धर्म निरपेक्षता की मिसाल है गौड़बाबा और सैयद वलीबाबा की दोस्ती

Champawat Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
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बनबसा। अभियांत्रिकि के अलावा धार्मिक एकता के रूप में भी पहचान है बनबसा की। शारदा बैराज, शारदा नहर एवं एनएचपीसी के विद्युत गृह के साथ ही बनबसा प्रसिद्ध है। धार्मिक एकता के प्रतीक गौड़बाबा एवं सैयदवली बाबा की मैत्री के लिए। दो सूफी संतों की मैत्री से प्रेरणा लेने, धर्म निरपेक्षता का सबक सीखने एवं मानव धर्म की विरासत को आगे बढ़ाने को हर साल मई के महीने में यहां उर्स का आयोजन किया जाता है। सैयद वलीबाबा की मजार पर उर्स तथा गौड़ बाबा मंदिर पर भजन-कीर्तनों का आयोजन हिंदू-मुस्लिम एकता एवं सर्व धर्म संभाव का प्रतीक है। मेरठ के नौचंदी मेले की तर्ज पर यहां होता है वलीबाबा का उर्स।
हर साल की तरह इस बार भी 23 मई से सैयद वलीबाबा का सालाना उर्स जोरशोर से मनाया जाएगा। गौड़बाबा एवं वलीबाबा की मैत्री के प्रतीक इस धार्मिक आयोजन से कौमी एवं धार्मिक एकता की सीख मिलती है। बताया जाता है कि परस्पर विरोधी धर्म के बावजूद गौढ़बाबा एवं सैयद वलीबाबा घनिष्ठ मित्र थे। उनकी मैत्री, मानवता एवं एकता के कई किस्से हैं। दोनो पीर-फकीरों के अवसान के बाद भी उनकी मैत्री एवं एकता के किस्से प्रचलित रहे हैं। शारदा हेडवर्कस (यूपी सिंचाई विभाग) के अवकाश प्राप्त कर्मी वयोवृद्ध महमूद खान बताते हैं कि उनके बुजुर्ग सैयद वलीबाबा एवं गौड़ बाबा की मैत्री एवं धर्म निरपेक्षता के किस्से बताते थे। बताया जाता है कि 1928 में अंग्रेज हुकमरानों के समय के निर्मित शारदा बैराज निर्माण काल में सिल्ट इजेक्टर का निर्माण बड़ी समस्या बन गया था। सिल्ट इजेक्टर निर्माण में कई व्यवधान पैदा हो रहे थे। कभी निर्माण ध्वस्त हो जाता था तो कभी कोई दुर्घटना हो जाती। अंग्रेज अभियंता एवं विशेषज्ञ खासे परेशान थे। फिरंगी हिंदू-मुस्लिमों की सलाह भी नहीं मान रहे थे। कहते हैं कि बैराज निर्माण में लगे एक अंग्रेज अभियंता को एक दिन स्वप्न आया कि यदि सिल्ट इजेक्टर निर्माण स्थल पर एक ओर गौड़बाबा की समाधि तथा दूसरी ओर सैयद वलीबाबा की मजार बना दी जाए तो सिल्ट इजेक्टर निर्माण आसान हो जाएगा। शारदा बैराज के निकट स्थित सिल्ट इजेक्टर के पूर्वी छोर पर गौड़बाबा का मंदिर तथा पश्चिम छोर पर वलीबाब की मजार का निर्माण कराए जाने के बाद वहां सिल्ट इजेक्टर का निर्माण आसानी से हो गया। तभी से गौड़बाबा एवं वलीबाबा को याद करने की परंपरा बनी। हर साल क्षेत्र के हिंदू-मुस्लिम एकजुट होकर सैयद वलीबाबा का सालाना उर्स मनाते हैं तथा गौड़बाबा को भी याद करते हैं। इस वर्ष भी 23 मई से वलीबाबा का सालाना उर्स मनाया जाएगा इस दौरान गौड़बाबा मंदिर पर भी रोशनी आदि कर सजावट होगी तथा भजन-कीर्तन होंगे। यह धार्मिक अनुष्ठान दो धर्मों एवं कौमी एकता का प्रतीक तो है ही साथ ही मुल्क की तरक्की, धार्मिक एकता एवं मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना की सीख देता है।

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