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देवीधुरा बगवाल:60 हजार नेत्रों ने देखी नौ मिनट चली बगवाल
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आस्था: एक पांव और एक हाथ नहीं लेकिन बगवाल देखने का जज्बा ऐसा कि इसी हाल में 43 किमी दूर पाटन से देवीध?
- फोटो : CHAMPAWAT
देवीधुरा के खोलीखांण दुबाचौड़ा मैदान में बृहस्पतिवार को दोहरी खुशी मनी। स्वतंत्रता दिवस के साथ ही रक्षाबंधन के दिन बगवाल (फल-फूलों से होने वाला युद्ध) भी खेली गई। 30 हजार से अधिक लोगों की मौजूदगी में चारों खामों (गहरवाल, वालिग, चम्याल और लमगड़िया) के बीच करीब 9 मिनट तक नाशपाति, सेब और अन्य फल-फूलों से बगवाल खेली गई, लेकिन कुछ जोशीले बगवाली वीरों ने अंतिम क्षणों में पत्थर भी बरसाए। मां बाराही धाम मंदिर के पंडित कीर्ति बल्लभ शास्त्री और भुवन जोशी की शंखध्वनि के साथ अपराह्न 2.06 बजे से 2.15 बजे तक बगवाल खेली गई।
2018 की अपेक्षा इस बार एक मिनट अधिक बगवाल खेली गई। 98 बगवाली वीरों सहित कुल 122 लोग चोटिल हुए। पहली बार इस बार बगवाल के दौरान बारिश नहीं हुई। बगवाल खत्म होने के बाद गहरवाल खाम ने परिक्रमा पूरा होने से पहले ही बगवाल शुरू कराने का आरोप लगाते हुए नाराजगी जताई।
अलबत्ता पीठाचार्य पीठाचार्य कीर्तिबल्लभ शास्त्री के समझाने-बुझाने से मामला सुलझ गया। शास्त्री का कहना है कि कोई विवाद नहीं हुआ। ये बस आंतरिक मामला है। गहरवाल खाम के कुछ नए लोग इसे ठीक से नहीं समझ सके, जिसके चलते कुछ लोगों में नाराजगी रही।
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मुख्य अतिथि डोल आश्रम के स्वामी श्री 1008 कल्याण दास, पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, सांसद अजय टम्टा, पूर्व स्पीकर गोविंद कुंजवाल, पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा, उप्र के विधायक प्रेम प्रकाश, विधायक राम सिंह कैड़ा, लोहाघाट के विधायक पूरन सिंह फर्त्याल सहित तमाम हस्तियां मौजूद थीं।
मैदान में प्रवेश करने से पहले सभी चारों खामों और सात थोक (चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया, वालिग, गोरना, कटना और फुलाराकोट) के योद्धाओं ने मां वज्र बाराही का जयकारा किया। वालिग खाम के बगवाली वीरों ने मुखिया बद्री सिंह बिष्ट के नेतृत्व में रणक्षेत्र में दस्तक दी, जबकि गंगा सिंह चम्याल के नेतृत्व में चम्याल खाम, वीरेंद्र सिंह लमगड़िया के नेतृत्व में लमगड़िया खाम और पान सिंह बिष्ट के नेतृत्व में गहरवाल खाम के योद्धाओं ने प्रवेश किया।
मां के जयकारे के साथ योद्धाओं ने व्रज बाराही के मंदिर की परिक्रमा करने के बाद चारों खामों के योद्धा अपने-अपने मोर्चे में डट गए। संकेत मिलते ही वालिग और लमगड़िया खाम ने फल-फूल बरसा कर बगवाल शुरू की, जबकि दूसरी तरफ से चम्याल और गहरवाल खाम मोर्चा ले रहा था। आठ मिनट तक नाशपाति, सेब और फूलों से बगवाल खेली गई, लेकिन आखिरी मिनट में फल खत्म होने से पत्थर भी बरसे।
पीत वस्त्रधारी पुजारी धर्मानंद ने अपराह्न 2.15 बजे चंवर झूलाकर बगवाल समाप्त होने का संकेत किया। बगवाल पर विराम लगने के बाद चारों खामों के योद्धाओं ने गले मिल कुशलक्षेम पूछी। सकुशल वापसी के लिए मां के सम्मुख शीश नवाया। 98 बगवाली वीर और 24 दर्शक घायल हुए। घायलों का चिकित्सा शिविर में डॉक्टरों की टीम ने इलाज किया।
बगवाल में इन्होंने लिया हिस्सा
लमगड़िया खाम के साथ मंदिर कमेटी के मुख्य संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया, खीम सिंह लमगड़िया, आन सिंह लमगड़िया, तारा सिंह, उमेद सिंह, किशन सिंह, लाल सिंह, दीवान सिंह, वालिग खाम की ओर से मदन सिंह, शेर सिंह, गोपाल सिंह, राजू बिष्ट, चेतन भैय्या, चम्याल खाम में लाल सिंह चम्याल, बिशन सिंह, विनोद चम्याल, जगदीश सिंग्वाल, गौरव सिंग्वाल और गहरवाल खाम की ओर से जोध सिंह बिष्ट, डुंगर सिंह बिष्ट, मोहन बिष्ट, दिनेश चम्याल, बद्री सिंह बिष्ट, खुशाल सिंह, माधो सिंह, गोपाल बिष्ट, लाल सिंह, पान सिंह आदि प्रमुख योद्धा थे। करीब एक हजार लोगों ने बगवाल खेली।
बगवाल देखने को मैदान ही नहीं, आसपास के मकानों की छतें भी खचाखच भरीं थीं। बगवाल शुरू होने से पूर्व पंडित कीर्ति बल्लभ शास्त्री और डॉ. भुवन चंद्र जोशी ने मां बाराही देवी की पूजा-अर्चना की। पूजा में चारों खामों के प्रतिनिधि शामिल हुए। बगवाल से पूर्व योद्धाओं ने मंदिर की परिक्रमा की।
वर्ष बगवाल का वक्त चोटिल
2015 10 मिनट 124 योद्धा और 25 दर्शक
2016 7 मिनट 59 योद्धा और 11 दर्शक
2017 8 मिनट 11 योद्धा और 323 दर्शक
2018 8 मिनट 112 योद्धा और 129 दर्शक
2019 9 मिनट 98 योद्धा और 24 दर्शक
बगवाल मेला : घंटे-दर-घंट
7.30 बजे : पूजा-अर्चना शुरू हुई।
8.30 बजे : पूजा-अर्चना पूरी हुई।
12.47 बजे : खामों का मंदिर में प्रवेश करना शुरू हुआ।
1.11 बजे : मंदिर की परिक्रमा।
2.03 बजे : बगवाल के लिए मैदान में प्रवेश।
2.06 बजे : बगवाल का श्रीगणेश।
2.15 बजे : बगवाल का समापन।
2.17 बजे : चारों खामों के योद्धाओं का गले मिलन।
इन्होंने भी की शिरकत
भाजपा जिलाध्यक्ष रामदत्त जोशी, पूर्व जिलाध्यक्ष शंकर दत्त पांडेय, सुभाष बगौली, डीएम सुरेंद्र नारायण पांडेय, एसपी धीरेंद्र गुंज्याल, एडीएम टीएस मर्तोलिया, मेला मजिस्ट्रेट शिप्रा जोशी, सहायक मेला मजिस्ट्रेट अमित ममगाईं, मेलाधिकारी राजेश कुमार, भगवत पाटनी, सीओ ध्यान सिंह आदि प्रमुख हस्तियां शामिल थीं।
एक साथ तीन पीढ़ी ने खेली बगवाल
चम्याल खाम के बची सिंह ने बेटे, भतीजे और दो पोतों के साथ खेली बगवाल
सुरेंद्र राज लडवाल
पाटी (चंपावत)। मां बाराही धाम में होने वाली बगवाल की आस्था का ये एक नजारा है। जिसने उम्र को पछाड़ा। खोलीखांण दुबचौड़ा मैदान में एक साथ तीन पीढ़ी बगवाल खेलने को मुस्तैद। बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक में एक जैसा उत्साह और उमंग। चम्याल खाम के बची सिंह सिंग्वाल (77) ने अपने बेटे, भतीजे और दो पोतों के साथ बगवाल में फल बरसाए।
बची सिंह अपने बेटे मोहन सिंह (42), बची सिंह के भतीजे जितेंद्र सिंह (39), बची सिंह के पोते विजय (18) और अमित सिंग्वाल (12) के साथ पूरे नौ मिनट तक खोलीखांण मैदान में बगवाल खेलते रहे। बगवाल के मैदान में उन्हें 26 साल पहले की स्मृतियां भी ताजा हो गई। जब 1993 में उन्होंने पहली बार बगवाल खेली। बताते हैं कि पहले बगवाल अधिक वक्त तक भी खेली जाती थी और बचाव के लिए फर्रे भी नहीं होते थे। मगर अब बगवाल का समय कम हो रहा है और बचाव के लिए बंदोबस्त तगड़ा है। बची सिंह कहते हैं कि बगवाल उन्हें सात्विकता, संयम के साथ आस्थावान जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। इसी के चलते उनके 12 साल के पोते अमित भी इसमें शिरकत कर रहे हैं। बगवाल देवीधुरा क्षेत्र को नाम और शान देता है। इसके प्रोत्साहन के लिए सरकार के अलावा स्थानीय लोगों को भी आगे आना होगा।
पहली बार बगवाल खेलने में हुई थी हिचक
बगवाल आस्था के साथ रोमांच भी पैदा करता है। ये कहना है दूसरी बार बगवाल खेलने आए 11वीं में पढ़ने वाले चम्याल खाम के आयुष का।
आयुष का कहना है कि पिछले साल बगवाल खेलने में झिझक महसूस हुई, मगर इस बार उन्होंने पूरी हिम्मत के साथ बगवाल में हिस्सा लिया। और अब वे आगे भी इसमें हमेशा शिरकत करेंगे। वहीं दो दशक से अधिक वक्त से बगवाल खेलने वाले वालिग खाम के प्रकाश जोशी बताते हैं कि बगवाल में भले ही कितने बदलाव क्यों न हो, मगर यह सात्विकता और संयमित जीवन जीने की प्रेरणा जरूर देता है।
एक पांव-एक हाथ नहीं, फिर भी बगवाल के साक्षी बने
पाटनपुल के दिव्यांग गोपाल राम को बगवाल से मिलती है ऊर्जा
कमल जोशी
चंपावत। हजारों लोगों के बीच एक पांव और एक हाथ के सहारे घिसटता एक श्रद्धालु आस्था की मिसाल था। हर किसी की नजर उस पर थी। लोहाघाट विकासखंड के पाटनपुल क्षेत्र के दिव्यांग गोपाल राम मां बाराही देवी का आशीर्वाद लेने और बगवाल के साक्षी बनने को कठिनाई के बीच भी देवीधुरा पहुंचे।
43 किमी दूर से देवीधुरा पहुंचे गोपाल बताते हैं कि वे बीते पांच वर्ष से लगातार बगवाल देखने के लिए आ रहे हैं। मां बाराही देवी के प्रति उनकी आस्था है। बगवाल देखने से उन्हें रोमांच से ज्यादा ऊर्जा मिलती है। एक दुर्घटना में करीब 11 साल पूर्व उनका एक हाथ और एक पांव कट गया था। मगर जिंदगी की इस कठिनाई को भी वे आस्था के आसरे सहजता से हंसते-मुस्कराते पार करते हैं।
दूरदराज से आए भक्तों ने मत्था टेका
देवीधुरा के बाराही मंदिर में बृहस्पतिवार सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने लग गई थी। भीड़ का आलम यह था कि मंदिर से लेकर खोलीखाड़ दुबाचौड़ तक खचाखच लोग भरे हुए थे। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को नियंत्रण करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी।
मन्नत के लिए उठाया एक क्विंटल से अधिक का पत्थर
देवीधुरा के खोलीखांण दुबाचौड़ मैदान में एक क्विंटल से अधिक वजन के गोल पत्थर को उठाने के लिए नौजवानों में होड़ मची रही। इस बार 49 लोगों ने इस भारी-भरकम पत्थर को उठाया। अल्मोड़ा जिले के बड़ियाड़ से आए 21 साल के रोशन लाल ने तो इसे कंधे पर उठा लिया, जबकि कुछ नौजवानों ने छाती तक पत्थर को उठाया। कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने पत्थर को लेकर मैदान के एक हिस्से की परिक्रमा तक कर डाली। मान्यता है कि इसे उठाने से मनोकामना पूरी होती है।
चोटिलों को तुरंत मिला इलाज ेवीधुरा बगवाल देखने और खेलने में कुल 122 लोग जख्मी हुए। इसमें चार महिला दर्शक भी थीं। चोटिलों के इलाज के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम पूरी तरह मुस्तैद थी। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ.आरपी खंडूरी के नेतृत्व में गठित दो टीमों ने घायलों का इलाज किया।
एसीएमओ डॉ.इंद्रजीत पांडेय, पाटी के एमओआईसी डॉ.आभाष सिंह, चंपावत जिला अस्पताल के अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ.एचएस ऐरी, डॉ.दीपिका जोशी, डॉ.देवेश, डॉ.कीर्ति मेहता, डॉ.राकेश, डॉ.रवि, फार्मेसिस्ट विष्णु गिरि गोस्वामी आदि ने इलाज किया। विधायक पूरन फर्त्याल ने चिकित्सा शिवर में घायलों का हालचाल जाना।
मेला राजकीय तो नहीं बना, मगर सियासी जरूर हुआ
बगवाल में शामिल नहीं हुए आयोजक संस्था के मुखिया खुशाल सिंह
पिछले साल भेजे जिला पंचायत के प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई नहीं हुई
मेला व्यवस्था को शासन से 2009 से नहीं मिली कोई रकम
चंद्रशेखर जोशी
देवीधुरा (चंपावत)। बगवाल मेले ने जगह तो जरूर बनाई, मगर इस मेले का आयोजन कराना जिला पंचायत के लिए टेढ़ी खीर बन रही है। बगवाल मेले को राजकीय मेले का दर्जा तो नहीं मिल सका, लेकिन इसमें सियासी रंग जरूर चढ़ गया।
बृहस्पतिवार को हुए बगवाल मेले में पहली बार ऐसा हुआ, जब आयोजक संस्था के मुखिया ही गैर हाजिर रहे। कांग्रेस नेता और जिला पंचायत अध्यक्ष खुशाल सिंह अधिकारी बगवाल में मौजूद नहीं थे। मोबाइल बंद होने से उनसे संपर्क भी नहीं हो सका। अलबत्ता कांग्रेस जिलाध्यक्ष उत्तम देव का कहना है कि वे मेले के उद्घाटन के दिन 11 अगस्त को मौजूद थे। बगवाल में उनका न पहुंचना सियासी नहीं, निजी कारण की वजह से है।
बगवाल देखने के लिए कांग्रेस नेता और पूर्व स्पीकर गोविंद कुंजवाल को छोड़ एक भी बड़ा नेता मौजूद नहीं था। जबकि भाजपा से जुड़े अधिकांश बड़े नेता बगवाल में मौजूद थे। वहीं 2009 से बगवाल मेले के आयोजन के लिए एक भी रुपया नहीं मिला है। पिछले साल बगवाल को राजकीय मेले में बदलने के लिए प्रस्ताव भेजा गया। ताकि इसमें होने वाले व्यय को सरकार वहन करेगी।
11 अगस्त से 14 दिन तक चलने वाले इस मेले के आयोजन में बिजली व्यवस्था, सफाई, अस्थायी निर्माण से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रम तक में मोटी रकम खर्च होती है। जिला पंचायत ने पिछले साल मेले को राजकीय मेला घोषित करने के लिए जिला प्रशासन के जरिये पर्यटन विभाग को प्रस्ताव भेजा था। ताकि जिला पंचायत पर कोई अतिरिक्त बोझ पड़े बिना मेले की भव्यता में विस्तार हो।
इधर सामाजिक कार्यकर्ता विनोद गड़कोटी ने राजकीय मेले की मांग को सांसद अजय टम्टा को ज्ञापन भी दिया। उधर, जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि देवीधुरा मेले की प्रसिद्धि और विस्तार को देखते हुए इसे राजकीय मेले का स्वरूप देने का प्रस्ताव पिछले साल भेजा गया था। लेकिन इसे अभी तक मूत रूप नहीं दिया गया है। इसलिए आयोजक संस्था होने के नाते जिला पंचायत को विकास की मद में कटौती कर काफी धन मेले में खर्च करना पता है।
वर्ष मेलावधि आयोजन पर हुआ खर्च (लाख रुपये)
2015 14 दिन 13.39
2016 12 दिन 6.22
2017 13 दिन 2.70
2018 14 दिन 5.75
मुचकुंद ऋषि के आश्रम तक निकली वज्र बाराही की शोभायात्रा
मां बाराही धाम की मूर्ति वालिग के गोविंद सिंह बागड़ को सौंपी
पाटी (चंपावत)। मां बाराही धाम देवीधुरा के बगवाल मेले में शुक्रवार को मां बज्र बाराही की शोभा यात्रा निकाली गई। 600 मीटर मुचकुंद ऋषि के आश्रम तक गई यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मां का आशीर्वाद लिया। मान्यता है कि देवासुर संग्राम में काल यवन राक्षस के साथ हुए युद्ध में मुचकुंद ऋषि ने देवताओं का साथ दिया था। इससे खुश हो मां बाराही ने स्वयं मुचकुंद ऋषि को दर्शन देने का वचन दिया था। इस यात्रा के जरिये इसी वचन को निभाने की परंपरा है।
बगवाल के दूसरे दिन शुक्रवार को नंदघर में बाराही मंदिर के पीठाचार्य आचार्य कीर्तिबल्लभ जोशी की अगुवाई में वैदिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करवाकर मूर्ति को वालिग गांव के धन सिंह बांगड़ के पुत्र जमन सिंह बांगड़ और पूरन सिंह बांगड़ को सौंपी गई। चारों खाम के मुखिया ताम्र पेटी में रखी मां बज्र बाराही, मां सरस्वती और मां काली की मूर्तियों को नंदगृह ले गए।
यहां रातभर महिलाओं ने व्रत रख कर जागरण किया। रातभर मां बाराही की ताम्र पेटी की सुरक्षा के लिए परंपरा के मुताबिक पुजारियों और चारों खामों के मुखियाओं ने पहरा दिया। ताम्र पेटी की चाबी पुजारी सौंपी गई। सुबह तीनों देवियों की विशेष पूजा कर तथा आंखों में काली पट्टी बांध कर गाय के दूध और गंगा जल सें स्नान कराने के साथ तीनों देवियों को नए वस्त्र पहनाए गए। आश्रम की तीन परिक्रमा कर मूर्तियों को वापस मां बाराही धाम के मंदिर लाया गया। रथ यात्रा में चारों खाम और सातों थोक के प्रतिनिधि शामिल थे।
बगवाल मेले की झलकियां:
निर्माणाधीन कार्यों से हुई दिक्कतें:
देवीधुरा में बगवाल मेला स्थल के आसपास पर्यटन विभाग के निर्माणाधीन कार्यो से दर्शकों को दिक्कतें पेश आई। मुख्य मंदिर परिसर में योद्धा भवन और दर्शक दीर्घा का निर्माण जारी रहने से लोगों के खड़े होने के लिए जगह का अभाव रहा।
दर्शकों ने चार घंटे पहले ही संभाल ली जगह
अधिकांश दर्शकों ने बगवाल शुरू होने से चार घंटे पहले ही जगह संभाल ली। दूरदराज से आने वाले लोग आसानी से बगवाल दिखने वाली जगहों पर मोर्चाबंदी किए रहे। जिस कारण बाद में आने वालों को जगह नहीं मिली।
बिच्छू घास से किया कई रणबांकुरों ने इलाज
बगवाल युद्ध के घायल होने वाले कई रणबांकुरों ने परंपरागत तरीके से बिच्छू घास लगाकर इलाज किया।
बुजुर्गों की अपेक्षा युवाओं में दिखा जोश
बगवाल में विभिन्न खामों और थोकों में बुजुर्गो की अपेक्षा युवाओं में अधिक जोश दिखा। सभी खामों में बगवाल खेलने वालों में बुजुर्गो की अपेक्षा युवाओं की तादात अधिक रही।
वाहनों को देवीधुरा से दो किमी पहले ही रोका
बगवाल मेले की व्यवस्था को लेकर वाहनों को देवीधुरा से दो किमी पहले ही रोका गया। लोहाघाट मार्ग पर जिला पंचायत के डाकबंगले से आगे वाहन नहीं जा सके, वहीं अल्मोड़ा मार्ग में वालिक के पास ही वाहनों को रोक दिया गया था।
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2018 की अपेक्षा इस बार एक मिनट अधिक बगवाल खेली गई। 98 बगवाली वीरों सहित कुल 122 लोग चोटिल हुए। पहली बार इस बार बगवाल के दौरान बारिश नहीं हुई। बगवाल खत्म होने के बाद गहरवाल खाम ने परिक्रमा पूरा होने से पहले ही बगवाल शुरू कराने का आरोप लगाते हुए नाराजगी जताई।
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अलबत्ता पीठाचार्य पीठाचार्य कीर्तिबल्लभ शास्त्री के समझाने-बुझाने से मामला सुलझ गया। शास्त्री का कहना है कि कोई विवाद नहीं हुआ। ये बस आंतरिक मामला है। गहरवाल खाम के कुछ नए लोग इसे ठीक से नहीं समझ सके, जिसके चलते कुछ लोगों में नाराजगी रही।
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मुख्य अतिथि डोल आश्रम के स्वामी श्री 1008 कल्याण दास, पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, सांसद अजय टम्टा, पूर्व स्पीकर गोविंद कुंजवाल, पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा, उप्र के विधायक प्रेम प्रकाश, विधायक राम सिंह कैड़ा, लोहाघाट के विधायक पूरन सिंह फर्त्याल सहित तमाम हस्तियां मौजूद थीं।
मैदान में प्रवेश करने से पहले सभी चारों खामों और सात थोक (चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया, वालिग, गोरना, कटना और फुलाराकोट) के योद्धाओं ने मां वज्र बाराही का जयकारा किया। वालिग खाम के बगवाली वीरों ने मुखिया बद्री सिंह बिष्ट के नेतृत्व में रणक्षेत्र में दस्तक दी, जबकि गंगा सिंह चम्याल के नेतृत्व में चम्याल खाम, वीरेंद्र सिंह लमगड़िया के नेतृत्व में लमगड़िया खाम और पान सिंह बिष्ट के नेतृत्व में गहरवाल खाम के योद्धाओं ने प्रवेश किया।
मां के जयकारे के साथ योद्धाओं ने व्रज बाराही के मंदिर की परिक्रमा करने के बाद चारों खामों के योद्धा अपने-अपने मोर्चे में डट गए। संकेत मिलते ही वालिग और लमगड़िया खाम ने फल-फूल बरसा कर बगवाल शुरू की, जबकि दूसरी तरफ से चम्याल और गहरवाल खाम मोर्चा ले रहा था। आठ मिनट तक नाशपाति, सेब और फूलों से बगवाल खेली गई, लेकिन आखिरी मिनट में फल खत्म होने से पत्थर भी बरसे।
पीत वस्त्रधारी पुजारी धर्मानंद ने अपराह्न 2.15 बजे चंवर झूलाकर बगवाल समाप्त होने का संकेत किया। बगवाल पर विराम लगने के बाद चारों खामों के योद्धाओं ने गले मिल कुशलक्षेम पूछी। सकुशल वापसी के लिए मां के सम्मुख शीश नवाया। 98 बगवाली वीर और 24 दर्शक घायल हुए। घायलों का चिकित्सा शिविर में डॉक्टरों की टीम ने इलाज किया।
बगवाल में इन्होंने लिया हिस्सा
लमगड़िया खाम के साथ मंदिर कमेटी के मुख्य संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया, खीम सिंह लमगड़िया, आन सिंह लमगड़िया, तारा सिंह, उमेद सिंह, किशन सिंह, लाल सिंह, दीवान सिंह, वालिग खाम की ओर से मदन सिंह, शेर सिंह, गोपाल सिंह, राजू बिष्ट, चेतन भैय्या, चम्याल खाम में लाल सिंह चम्याल, बिशन सिंह, विनोद चम्याल, जगदीश सिंग्वाल, गौरव सिंग्वाल और गहरवाल खाम की ओर से जोध सिंह बिष्ट, डुंगर सिंह बिष्ट, मोहन बिष्ट, दिनेश चम्याल, बद्री सिंह बिष्ट, खुशाल सिंह, माधो सिंह, गोपाल बिष्ट, लाल सिंह, पान सिंह आदि प्रमुख योद्धा थे। करीब एक हजार लोगों ने बगवाल खेली।
बगवाल देखने को मैदान ही नहीं, आसपास के मकानों की छतें भी खचाखच भरीं थीं। बगवाल शुरू होने से पूर्व पंडित कीर्ति बल्लभ शास्त्री और डॉ. भुवन चंद्र जोशी ने मां बाराही देवी की पूजा-अर्चना की। पूजा में चारों खामों के प्रतिनिधि शामिल हुए। बगवाल से पूर्व योद्धाओं ने मंदिर की परिक्रमा की।
वर्ष बगवाल का वक्त चोटिल
2015 10 मिनट 124 योद्धा और 25 दर्शक
2016 7 मिनट 59 योद्धा और 11 दर्शक
2017 8 मिनट 11 योद्धा और 323 दर्शक
2018 8 मिनट 112 योद्धा और 129 दर्शक
2019 9 मिनट 98 योद्धा और 24 दर्शक
बगवाल मेला : घंटे-दर-घंट
7.30 बजे : पूजा-अर्चना शुरू हुई।
8.30 बजे : पूजा-अर्चना पूरी हुई।
12.47 बजे : खामों का मंदिर में प्रवेश करना शुरू हुआ।
1.11 बजे : मंदिर की परिक्रमा।
2.03 बजे : बगवाल के लिए मैदान में प्रवेश।
2.06 बजे : बगवाल का श्रीगणेश।
2.15 बजे : बगवाल का समापन।
2.17 बजे : चारों खामों के योद्धाओं का गले मिलन।
इन्होंने भी की शिरकत
भाजपा जिलाध्यक्ष रामदत्त जोशी, पूर्व जिलाध्यक्ष शंकर दत्त पांडेय, सुभाष बगौली, डीएम सुरेंद्र नारायण पांडेय, एसपी धीरेंद्र गुंज्याल, एडीएम टीएस मर्तोलिया, मेला मजिस्ट्रेट शिप्रा जोशी, सहायक मेला मजिस्ट्रेट अमित ममगाईं, मेलाधिकारी राजेश कुमार, भगवत पाटनी, सीओ ध्यान सिंह आदि प्रमुख हस्तियां शामिल थीं।
एक साथ तीन पीढ़ी ने खेली बगवाल
चम्याल खाम के बची सिंह ने बेटे, भतीजे और दो पोतों के साथ खेली बगवाल
सुरेंद्र राज लडवाल
पाटी (चंपावत)। मां बाराही धाम में होने वाली बगवाल की आस्था का ये एक नजारा है। जिसने उम्र को पछाड़ा। खोलीखांण दुबचौड़ा मैदान में एक साथ तीन पीढ़ी बगवाल खेलने को मुस्तैद। बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक में एक जैसा उत्साह और उमंग। चम्याल खाम के बची सिंह सिंग्वाल (77) ने अपने बेटे, भतीजे और दो पोतों के साथ बगवाल में फल बरसाए।
बची सिंह अपने बेटे मोहन सिंह (42), बची सिंह के भतीजे जितेंद्र सिंह (39), बची सिंह के पोते विजय (18) और अमित सिंग्वाल (12) के साथ पूरे नौ मिनट तक खोलीखांण मैदान में बगवाल खेलते रहे। बगवाल के मैदान में उन्हें 26 साल पहले की स्मृतियां भी ताजा हो गई। जब 1993 में उन्होंने पहली बार बगवाल खेली। बताते हैं कि पहले बगवाल अधिक वक्त तक भी खेली जाती थी और बचाव के लिए फर्रे भी नहीं होते थे। मगर अब बगवाल का समय कम हो रहा है और बचाव के लिए बंदोबस्त तगड़ा है। बची सिंह कहते हैं कि बगवाल उन्हें सात्विकता, संयम के साथ आस्थावान जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। इसी के चलते उनके 12 साल के पोते अमित भी इसमें शिरकत कर रहे हैं। बगवाल देवीधुरा क्षेत्र को नाम और शान देता है। इसके प्रोत्साहन के लिए सरकार के अलावा स्थानीय लोगों को भी आगे आना होगा।
पहली बार बगवाल खेलने में हुई थी हिचक
बगवाल आस्था के साथ रोमांच भी पैदा करता है। ये कहना है दूसरी बार बगवाल खेलने आए 11वीं में पढ़ने वाले चम्याल खाम के आयुष का।
आयुष का कहना है कि पिछले साल बगवाल खेलने में झिझक महसूस हुई, मगर इस बार उन्होंने पूरी हिम्मत के साथ बगवाल में हिस्सा लिया। और अब वे आगे भी इसमें हमेशा शिरकत करेंगे। वहीं दो दशक से अधिक वक्त से बगवाल खेलने वाले वालिग खाम के प्रकाश जोशी बताते हैं कि बगवाल में भले ही कितने बदलाव क्यों न हो, मगर यह सात्विकता और संयमित जीवन जीने की प्रेरणा जरूर देता है।
एक पांव-एक हाथ नहीं, फिर भी बगवाल के साक्षी बने
पाटनपुल के दिव्यांग गोपाल राम को बगवाल से मिलती है ऊर्जा
कमल जोशी
चंपावत। हजारों लोगों के बीच एक पांव और एक हाथ के सहारे घिसटता एक श्रद्धालु आस्था की मिसाल था। हर किसी की नजर उस पर थी। लोहाघाट विकासखंड के पाटनपुल क्षेत्र के दिव्यांग गोपाल राम मां बाराही देवी का आशीर्वाद लेने और बगवाल के साक्षी बनने को कठिनाई के बीच भी देवीधुरा पहुंचे।
43 किमी दूर से देवीधुरा पहुंचे गोपाल बताते हैं कि वे बीते पांच वर्ष से लगातार बगवाल देखने के लिए आ रहे हैं। मां बाराही देवी के प्रति उनकी आस्था है। बगवाल देखने से उन्हें रोमांच से ज्यादा ऊर्जा मिलती है। एक दुर्घटना में करीब 11 साल पूर्व उनका एक हाथ और एक पांव कट गया था। मगर जिंदगी की इस कठिनाई को भी वे आस्था के आसरे सहजता से हंसते-मुस्कराते पार करते हैं।
दूरदराज से आए भक्तों ने मत्था टेका
देवीधुरा के बाराही मंदिर में बृहस्पतिवार सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने लग गई थी। भीड़ का आलम यह था कि मंदिर से लेकर खोलीखाड़ दुबाचौड़ तक खचाखच लोग भरे हुए थे। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को नियंत्रण करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी।
मन्नत के लिए उठाया एक क्विंटल से अधिक का पत्थर
देवीधुरा के खोलीखांण दुबाचौड़ मैदान में एक क्विंटल से अधिक वजन के गोल पत्थर को उठाने के लिए नौजवानों में होड़ मची रही। इस बार 49 लोगों ने इस भारी-भरकम पत्थर को उठाया। अल्मोड़ा जिले के बड़ियाड़ से आए 21 साल के रोशन लाल ने तो इसे कंधे पर उठा लिया, जबकि कुछ नौजवानों ने छाती तक पत्थर को उठाया। कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने पत्थर को लेकर मैदान के एक हिस्से की परिक्रमा तक कर डाली। मान्यता है कि इसे उठाने से मनोकामना पूरी होती है।
चोटिलों को तुरंत मिला इलाज ेवीधुरा बगवाल देखने और खेलने में कुल 122 लोग जख्मी हुए। इसमें चार महिला दर्शक भी थीं। चोटिलों के इलाज के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम पूरी तरह मुस्तैद थी। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ.आरपी खंडूरी के नेतृत्व में गठित दो टीमों ने घायलों का इलाज किया।
एसीएमओ डॉ.इंद्रजीत पांडेय, पाटी के एमओआईसी डॉ.आभाष सिंह, चंपावत जिला अस्पताल के अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ.एचएस ऐरी, डॉ.दीपिका जोशी, डॉ.देवेश, डॉ.कीर्ति मेहता, डॉ.राकेश, डॉ.रवि, फार्मेसिस्ट विष्णु गिरि गोस्वामी आदि ने इलाज किया। विधायक पूरन फर्त्याल ने चिकित्सा शिवर में घायलों का हालचाल जाना।
मेला राजकीय तो नहीं बना, मगर सियासी जरूर हुआ
बगवाल में शामिल नहीं हुए आयोजक संस्था के मुखिया खुशाल सिंह
पिछले साल भेजे जिला पंचायत के प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई नहीं हुई
मेला व्यवस्था को शासन से 2009 से नहीं मिली कोई रकम
चंद्रशेखर जोशी
देवीधुरा (चंपावत)। बगवाल मेले ने जगह तो जरूर बनाई, मगर इस मेले का आयोजन कराना जिला पंचायत के लिए टेढ़ी खीर बन रही है। बगवाल मेले को राजकीय मेले का दर्जा तो नहीं मिल सका, लेकिन इसमें सियासी रंग जरूर चढ़ गया।
बृहस्पतिवार को हुए बगवाल मेले में पहली बार ऐसा हुआ, जब आयोजक संस्था के मुखिया ही गैर हाजिर रहे। कांग्रेस नेता और जिला पंचायत अध्यक्ष खुशाल सिंह अधिकारी बगवाल में मौजूद नहीं थे। मोबाइल बंद होने से उनसे संपर्क भी नहीं हो सका। अलबत्ता कांग्रेस जिलाध्यक्ष उत्तम देव का कहना है कि वे मेले के उद्घाटन के दिन 11 अगस्त को मौजूद थे। बगवाल में उनका न पहुंचना सियासी नहीं, निजी कारण की वजह से है।
बगवाल देखने के लिए कांग्रेस नेता और पूर्व स्पीकर गोविंद कुंजवाल को छोड़ एक भी बड़ा नेता मौजूद नहीं था। जबकि भाजपा से जुड़े अधिकांश बड़े नेता बगवाल में मौजूद थे। वहीं 2009 से बगवाल मेले के आयोजन के लिए एक भी रुपया नहीं मिला है। पिछले साल बगवाल को राजकीय मेले में बदलने के लिए प्रस्ताव भेजा गया। ताकि इसमें होने वाले व्यय को सरकार वहन करेगी।
11 अगस्त से 14 दिन तक चलने वाले इस मेले के आयोजन में बिजली व्यवस्था, सफाई, अस्थायी निर्माण से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रम तक में मोटी रकम खर्च होती है। जिला पंचायत ने पिछले साल मेले को राजकीय मेला घोषित करने के लिए जिला प्रशासन के जरिये पर्यटन विभाग को प्रस्ताव भेजा था। ताकि जिला पंचायत पर कोई अतिरिक्त बोझ पड़े बिना मेले की भव्यता में विस्तार हो।
इधर सामाजिक कार्यकर्ता विनोद गड़कोटी ने राजकीय मेले की मांग को सांसद अजय टम्टा को ज्ञापन भी दिया। उधर, जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि देवीधुरा मेले की प्रसिद्धि और विस्तार को देखते हुए इसे राजकीय मेले का स्वरूप देने का प्रस्ताव पिछले साल भेजा गया था। लेकिन इसे अभी तक मूत रूप नहीं दिया गया है। इसलिए आयोजक संस्था होने के नाते जिला पंचायत को विकास की मद में कटौती कर काफी धन मेले में खर्च करना पता है।
वर्ष मेलावधि आयोजन पर हुआ खर्च (लाख रुपये)
2015 14 दिन 13.39
2016 12 दिन 6.22
2017 13 दिन 2.70
2018 14 दिन 5.75
मुचकुंद ऋषि के आश्रम तक निकली वज्र बाराही की शोभायात्रा
मां बाराही धाम की मूर्ति वालिग के गोविंद सिंह बागड़ को सौंपी
पाटी (चंपावत)। मां बाराही धाम देवीधुरा के बगवाल मेले में शुक्रवार को मां बज्र बाराही की शोभा यात्रा निकाली गई। 600 मीटर मुचकुंद ऋषि के आश्रम तक गई यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मां का आशीर्वाद लिया। मान्यता है कि देवासुर संग्राम में काल यवन राक्षस के साथ हुए युद्ध में मुचकुंद ऋषि ने देवताओं का साथ दिया था। इससे खुश हो मां बाराही ने स्वयं मुचकुंद ऋषि को दर्शन देने का वचन दिया था। इस यात्रा के जरिये इसी वचन को निभाने की परंपरा है।
बगवाल के दूसरे दिन शुक्रवार को नंदघर में बाराही मंदिर के पीठाचार्य आचार्य कीर्तिबल्लभ जोशी की अगुवाई में वैदिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करवाकर मूर्ति को वालिग गांव के धन सिंह बांगड़ के पुत्र जमन सिंह बांगड़ और पूरन सिंह बांगड़ को सौंपी गई। चारों खाम के मुखिया ताम्र पेटी में रखी मां बज्र बाराही, मां सरस्वती और मां काली की मूर्तियों को नंदगृह ले गए।
यहां रातभर महिलाओं ने व्रत रख कर जागरण किया। रातभर मां बाराही की ताम्र पेटी की सुरक्षा के लिए परंपरा के मुताबिक पुजारियों और चारों खामों के मुखियाओं ने पहरा दिया। ताम्र पेटी की चाबी पुजारी सौंपी गई। सुबह तीनों देवियों की विशेष पूजा कर तथा आंखों में काली पट्टी बांध कर गाय के दूध और गंगा जल सें स्नान कराने के साथ तीनों देवियों को नए वस्त्र पहनाए गए। आश्रम की तीन परिक्रमा कर मूर्तियों को वापस मां बाराही धाम के मंदिर लाया गया। रथ यात्रा में चारों खाम और सातों थोक के प्रतिनिधि शामिल थे।
बगवाल मेले की झलकियां:
निर्माणाधीन कार्यों से हुई दिक्कतें:
देवीधुरा में बगवाल मेला स्थल के आसपास पर्यटन विभाग के निर्माणाधीन कार्यो से दर्शकों को दिक्कतें पेश आई। मुख्य मंदिर परिसर में योद्धा भवन और दर्शक दीर्घा का निर्माण जारी रहने से लोगों के खड़े होने के लिए जगह का अभाव रहा।
दर्शकों ने चार घंटे पहले ही संभाल ली जगह
अधिकांश दर्शकों ने बगवाल शुरू होने से चार घंटे पहले ही जगह संभाल ली। दूरदराज से आने वाले लोग आसानी से बगवाल दिखने वाली जगहों पर मोर्चाबंदी किए रहे। जिस कारण बाद में आने वालों को जगह नहीं मिली।
बिच्छू घास से किया कई रणबांकुरों ने इलाज
बगवाल युद्ध के घायल होने वाले कई रणबांकुरों ने परंपरागत तरीके से बिच्छू घास लगाकर इलाज किया।
बुजुर्गों की अपेक्षा युवाओं में दिखा जोश
बगवाल में विभिन्न खामों और थोकों में बुजुर्गो की अपेक्षा युवाओं में अधिक जोश दिखा। सभी खामों में बगवाल खेलने वालों में बुजुर्गो की अपेक्षा युवाओं की तादात अधिक रही।
वाहनों को देवीधुरा से दो किमी पहले ही रोका
बगवाल मेले की व्यवस्था को लेकर वाहनों को देवीधुरा से दो किमी पहले ही रोका गया। लोहाघाट मार्ग पर जिला पंचायत के डाकबंगले से आगे वाहन नहीं जा सके, वहीं अल्मोड़ा मार्ग में वालिक के पास ही वाहनों को रोक दिया गया था।

आस्था की ताकत:देवीधुरा के खोलीखांण मैदान में एक कुंतल से अधिक वजन के पत्थर को सहजता से उठाता एक श्?- फोटो : CHAMPAWAT

देवीधुरा में बगवाल शुरू होने से पहले फर्रो के साथ परिक्रमा करते गहरवाल खाम के योद्धा।- फोटो : CHAMPAWAT

देवीधुरा के बगवाल मेले में मौका देख फलों की मार करतें योद्धा।- फोटो : CHAMPAWAT

देवीधुरा के बगवाल मेले में फलों की मार करते गहरवाल व वागिम खाम के योद्धा।- फोटो : CHAMPAWAT

देवीधुरा के खोलीखांण मैदान में बगवाल खेलते योद्धा।- फोटो : CHAMPAWAT

देवीधुरा के बगवाल मेले में फलों की मार करते चम्याल और लमगड़िया खाम के योद्घा।- फोटो : CHAMPAWAT

मां बाराही धाम देवीधुरा के बगवाल मेले में फलों से एक-दूसरे पर मार करते खामों के योद्धा।- फोटो : CHAMPAWAT