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...और मिट्टी में मिल गए 2.02 करोड़ रुपये!
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत।
Updated Thu, 23 Nov 2017 10:50 PM IST
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शुरू होने का इंतजार करता टनकपुर का ट्रामा सेंटर
- फोटो : अमर उजाला
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करीब दो वर्ष से टनकपुर और लोहाघाट ट्रामा सेंटर भवन किसी काम नहीं आ रहे थे। न इलाज हो रहा था और नहीं कोई दूसरा उपयोग। अब शासन द्वारा ट्रामा सेंटरों को अस्पताल में विलय (मर्ज) करने का फैसला लिया गया है। चंपावत जिले में तो इस विलय का कोई लाभ कम से कम मरीजों को तो नहीं मिल सकेगा। इसकी वजह यह कि दोनों ट्रामा सेंटर अस्पताल से बेहद नजदीक हैं और दोनों अस्पतालों में जगह की कतई कमी नहीं है।
शासन ने विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी की दलील देते हुए ट्रामा सेंटरों को अस्पतालों में विलय करने का निर्णय लिया है। इस फैसले का असर चंपावत जिले के दोनों ट्रामा सेंटरों पर भी पड़ेगा। लोहाघाट व टनकपुर ट्रामा सेंटरों के भवन बनाने में ही 2.02 करोड़ रुपये खर्च हुए। निर्माणदायी संस्था ने 2015 के अंत में ये भवन स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित भी कर दिए। लेकिन इनका उपयोग आज तक एक भी दिन नहीं हो सका है। इसकी वजह इन केंद्रों में न डॉक्टरों व अन्य पैरा मेडिकल स्टाफ की तैनाती का न होना रहा। साथ ही केंद्र के लिए उपकरणों की आपूर्ति भी नहीं हो सकी। दोनों ट्रामा सेंटर में ताले लटके हैं। उपयोग में नहीं आने से भवन भी खस्ताहाल होने लगे हैं। टनकपुर ट्रामा सेंटर के शीशे तक टूटने लगे।
अगर इन ट्रामा सेंटरों का अस्पताल में मर्ज भी कर दिया जाए, तो इलाज में इससे रत्तीभर सुधार नहीं होगा। दोनों ट्रामा सेंटर अस्पताल से लगे हैं। टनकपुर संयुक्त अस्पताल और लोहाघाट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में जगह की कमी नहीं है। जरूरत जगह की नहीं, बल्कि डॉक्टरों की है। टनकपुर व लोहाघाट अस्पताल में दस पद रिक्त हैं। इन पदों को भरे जाने के बाद ही मरीजों का दर्द कम किया जा सकेगा। वैसे भी चंपावत जिले में जिला अस्पताल सहित छोटे-बड़े कुल 23 सरकारी स्वास्थ्य केंद्र हैं। डॉक्टरों के सृजित 94 पदों में से बमुश्किल 40 ही भरे जा सके हैं।
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पूर्व एजी ने उपयोगिता पर उठाए थे सवाल
शासन से पहले प्रदेश महालेखाकार भी आठ ट्रामा सेंटरों पर सवाल उठा चुका है। फरवरी 2012 में एजी के निरीक्षण अधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिख स्थल चयन के औचित्य व उपयोगिता पर कई सवाल उठाए थे। टीम का कहना था कि अस्पतालों में ही विशेषज्ञ डॉक्टरों के अधिकांश पद रिक्त हैं। ऐसे में ट्रामा सेंटर का संचालन कठिन होगा। तब विभाग ने ट्रामा सेंटरों की उपयोगिता की दलील देकर एजी द्वारा खड़े किए गए सवालों का जवाब दिया था।
बाक्स
सिर्फ इमारत से नहीं होगा इलाज
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) से सेवानिवृत्त कर्मी पुष्कर दत्त जोशी कई ऑपरेशनों में शिरकत कर चुके हैं। ऑपरेशन में चोटिल कर्मी का कहना है कि जिले के किसी भी अस्पताल में मामूली इलाज की भी सुविधा नहीं है। उन्हें सामान्य इलाज के लिए भी सुरक्षा बलों के अनुमन्य अस्पतालों में जाना पड़ता है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य जैसे बुनियादी जरूरतों से वंचित पहाड़ के लोगों की बड़ी रकम इलाज में खर्च हो रही है। इलाज के नाम पर भवन बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, इसके लिए जरूरी सुविधा जुटानी होगी।
कोट
जिले के दोनों ट्रामा सेंटर फिलहाल इलाज करने लायक की स्थिति में नहीं है। ट्रामा सेंटर को सरकारी अस्पतालों में विलय करने का फिलहाल कोई आदेश नहीं मिला है। आदेश मिलने के बाद जरूरी कार्यवाही की जाएगी।
डा.एमएस बोहरा,
मुख्य चिकित्साधिकारी, चंपावत।
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शासन ने विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी की दलील देते हुए ट्रामा सेंटरों को अस्पतालों में विलय करने का निर्णय लिया है। इस फैसले का असर चंपावत जिले के दोनों ट्रामा सेंटरों पर भी पड़ेगा। लोहाघाट व टनकपुर ट्रामा सेंटरों के भवन बनाने में ही 2.02 करोड़ रुपये खर्च हुए। निर्माणदायी संस्था ने 2015 के अंत में ये भवन स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित भी कर दिए। लेकिन इनका उपयोग आज तक एक भी दिन नहीं हो सका है। इसकी वजह इन केंद्रों में न डॉक्टरों व अन्य पैरा मेडिकल स्टाफ की तैनाती का न होना रहा। साथ ही केंद्र के लिए उपकरणों की आपूर्ति भी नहीं हो सकी। दोनों ट्रामा सेंटर में ताले लटके हैं। उपयोग में नहीं आने से भवन भी खस्ताहाल होने लगे हैं। टनकपुर ट्रामा सेंटर के शीशे तक टूटने लगे।
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अगर इन ट्रामा सेंटरों का अस्पताल में मर्ज भी कर दिया जाए, तो इलाज में इससे रत्तीभर सुधार नहीं होगा। दोनों ट्रामा सेंटर अस्पताल से लगे हैं। टनकपुर संयुक्त अस्पताल और लोहाघाट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में जगह की कमी नहीं है। जरूरत जगह की नहीं, बल्कि डॉक्टरों की है। टनकपुर व लोहाघाट अस्पताल में दस पद रिक्त हैं। इन पदों को भरे जाने के बाद ही मरीजों का दर्द कम किया जा सकेगा। वैसे भी चंपावत जिले में जिला अस्पताल सहित छोटे-बड़े कुल 23 सरकारी स्वास्थ्य केंद्र हैं। डॉक्टरों के सृजित 94 पदों में से बमुश्किल 40 ही भरे जा सके हैं।
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पूर्व एजी ने उपयोगिता पर उठाए थे सवाल
शासन से पहले प्रदेश महालेखाकार भी आठ ट्रामा सेंटरों पर सवाल उठा चुका है। फरवरी 2012 में एजी के निरीक्षण अधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिख स्थल चयन के औचित्य व उपयोगिता पर कई सवाल उठाए थे। टीम का कहना था कि अस्पतालों में ही विशेषज्ञ डॉक्टरों के अधिकांश पद रिक्त हैं। ऐसे में ट्रामा सेंटर का संचालन कठिन होगा। तब विभाग ने ट्रामा सेंटरों की उपयोगिता की दलील देकर एजी द्वारा खड़े किए गए सवालों का जवाब दिया था।
बाक्स
सिर्फ इमारत से नहीं होगा इलाज
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) से सेवानिवृत्त कर्मी पुष्कर दत्त जोशी कई ऑपरेशनों में शिरकत कर चुके हैं। ऑपरेशन में चोटिल कर्मी का कहना है कि जिले के किसी भी अस्पताल में मामूली इलाज की भी सुविधा नहीं है। उन्हें सामान्य इलाज के लिए भी सुरक्षा बलों के अनुमन्य अस्पतालों में जाना पड़ता है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य जैसे बुनियादी जरूरतों से वंचित पहाड़ के लोगों की बड़ी रकम इलाज में खर्च हो रही है। इलाज के नाम पर भवन बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, इसके लिए जरूरी सुविधा जुटानी होगी।
कोट
जिले के दोनों ट्रामा सेंटर फिलहाल इलाज करने लायक की स्थिति में नहीं है। ट्रामा सेंटर को सरकारी अस्पतालों में विलय करने का फिलहाल कोई आदेश नहीं मिला है। आदेश मिलने के बाद जरूरी कार्यवाही की जाएगी।
डा.एमएस बोहरा,
मुख्य चिकित्साधिकारी, चंपावत।