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एक भी आपदा प्रभावित परिवार का विस्थापन नहीं हुआ
अमर उजाला ब्यूराे चंपावत।
Updated Thu, 17 May 2018 10:32 PM IST
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चंपावत जिले का आपदा प्रभावित बैड़ाओड़ का सेरी कन्याना गांव।
- फोटो : अमर उजाला
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आपदा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित स्थानों में विस्थापित किए जाने की कोई भी कार्ययोजना परवान नहीं चढ़ पाई है। दो दशक पूर्व जिले में दैवीय आपदा की दृष्टि से प्रभावित आठ गांवों के परिवारों को सर्वेक्षण के बाद भी अब तक विस्थापित नहीं किया जा सका है। अलबत्ता वर्तमान में जिले के एकमात्र तोक के विस्थापन की कार्रवाई शासन स्तर पर लंबित है। पाटी विकासखंड के मौनकांडा ग्राम पंचायत का सिमली तोक शासन की ओर से तय विस्थापन होने के मानकों को पूरा कर रहा है।
चंपावत जिले में वर्ष 1993, 2003 और 2016 में आई दैवीय आपदा नेे बाराकोट और पाटी विकासखंड की ग्राम पंचायत सेरी, कन्याना, बैड़ाओड़, चमनपुर, नैलोड़ी, चौड़ापित्ता, परेवा, मौनकांडा, सिमली आदि में काफी तबाही मचाई थी। अतिवृष्टि के कारण ग्रामीणों के खेत खलिहान मलबे में दब गए थे, कई आवासीय मकानों को गंभीर खतरा पैदा गया था। वर्ष 1998 में तत्कालीन जिला प्रशासन ने इन आपदा प्रभावित गांवों का भूगर्भीय सर्वेक्षण कराने के साथ उन्हें तराई या पर्वतीय क्षेत्रों में विस्थापित किए जाने की संस्तुति की थी। वर्तमान में इन गांवों की स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है। यहां के लोग कई बार दैवीय आपदा का दंश झेल चुके हैं। परेवा के भगवान राम के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों के लोग अनुसूचित जाति के गरीब वर्ग के हैं। बरसात के मौसम में प्रभावित गांवों के लोगों की सांसे अटकी रहती हैं।
सिमली के अलावा अन्य गांवों का हो चुका है ट्रीटमेंट
चंपावत। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी मनोज पांडेय का कहना है कि मौनकांडा का सिमली तोक ही सरकारी गाइड लाइन के अनुसार आपदा प्रभावित की श्रेणी में आता है जिसके विस्थापन की कार्रवाई शासन स्तर पर गतिमान है। पूर्व में अन्य आपदा प्रभावित गांवों में विभिन्न प्रकार के ट्रीटमेंटों के जरिए आपदा की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।
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चंपावत जिले में वर्ष 1993, 2003 और 2016 में आई दैवीय आपदा नेे बाराकोट और पाटी विकासखंड की ग्राम पंचायत सेरी, कन्याना, बैड़ाओड़, चमनपुर, नैलोड़ी, चौड़ापित्ता, परेवा, मौनकांडा, सिमली आदि में काफी तबाही मचाई थी। अतिवृष्टि के कारण ग्रामीणों के खेत खलिहान मलबे में दब गए थे, कई आवासीय मकानों को गंभीर खतरा पैदा गया था। वर्ष 1998 में तत्कालीन जिला प्रशासन ने इन आपदा प्रभावित गांवों का भूगर्भीय सर्वेक्षण कराने के साथ उन्हें तराई या पर्वतीय क्षेत्रों में विस्थापित किए जाने की संस्तुति की थी। वर्तमान में इन गांवों की स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है। यहां के लोग कई बार दैवीय आपदा का दंश झेल चुके हैं। परेवा के भगवान राम के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों के लोग अनुसूचित जाति के गरीब वर्ग के हैं। बरसात के मौसम में प्रभावित गांवों के लोगों की सांसे अटकी रहती हैं।
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सिमली के अलावा अन्य गांवों का हो चुका है ट्रीटमेंट
चंपावत। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी मनोज पांडेय का कहना है कि मौनकांडा का सिमली तोक ही सरकारी गाइड लाइन के अनुसार आपदा प्रभावित की श्रेणी में आता है जिसके विस्थापन की कार्रवाई शासन स्तर पर गतिमान है। पूर्व में अन्य आपदा प्रभावित गांवों में विभिन्न प्रकार के ट्रीटमेंटों के जरिए आपदा की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।
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