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17 साल में हो गए 5.61 गुना खाली हाथ
Updated Thu, 09 Nov 2017 11:40 PM IST
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योगेश जोशी
चंपावत। देश की तरह ही जिले में भी नौजवानों की तादात में तेजी से इजाफा हो रहा है। यंग इंडिया की तर्ज पर चंपावत जिले में भी नवयुवकों की तादात एक लाख को छू रही है। मगर इन नौजवानों के लिए सबसे बड़ा खतरा काम का अभाव है। बेरोजगारी का दंश तेजी से उछाल मार रहा है। हाल यह है कि राज्य बनने के 17 वर्ष बाद बेरोजगारों की तादात में 5.61 गुना इजाफा हो गया है।
उत्तर प्रदेश से अलग होने की चाहत के पीछे बेरोजगारी सबसे बड़ा कारण था। ओबीसी के लिए सरकारी संस्थाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण ने इसमें आग में घी डालने का काम किया। पर राज्य बनने के बाद नौजवान नेपथ्य में हैं। जिले में करीब 2.65 लाख की आबादी में 18 वर्ष से 39 साल तक की आबादी 99039 (37.37 प्रतिशत) युवा हैं। इन 17 वर्षों में वे खुद को दुविधा में पा रहे हैं। सेवायोजन के आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हैं।
जिला सेवायोजन अधिकारी आरके पंत का कहना है कि इस वक्त सेवायोजन कार्यालय में 24939 युवा पंजीकृत हैं। जबकि राज्य निर्माण के वक्त ये संख्या 4445 थी। यानि बेरोजगार 2000 के सापेक्ष बढ़कर अब 5.61 गुना हो गए हैं। वहीं सेवायोजन के भर्ती मेलों के जरिये निजी क्षेत्र में काम पाने वालों की संख्या बमुश्किल 800 रही है। इस साल अब तक लगे 7 रोजगार मेलों में 136 युवकों को रोजगार दिया गया।
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स्वरोजगार की योजनाओं पर भी मजबूत लोगों का कब्जा
काम न सही, स्वरोजगार की सरकारी योजनाएं भी हवा हवाई ही रही है। दरअसल इन योजनाओं में से बहुतायत पर आर्थिक रुप से मजबूत लोगों का कब्जा है। चंद्र सिंह गढ़वाली स्वरोजगार योजना हो या उद्योगों के जरिये मिलने वाला रोजगार, अधिकतर जगह आर्थिक रूप से सक्षम एवं समाज के नामचीन लोग योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं।
चंपावत जिले में चंद्र सिंह गढ़वाली योजना से 100 से ज्यादा और औद्योगिक आस्थान के जरिए दो हजार लोगों को लाभ दिया गया है। मगर बेरोजगारों का कहना है कि इसमें स्वरोजगार का लाभ पाने वाले बेरोजगार बमुश्किल 15 प्रतिशत भी नहीं है।
नौजवानों को कुंठित कर रही है बेरोजगारी
रोजगार की कमी दूर तक मार कर रही है। खाली हाथ ऊर्जावान नौजवानों को कुंठित कर रहे हैं। बेरोजगारी सिर्फ आर्थिक ही नहीं, कई तरह की सामाजिक समस्याओं को भी बढ़ा रही है। छात्रों का कहना है कि राज्य के विकास की मौजूदा दिशा से नौजवान निराश हैं। रोजगारपरक शिक्षा है नहीं। अधिकतर शिक्षण संस्थाएं सिर्फ संख्या बढ़ाने एवं आंकड़ों को चमकाने के लिए हैं।
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चंपावत। देश की तरह ही जिले में भी नौजवानों की तादात में तेजी से इजाफा हो रहा है। यंग इंडिया की तर्ज पर चंपावत जिले में भी नवयुवकों की तादात एक लाख को छू रही है। मगर इन नौजवानों के लिए सबसे बड़ा खतरा काम का अभाव है। बेरोजगारी का दंश तेजी से उछाल मार रहा है। हाल यह है कि राज्य बनने के 17 वर्ष बाद बेरोजगारों की तादात में 5.61 गुना इजाफा हो गया है।
उत्तर प्रदेश से अलग होने की चाहत के पीछे बेरोजगारी सबसे बड़ा कारण था। ओबीसी के लिए सरकारी संस्थाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण ने इसमें आग में घी डालने का काम किया। पर राज्य बनने के बाद नौजवान नेपथ्य में हैं। जिले में करीब 2.65 लाख की आबादी में 18 वर्ष से 39 साल तक की आबादी 99039 (37.37 प्रतिशत) युवा हैं। इन 17 वर्षों में वे खुद को दुविधा में पा रहे हैं। सेवायोजन के आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हैं।
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जिला सेवायोजन अधिकारी आरके पंत का कहना है कि इस वक्त सेवायोजन कार्यालय में 24939 युवा पंजीकृत हैं। जबकि राज्य निर्माण के वक्त ये संख्या 4445 थी। यानि बेरोजगार 2000 के सापेक्ष बढ़कर अब 5.61 गुना हो गए हैं। वहीं सेवायोजन के भर्ती मेलों के जरिये निजी क्षेत्र में काम पाने वालों की संख्या बमुश्किल 800 रही है। इस साल अब तक लगे 7 रोजगार मेलों में 136 युवकों को रोजगार दिया गया।
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स्वरोजगार की योजनाओं पर भी मजबूत लोगों का कब्जा
काम न सही, स्वरोजगार की सरकारी योजनाएं भी हवा हवाई ही रही है। दरअसल इन योजनाओं में से बहुतायत पर आर्थिक रुप से मजबूत लोगों का कब्जा है। चंद्र सिंह गढ़वाली स्वरोजगार योजना हो या उद्योगों के जरिये मिलने वाला रोजगार, अधिकतर जगह आर्थिक रूप से सक्षम एवं समाज के नामचीन लोग योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं।
चंपावत जिले में चंद्र सिंह गढ़वाली योजना से 100 से ज्यादा और औद्योगिक आस्थान के जरिए दो हजार लोगों को लाभ दिया गया है। मगर बेरोजगारों का कहना है कि इसमें स्वरोजगार का लाभ पाने वाले बेरोजगार बमुश्किल 15 प्रतिशत भी नहीं है।
नौजवानों को कुंठित कर रही है बेरोजगारी
रोजगार की कमी दूर तक मार कर रही है। खाली हाथ ऊर्जावान नौजवानों को कुंठित कर रहे हैं। बेरोजगारी सिर्फ आर्थिक ही नहीं, कई तरह की सामाजिक समस्याओं को भी बढ़ा रही है। छात्रों का कहना है कि राज्य के विकास की मौजूदा दिशा से नौजवान निराश हैं। रोजगारपरक शिक्षा है नहीं। अधिकतर शिक्षण संस्थाएं सिर्फ संख्या बढ़ाने एवं आंकड़ों को चमकाने के लिए हैं।