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इनके लिए चुनाव का कोई मतलब नहीं
राजेश पंगरिया ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़।
Updated Mon, 06 Feb 2017 11:39 PM IST
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तड़ीगांव
- फोटो : अमर उजाला
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राज्य गठन के 16 साल बाद भी नेपाल सीमा से सटे भारतीय गांवों के लिए विधान सभा चुनावों का कोई अर्थ नहीं है। लोगों को मानना है कि यह चुनाव भी उनकी बुनियादी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं लाएगा। नेपाल सीमा से सटा तड़ी गांव और पीपलतड़ा गांव पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्र में है। बलतड़ी डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र में है। तड़ीगांव और पीपलतड़ा तक सड़क नहीं पहुंची है। बलतड़ी से 500 मीटर की दूरी तक कच्ची सड़क तो बन गई है, लेकिन गांव में पेयजल की समस्या है।
जिला मुख्यालय से 48 किलोमीटर दूर नेपाल सीमा पर बसे अंतिम गांव तड़ीगांव पहुंचने पर लगा कि लोकतंत्र के इस पर्व की यहां कोई हवा तक नहीं है। मूनाकोट ब्लाक में झूलाघाट-पिथौरागढ़ मोटर मार्ग पर पिथौरागढ़ से 35 किमी दूर एसएसबी ई कंपनी मुख्यालय के पास से सुबह 9.30 बजे पहले छह किलोमीटर कच्ची सड़क पर स्कूटी से चलने के बाद सबसे पहले 11.15 पर डीडीहाट विधानसभा के बलतड़ी गांव पहुंचे। इस गांव में पानी की समस्या से लोग जूझ रहे हैं। वहां से सात किलोमीटर की ऊंचे-नीचे ढलान वाले सिर्फ एक फीट चौड़े पैदल रास्ते से चलना हुआ। रास्ते के एक ओर महाकाली नदी अपनी तीव्र वेग के साथ बह रही थी। यदि रास्ते से ध्यान हटा तो सीधे महाकाली में गिरने में देर नहीं लगती। दोपहर बाद पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के अंतिम छोर तड़ीगांव पहुंचे। गांव के लोगों ने बताया कि इस गांव के ठीक सामने नेपाल के मटेला और खड़ेनी गांव बहुत पहले ही सड़क सुविधा से जुड़ चुके हैं। आज भी गांव के लोगों को बस के लिए 10 किलोमीटर पैदल चलकर अड़किनी या गौरीहाट जाना पड़ता है।
राज्य बनने के बाद नेता सिर्फ वोट मांगने के लिए ही गांव में आते हैं, फिर दोबारा नहीं दिखाई देते। अब यहां के लोगों को टनकपुर-जौलजीबी रोड पर आस टिकी है। लोगों को पंचेश्वर बांध का डर भी है। इसके अलावा गांव में पानी की समस्या भी है। इन गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ पहुंचाने के लिए बलतड़ी में एएनएम सेंटर और अस्पताल है, पर उनमें नर्स और फार्मेसिस्ट नहीं आते।
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तड़ीगाव : सिगनल के लिए एक मकान की छत पर रखे रहते हैं सारे फोन
गांव में बीएसएनएल के सिग्नल ही काम करते हैं। इसके लिए एक मकान की छत पर जाना पड़ता है। इसीलिए गांव के सभी लोग अपने मोबाइल उसी छत पर रखते हैं। गांव में इस समय 26 परिवार रहते हैं। 20 परिवार काफी पहले तराई में पलायन कर चुके हैं। इसी कारण कई मकान खंडहर बन चुके हैं। गांव में सरकारी सुविधाएं ना के बराबर हैं। गांव के सभी लोगो ने स्वयं के स्रोत से शौचालय बना रखे हैं। गांव में 130 मतदाता ही रह गये हैं। महाकाली हर साल बारिश में गांव की जमीन को लीलती जा रही है। यहां के लोगों को इलाज और डिलीवरी के लिए भी सात किमी पैदल और कच्ची पक्की सड़क के रास्ते झूलाघाट जाना पड़ता है।
वोट देने के लिए पांच किमी दूर जाना पड़ेगा
झूलाघाट। बोनकोट प्राथमिक स्कूल में मतदान केंद्र है। वहां पर तड़ीगांव, पीपलतड़ा, तोक, टाकुला तोक, बोनकोट, जायल, लमीजर, ज्ञानपीपली के 421 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यहां के लोगो को वोट देने के लिए 5 किमी का सफर तय करना होगा। मतदान केंद्र तक जाने का रास्ता इतना खराब है कि कभी कोई गिर सकता है। मतदान केंद्र में लाइट भी नहीं है।
फोटो 06 पीटीएच 03 पी
तड़ीगांव : दो-तीन दिन में मिल पाती है किसी गतिविधि की सूचना
झूलाघाट। तड़ी गांव के लोगों का कहना है कि विकास के नाम पर वर्तमान विधायक ने पिछले साल टाकुला में जूनियर हाईस्कूल खोला है। गांव के लोगों ने जम्मू-कश्मीर की तरह सरकार से यहां के लोगों को एलाउंस देने की बात कही है। गांव में कुछ ही घरों में टीवी हैं। ज्यादातर लोग आज भी रेडियो में देश विदेश के समाचार और गाने सुनते हैं। जिला मुख्यालय में होने वाले किसी भी गतिविधि की सूचना यहां 2-3 दिन में मिल पाती हैं।
ठीक ऐसे ही हाल पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के पीपलतड़ा गांव के भी हैं। यह गांव भी मोटर मार्ग से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां भी सड़क न होने के कारण गांव के कई परिवारों ने तराई में शरण ले ली है। गांव में अब 7 परिवार ही रह गए हैं।
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जिला मुख्यालय से 48 किलोमीटर दूर नेपाल सीमा पर बसे अंतिम गांव तड़ीगांव पहुंचने पर लगा कि लोकतंत्र के इस पर्व की यहां कोई हवा तक नहीं है। मूनाकोट ब्लाक में झूलाघाट-पिथौरागढ़ मोटर मार्ग पर पिथौरागढ़ से 35 किमी दूर एसएसबी ई कंपनी मुख्यालय के पास से सुबह 9.30 बजे पहले छह किलोमीटर कच्ची सड़क पर स्कूटी से चलने के बाद सबसे पहले 11.15 पर डीडीहाट विधानसभा के बलतड़ी गांव पहुंचे। इस गांव में पानी की समस्या से लोग जूझ रहे हैं। वहां से सात किलोमीटर की ऊंचे-नीचे ढलान वाले सिर्फ एक फीट चौड़े पैदल रास्ते से चलना हुआ। रास्ते के एक ओर महाकाली नदी अपनी तीव्र वेग के साथ बह रही थी। यदि रास्ते से ध्यान हटा तो सीधे महाकाली में गिरने में देर नहीं लगती। दोपहर बाद पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के अंतिम छोर तड़ीगांव पहुंचे। गांव के लोगों ने बताया कि इस गांव के ठीक सामने नेपाल के मटेला और खड़ेनी गांव बहुत पहले ही सड़क सुविधा से जुड़ चुके हैं। आज भी गांव के लोगों को बस के लिए 10 किलोमीटर पैदल चलकर अड़किनी या गौरीहाट जाना पड़ता है।
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राज्य बनने के बाद नेता सिर्फ वोट मांगने के लिए ही गांव में आते हैं, फिर दोबारा नहीं दिखाई देते। अब यहां के लोगों को टनकपुर-जौलजीबी रोड पर आस टिकी है। लोगों को पंचेश्वर बांध का डर भी है। इसके अलावा गांव में पानी की समस्या भी है। इन गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ पहुंचाने के लिए बलतड़ी में एएनएम सेंटर और अस्पताल है, पर उनमें नर्स और फार्मेसिस्ट नहीं आते।
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तड़ीगाव : सिगनल के लिए एक मकान की छत पर रखे रहते हैं सारे फोन
गांव में बीएसएनएल के सिग्नल ही काम करते हैं। इसके लिए एक मकान की छत पर जाना पड़ता है। इसीलिए गांव के सभी लोग अपने मोबाइल उसी छत पर रखते हैं। गांव में इस समय 26 परिवार रहते हैं। 20 परिवार काफी पहले तराई में पलायन कर चुके हैं। इसी कारण कई मकान खंडहर बन चुके हैं। गांव में सरकारी सुविधाएं ना के बराबर हैं। गांव के सभी लोगो ने स्वयं के स्रोत से शौचालय बना रखे हैं। गांव में 130 मतदाता ही रह गये हैं। महाकाली हर साल बारिश में गांव की जमीन को लीलती जा रही है। यहां के लोगों को इलाज और डिलीवरी के लिए भी सात किमी पैदल और कच्ची पक्की सड़क के रास्ते झूलाघाट जाना पड़ता है।
वोट देने के लिए पांच किमी दूर जाना पड़ेगा
झूलाघाट। बोनकोट प्राथमिक स्कूल में मतदान केंद्र है। वहां पर तड़ीगांव, पीपलतड़ा, तोक, टाकुला तोक, बोनकोट, जायल, लमीजर, ज्ञानपीपली के 421 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यहां के लोगो को वोट देने के लिए 5 किमी का सफर तय करना होगा। मतदान केंद्र तक जाने का रास्ता इतना खराब है कि कभी कोई गिर सकता है। मतदान केंद्र में लाइट भी नहीं है।
फोटो 06 पीटीएच 03 पी
तड़ीगांव : दो-तीन दिन में मिल पाती है किसी गतिविधि की सूचना
झूलाघाट। तड़ी गांव के लोगों का कहना है कि विकास के नाम पर वर्तमान विधायक ने पिछले साल टाकुला में जूनियर हाईस्कूल खोला है। गांव के लोगों ने जम्मू-कश्मीर की तरह सरकार से यहां के लोगों को एलाउंस देने की बात कही है। गांव में कुछ ही घरों में टीवी हैं। ज्यादातर लोग आज भी रेडियो में देश विदेश के समाचार और गाने सुनते हैं। जिला मुख्यालय में होने वाले किसी भी गतिविधि की सूचना यहां 2-3 दिन में मिल पाती हैं।
ठीक ऐसे ही हाल पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के पीपलतड़ा गांव के भी हैं। यह गांव भी मोटर मार्ग से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां भी सड़क न होने के कारण गांव के कई परिवारों ने तराई में शरण ले ली है। गांव में अब 7 परिवार ही रह गए हैं।