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इंजीनियरिंग छोड़ गमला उद्योग में कमा रहे नाम
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ंपावत जिले के सलना में गमला उद्योग में हाथ बंटा रहे प्रवासी बबलू कुमार।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। कोरोना काल में निजी क्षेत्र के इंजीनियर ने काम छोड़ अपने पुश्तैनी कारोबार को स्वीकारा है। यह इंजीनियर खुद गमले बनाकर दूसरे प्रवासियों को भी काम सिखा रहे हैं।
लोहाघाट के सलना गांव निवासी बबलू कुमार कोरोना से पहले सिडकुल की एक नामी कंपनी में इंजीनियर थे। कोरोना काल में वह घर लौटे और पुश्तैनी काम शुरू किया। बबलू के पिता राकेश कुमार ने 2006 में गमला उद्योग शुरू किया। 2014 में उद्योग विभाग की ओर से ढाई लाख रुपये का कर्ज लेकर उद्योग को आगे बढ़ाया। पिता के काम को आगे बढ़ाने के साथ बबलू दूसरे राज्यों से आए प्रवासियों को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
बाजार में खूब हो रही है बबलू के गमलों की मांग
चंपावत। सीमेंट के गमलों की बाजार में मांग है। चंपावत सहित अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जिलों में से भी गमलों के खरीदार पहुंच रहे हैं। एक गमले की कीमत 60 से 300 रुपये तक है। बबलू का कहना है कि पूरा परिवार इस कार्य में उनका सहयोग कर रहा है। इससे 15 हजार रुपये से अधिक मासिक आय हो रही है।
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लोहाघाट के सलना गांव निवासी बबलू कुमार कोरोना से पहले सिडकुल की एक नामी कंपनी में इंजीनियर थे। कोरोना काल में वह घर लौटे और पुश्तैनी काम शुरू किया। बबलू के पिता राकेश कुमार ने 2006 में गमला उद्योग शुरू किया। 2014 में उद्योग विभाग की ओर से ढाई लाख रुपये का कर्ज लेकर उद्योग को आगे बढ़ाया। पिता के काम को आगे बढ़ाने के साथ बबलू दूसरे राज्यों से आए प्रवासियों को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
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बाजार में खूब हो रही है बबलू के गमलों की मांग
चंपावत। सीमेंट के गमलों की बाजार में मांग है। चंपावत सहित अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जिलों में से भी गमलों के खरीदार पहुंच रहे हैं। एक गमले की कीमत 60 से 300 रुपये तक है। बबलू का कहना है कि पूरा परिवार इस कार्य में उनका सहयोग कर रहा है। इससे 15 हजार रुपये से अधिक मासिक आय हो रही है।
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