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मां पूर्णागिरि मंदिर की चट्टानों का भूगर्भीय टीम ने किया मुआयना, रिपोर्ट का इंतजार
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मां पूर्णागिरि धाम के मुख्य मंदिर के करीब चट्टान में दरार वाला हिस्सा।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम की चट्टानों में आई दरारें भरने (रिस्टोरेशन) का काम कार्यदाई संस्था का खंड (डिवीजन) बदलने के बाद भी खास गति नहीं पकड़ सका है। पीआईयू (सेतु, सिंचाई एवं स्लोप) के कार्यक्रम प्रबंधक ने 10 फरवरी को इस संबंध में आदेश जारी किए थे। इसके तहत इस परियोजना का जिम्मा विश्व बैंक की निर्माण शाखा के बेड़ीनाग खंड के स्थान पर हल्द्वानी को दे दिया गया था। अब भूगर्भीय टीम ने मौका मुआयना कर नमूने लिए हैं।
निर्माण खंड के ईई प्रवीण गुरुरानी ने बताया कि भूगर्भ विशेषज्ञों की टीम ने कुछ दिन पहले चट्टानों के नमूने लेने के साथ अध्ययन शुरू कर दिया है। मंदिर के शिखर से करीब 30 मीटर नीचे तक दरार भरने का शुरुआती प्रस्ताव है। पूर्णागिरि मंदिर शिवालिक चट्टान युक्त क्षेत्र में स्लेटी बलुआ पत्थर वाली चट्टानों पर स्थित है। शिखर पर्वत की संवेदनशीलता और भौगोलिक जटिलता के चलते दूसरी एजेंसियों द्वारा पूर्व में बनाई गई डीपीआर और डिजाइन के अनुरूप काम नहीं हो सका। सुरक्षा के खतरे और निर्माण की जटिलता के चलते डिजाइन बदलने का काम पुणे की स्वतंत्र परामर्शदाता एजेंसी को दिया गया।
कई बार बदली एजेंसी और डिवीजन
चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम की दरारों को भरने की यह परियोजना 2008 से शुरू हुई। सबसे पहले इसका जिम्मा लोनिवि को दिया गया। फिर 2017 में यह काम विश्व बैंक की निर्माण शाखा बेड़ीनाग को दिया गया। अब इस साल फरवरी में बेड़ीनाग से हल्द्वानी खंड स्थानांतरित कर दिया गया है। एजेंसी बदलने की वजह पूर्णागिरि से दूरी का कम होना बताया गया। हल्द्वानी खंड से पूर्णागिरि का फासला 215 किमी से 74 किमी कम होकर 141 किमी रह गया है। इससे गुणवत्ता, प्रशासनिक नियंत्रण और भौतिक कार्यों की देखरेख बेहतर तरीके से हो सकेगी।
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पहाड़ी में है पांच इंच चौड़ी दरार
चंपावत। पूर्णागिरि के मुख्य मंदिर की पहाड़ी में कई जगह करीब पांच इंच चौड़ी दरार है। एनएचपीसी, सीडब्लूसी और वाप्कोस कंपनी ने शुरुआती डीपीआर तैयार की। 2015 में शासन ने उत्तराखंड आपदा राहत परियोजना से परामर्शदाता एजेंसी से सर्वे कराया। भूगर्भीय रिपोर्ट और परामर्शदाता एजेंसी ने दरार भरने के साथ मुख्य मंदिर से 700 मीटर तक पैदल मार्ग की चौड़ाई दो फीट से बढ़ाकर आठ फीट तक करने का सुझाव दिया था, लेकिन तीन बार निविदा निकाले जाने के बावजूद काम शुरू नहीं हो सका। राष्ट्रीय निविदा के बावजूद खतरे की वजह से 9.97 करोड़ रुपये के इस काम में कंपनियों ने कम दिलचस्पी ली। इस कारण काम शुरू नहीं हो सका।
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निर्माण खंड के ईई प्रवीण गुरुरानी ने बताया कि भूगर्भ विशेषज्ञों की टीम ने कुछ दिन पहले चट्टानों के नमूने लेने के साथ अध्ययन शुरू कर दिया है। मंदिर के शिखर से करीब 30 मीटर नीचे तक दरार भरने का शुरुआती प्रस्ताव है। पूर्णागिरि मंदिर शिवालिक चट्टान युक्त क्षेत्र में स्लेटी बलुआ पत्थर वाली चट्टानों पर स्थित है। शिखर पर्वत की संवेदनशीलता और भौगोलिक जटिलता के चलते दूसरी एजेंसियों द्वारा पूर्व में बनाई गई डीपीआर और डिजाइन के अनुरूप काम नहीं हो सका। सुरक्षा के खतरे और निर्माण की जटिलता के चलते डिजाइन बदलने का काम पुणे की स्वतंत्र परामर्शदाता एजेंसी को दिया गया।
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कई बार बदली एजेंसी और डिवीजन
चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम की दरारों को भरने की यह परियोजना 2008 से शुरू हुई। सबसे पहले इसका जिम्मा लोनिवि को दिया गया। फिर 2017 में यह काम विश्व बैंक की निर्माण शाखा बेड़ीनाग को दिया गया। अब इस साल फरवरी में बेड़ीनाग से हल्द्वानी खंड स्थानांतरित कर दिया गया है। एजेंसी बदलने की वजह पूर्णागिरि से दूरी का कम होना बताया गया। हल्द्वानी खंड से पूर्णागिरि का फासला 215 किमी से 74 किमी कम होकर 141 किमी रह गया है। इससे गुणवत्ता, प्रशासनिक नियंत्रण और भौतिक कार्यों की देखरेख बेहतर तरीके से हो सकेगी।
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पहाड़ी में है पांच इंच चौड़ी दरार
चंपावत। पूर्णागिरि के मुख्य मंदिर की पहाड़ी में कई जगह करीब पांच इंच चौड़ी दरार है। एनएचपीसी, सीडब्लूसी और वाप्कोस कंपनी ने शुरुआती डीपीआर तैयार की। 2015 में शासन ने उत्तराखंड आपदा राहत परियोजना से परामर्शदाता एजेंसी से सर्वे कराया। भूगर्भीय रिपोर्ट और परामर्शदाता एजेंसी ने दरार भरने के साथ मुख्य मंदिर से 700 मीटर तक पैदल मार्ग की चौड़ाई दो फीट से बढ़ाकर आठ फीट तक करने का सुझाव दिया था, लेकिन तीन बार निविदा निकाले जाने के बावजूद काम शुरू नहीं हो सका। राष्ट्रीय निविदा के बावजूद खतरे की वजह से 9.97 करोड़ रुपये के इस काम में कंपनियों ने कम दिलचस्पी ली। इस कारण काम शुरू नहीं हो सका।