
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत। Updated Mon, 27 Feb 2017 10:42 PM IST
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Holly singing vertical swing preparations
ढोलक - फोटो : अमर उजाला

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 जिले में फाल्गुन की मस्ती के नजदीक आते ही खड़ी होली गायन की तैयारियों जोरों पर चल रही हैं। होली के लिए ढोल और मंजीरों को ठीक करने का कार्य चरम पर पहुंचता जा रहा है। चंपावत जिला मुख्यालय और आसपास के इलाकों को काली कुमाऊं के नाम से जाना जाता है। यहां गाई जाने वाली खड़ी होली अपनी विशिष्टताओं के चलते काफी लोकप्रिय है। खड़ी होली गायन में ढोल और मंजीरों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इन दोनों चीजों के बिना खड़ी होली गायन नहीं किया जा सकता है। ढोल पर पड़ने वाली थाप और मंजीरे की धुन के बीच होल्यारों की ओर से जब कदम से कदम मिलाकर होली का गायन किया जाता है तो यह दृश्य देखते ही बनता है। होली के आगमन से पूर्व सभी स्थानों में ढोल और मंजीरों को ठीक करने का कार्य शुरू हो गया है।
जिला मुख्यालय में बीते दो दशकों से ढोल की मरम्मत के कार्य में लगे कारीगरों गुलाब राम और संजय कुमार आदि का कहना है कि वर्ष में होली से पूर्व एक माह से ही ढोलों की मरम्मत का कार्य शुरू हो जाता है। ग्रामीण इलाकों से उनके पास ढोलों की मरम्मत के साथ ही नए ढोल बनाने के लिए आर्डर मिलते रहते हैं। इन विशेष प्रकार के ढोलों के निर्माण में अखरोट और विजेसार की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा बकरी की खाल के साथ ही अन्य जानवरों की खाल के प्रयोग से ढोलों को आकर्षक तरीके से सजाया जाता है। इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार काली कुमाऊं क्षेत्र में खड़ी होली का गायन लोक संस्कृति को सहेजने में मददगार बना हुआ है। खड़ी होली गायन के दिन पर्वतीय अंचल के गांवों से गूंजने वाले ढोलों की आवाज बरबस ही लोगों को अपनी ओर मंत्रमुग्ध कर देती है।
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ढोल की गुंजार होती है गांव की पहचान
चंपावत। कुमाऊं की खड़ी होली गायन में जहां ढोल और झांझर (मंजीरा) का विशेष स्थान है। वहीं ग्रामीण इलाकों में होली के दौरान ढोल की गुंजार गांव की पहचान भी होती है। गांवों में ढोल के स्वर दूसरे गांव के लोगों तक आसानी से पहुंचते हैं और ढोल की गुंजार से होली गायन की चरमता का एहसास होता है।
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