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Champawat News: चंपावत में महक बिखेरेगा हॉलैंड का लिलियम
Wed, 25 Jun 2025 10:14 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Wed, 25 Jun 2025 10:14 PM IST
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चंपावत। चंपावत जिले में हॉलैंड के लिलियम प्रजाति के फूलों को खिलाने का कार्य होगा। पहली बार तीन प्रकार के गुलाबी, सफेद और पीले ओरिएंटल लिलियम की खेती प्रायोगिक परियोजना के तौर पर शुरू की जाएगी। परिणाम बेहतर आने के बाद किसानों को प्रशिक्षण देकर बड़े पैमाने पर इसकी खेती करने की योजना भी है।
कृषि विज्ञान केंद्र लोहाघाट हॉर्टीकल्चर मिशन फॉर नॉर्थ ईस्ट एंड हिमालय स्टेट के तहत ओरिएंटल लिलियम की खेती की शुरुआत करेगा। जून के अंत में हॉलैंड से मंगाए गए रिवर डेल, कोर्बेट, यलो विन लिलियम के बल्ब कृषि विज्ञान केंद्र की जमीन पर रोपे जाएंगे। सर्दी तक बल्ब तैयार हो जाएंगे लेकिन शुरुआत में इनका साइज छोटा होता है तो ऐसे में फिर से इनको लगाया जाएगा।
लिलियम के बल्बों का अच्छा उत्पादन होने पर प्रथम चरण में 50 किसानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। आदर्श चंपावत के तहत मैकेंजी ग्लोबल कंपनी ने कार्ययोजना बनाई थी। इसमें केविके में लिलियम प्रवर्धन के लिए प्रायोगिक परियोजना का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद केंद्र ने इसका प्रस्ताव तैयार कर राज्य को भेजा था। अब स्वीकृति मिलने के बाद केविके ने बल्ब लगाने की तैयारी भी कर ली है। प्रयोग सफल होने के बाद किसानों को इसकी खेती के वैज्ञनिक गुर सिखाए जाएंगे।
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संवाद
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पौधा लगाने की ऐसी होती है विधि
लिली के बल्ब शरद ऋतु या वसंत ऋतु में लगाए जा सकते हैं। रोपण की गहराई प्रकार पर निर्भर करती है, क्योंकि लिली या तो स्टेम रूटिंग या बेसल रूटिंग हो सकती है। पहले के लगाए गए बल्ब के ऊपर और नीचे दोनों जगह जड़ें पैदा होती हैं, इसलिए उन्हें अधिक गहराई में लगाने की आवश्यकता होती है।
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जिले में 15 से अधिक किसान कर रहे हैं लिलियम की खेती
जिला उद्यान विभाग ने 15 से अधिक किसानों को लिलियम की खेती से जोड़ा है। पूर्व जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि जिले में एशियाटिक और ओरिएंटल लिलियम की खेती ढाई तीन हेक्टेयर भूमि पर होती है। लोहाघाट, नरसिंह डांडा आदि क्षेत्रों में लिलियम की खेती की जा रही है। उन्होंने बताया कि एक स्टीक की कीमत करीब 100 रुपये तक हो सकती है। फूल की गुणवत्ता भी दाम निर्भर करती है। शादियों के सीजन में किसानों की अच्छी आय हो जाती है। दिल्ली में इसकी सबसे अधिक मांग रहती है।
कोट
हॉलैंड से मंगाए गए तीन प्रकार के लिलियम फूलों के बल्बों का उत्पादन प्रायोगिक तौर पर किया जाएगा। प्रायोगिक परियोजना सफल होने पर 25-25 किसानों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। - डॉ. दीपाली तिवारी, प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र, लोहाघाट
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कृषि विज्ञान केंद्र लोहाघाट हॉर्टीकल्चर मिशन फॉर नॉर्थ ईस्ट एंड हिमालय स्टेट के तहत ओरिएंटल लिलियम की खेती की शुरुआत करेगा। जून के अंत में हॉलैंड से मंगाए गए रिवर डेल, कोर्बेट, यलो विन लिलियम के बल्ब कृषि विज्ञान केंद्र की जमीन पर रोपे जाएंगे। सर्दी तक बल्ब तैयार हो जाएंगे लेकिन शुरुआत में इनका साइज छोटा होता है तो ऐसे में फिर से इनको लगाया जाएगा।
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लिलियम के बल्बों का अच्छा उत्पादन होने पर प्रथम चरण में 50 किसानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। आदर्श चंपावत के तहत मैकेंजी ग्लोबल कंपनी ने कार्ययोजना बनाई थी। इसमें केविके में लिलियम प्रवर्धन के लिए प्रायोगिक परियोजना का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद केंद्र ने इसका प्रस्ताव तैयार कर राज्य को भेजा था। अब स्वीकृति मिलने के बाद केविके ने बल्ब लगाने की तैयारी भी कर ली है। प्रयोग सफल होने के बाद किसानों को इसकी खेती के वैज्ञनिक गुर सिखाए जाएंगे।
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संवाद
पौधा लगाने की ऐसी होती है विधि
लिली के बल्ब शरद ऋतु या वसंत ऋतु में लगाए जा सकते हैं। रोपण की गहराई प्रकार पर निर्भर करती है, क्योंकि लिली या तो स्टेम रूटिंग या बेसल रूटिंग हो सकती है। पहले के लगाए गए बल्ब के ऊपर और नीचे दोनों जगह जड़ें पैदा होती हैं, इसलिए उन्हें अधिक गहराई में लगाने की आवश्यकता होती है।
जिले में 15 से अधिक किसान कर रहे हैं लिलियम की खेती
जिला उद्यान विभाग ने 15 से अधिक किसानों को लिलियम की खेती से जोड़ा है। पूर्व जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि जिले में एशियाटिक और ओरिएंटल लिलियम की खेती ढाई तीन हेक्टेयर भूमि पर होती है। लोहाघाट, नरसिंह डांडा आदि क्षेत्रों में लिलियम की खेती की जा रही है। उन्होंने बताया कि एक स्टीक की कीमत करीब 100 रुपये तक हो सकती है। फूल की गुणवत्ता भी दाम निर्भर करती है। शादियों के सीजन में किसानों की अच्छी आय हो जाती है। दिल्ली में इसकी सबसे अधिक मांग रहती है।
कोट
हॉलैंड से मंगाए गए तीन प्रकार के लिलियम फूलों के बल्बों का उत्पादन प्रायोगिक तौर पर किया जाएगा। प्रायोगिक परियोजना सफल होने पर 25-25 किसानों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। - डॉ. दीपाली तिवारी, प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र, लोहाघाट