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Champawat News: मैदानी क्षेत्रों में गर्मी बढ़ने से पहाड़ की ओर लौटने लगे भेड़पालक
Wed, 03 Apr 2024 10:57 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Wed, 03 Apr 2024 10:57 PM IST
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मैदानी क्षेत्रों में गर्मी बढ़ने के चलते लोहाघाट के रास्ते धारचूला को जाते भेड़ पालक। संवाद
लोहाघाट (चंपावत)। मैदानी क्षेत्रों में गर्मी बढ़ने के साथ ही भेड़पालकों ने पहाड़ की ओर लौटना शुरू कर दिया है। भेड़पालक सर्दियों में मैदानी क्षेत्रों और गर्मियों में पहाड़ों की ओर पलायन करते हैं। दशकों से चिलचिलाती गर्मीं, बरसात और ठिठुरती ठंड में भेड़पालकों का अपनी भेड़-बकरियों के साथ खुले मैदान में डेरा जमाना इनके जीवन का हिस्सा है।
गर्मियों में चरवाहे मैदानी क्षेत्रों से धारचूला, मुनस्यारी के जंगलों में भेड़-बकरियों के साथ रहते हैं। भेड़ पालक कृष्णा का कहना है कि भेड़-बकरियों को पालना उनका पुश्तैनी व्यवसाय है। इस परंपरा को कायम रखने के लिए वह सालभर घरों से बाहर रहकर अपना जीवनयापन करते हैं। उनका जीवन बहुत संघर्ष पूर्ण है, लेकिन वे इस कार्य में अभ्यस्त हो चुके हैं। कृष्णा बताते हैं कि भेड़ बकरियों के साथ टनकपुर से लोहाघाट पहुंचने में 12 दिनों का सफर तय करना पड़ा। भेड़ पालक त्रिलोक सिंह ने बताया अब यह व्यवसाय काफी कम हो चुका है। गिने-चुने कुछ परिवार ही इस व्यवसाय से जुड़े हैं जिसका मुख्य कारण युवाओं का शिक्षित होना भी है। भेड़पालक नरेंद्र और सौरभ ने बताया चार लोगों की चार सौ भेड़, चार कुत्ते, चार घोड़े हैं। छह माह बाद फिर धारचूला से वापस भांवर को लौटेंगे। संवाद
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गर्मियों में चरवाहे मैदानी क्षेत्रों से धारचूला, मुनस्यारी के जंगलों में भेड़-बकरियों के साथ रहते हैं। भेड़ पालक कृष्णा का कहना है कि भेड़-बकरियों को पालना उनका पुश्तैनी व्यवसाय है। इस परंपरा को कायम रखने के लिए वह सालभर घरों से बाहर रहकर अपना जीवनयापन करते हैं। उनका जीवन बहुत संघर्ष पूर्ण है, लेकिन वे इस कार्य में अभ्यस्त हो चुके हैं। कृष्णा बताते हैं कि भेड़ बकरियों के साथ टनकपुर से लोहाघाट पहुंचने में 12 दिनों का सफर तय करना पड़ा। भेड़ पालक त्रिलोक सिंह ने बताया अब यह व्यवसाय काफी कम हो चुका है। गिने-चुने कुछ परिवार ही इस व्यवसाय से जुड़े हैं जिसका मुख्य कारण युवाओं का शिक्षित होना भी है। भेड़पालक नरेंद्र और सौरभ ने बताया चार लोगों की चार सौ भेड़, चार कुत्ते, चार घोड़े हैं। छह माह बाद फिर धारचूला से वापस भांवर को लौटेंगे। संवाद
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