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मेक इन इंडिया की आहट से दूर है चंपावत
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चंपावत। लोकसभा चुनाव में रोजगार और स्वरोजगार की खूब चर्चा हो रही है। यहां यह मुद्दा भी बन रहा है लेकिन जिले में रोजगार के नाम पर एक भी कायदे का उद्योग नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से सितंबर 2014 से शुरू मेक इन इंडिया कार्यक्रम के जमीनी हालात भी ठीक नहीं है। यहां न तो एक बड़ा नया उद्यम लग सका और न ही कुमाऊं मंडल विकास निगम की बंद पड़ी रोजिन टरपंटाइन फैक्ट्री के ताले ही खुल सके।
80 के दशक में चीड़ बाहुल्य चंपावत में 230 नाली जमीन पर खुली केएमवीएन की रोजिन टरपंटाइन फैक्ट्री भी करीब 14 साल पहले बंद हो गई। इस फैक्ट्री को दुबारा शुरू करने की निगम की कोई योजना भी नहीं है। फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मियों को गैस, पर्यटक आवास गृह सहित निगम की दूसरी इकाइयों में समायोजित किया जा चुका है। वहीं लाखों रुपये की मशीनें जंक खा रही हैं।
केएमवीएन कर्मचारी महासंघ के वरिष्ठ नेता दिनेश गुरुरानी का कहना है कि महासंघ ने फैक्ट्री को बचाने के लिए आवाज उठाई मगर लीसा आवंटन की नीति में बदलाव से फैक्ट्री को जरूरत के मुताबिक लीसा नहीं मिला। इसके चलते मुनाफा और स्थानीय लोगों को रोजगार देने वाली इस फैक्ट्री में ताले लटक गए।
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गोपाल दत्त का कहना है कि उद्यमिता को लेकर जमीनी स्तर पर खास कुछ नहीं हो रहा है। जितनी योजनाएं घोषित की गई हैं उनमें से ज्यादातरों में क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। इससे नौजवानों को रोजगार देने के अवसर बढ़ नहीं पा रहे हैं। कैलाश जोशी का कहना है कि उद्यमिता के क्षेत्र में एलान बहुत हुए लेकिन जमीन पर अधिकतर योजनाओं का कोई असर नजर नहीं आ रहा है। जिले में न तो कोई नई फैक्ट्री लगी है और न ही उद्योगों का विस्तार हो रहा है।
निगम की जमीन पर हो रहे हैं ये गैर औद्योगिक काम
- जमीन के एक हिस्से में जिला अस्पताल खुला है।
-चाय की फैक्ट्री भी निगम की ही जमीन पर है।
- चंपावत तहसील के नए भवन का निर्माण भी इसी जमीन पर हो रहा है।
अंजाम तक नहीं पहुंचा उद्यमियों के साथ हुआ करार
जिले में उद्योगों को गति देने के लिए जिला प्रशासन और 19 उद्यमियों के बीच सितंबर 2018 में करार हुआ। इसके तहत 18.38 करोड़ रुपये की लागत से होटल, अंडा उत्पादन, बियर उत्पादन, स्कूलों के जूते, आटा मिल, सोयाबड़ी, मिनिरल वाटर, बैटरी वाटर, ग्रीन फोडर, मिल्क प्रोडेक्ट, सभी प्रकार के मसाले, कुक्कुट उत्पादन आदि औद्योगिक इकाइयों का गठन होना था जिससे 138 लोगों को रोजगार मिलना था। अभी इनमें से ज्यादातर में शुरुआती दौर का काम भी नहीं हुआ है।
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80 के दशक में चीड़ बाहुल्य चंपावत में 230 नाली जमीन पर खुली केएमवीएन की रोजिन टरपंटाइन फैक्ट्री भी करीब 14 साल पहले बंद हो गई। इस फैक्ट्री को दुबारा शुरू करने की निगम की कोई योजना भी नहीं है। फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मियों को गैस, पर्यटक आवास गृह सहित निगम की दूसरी इकाइयों में समायोजित किया जा चुका है। वहीं लाखों रुपये की मशीनें जंक खा रही हैं।
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केएमवीएन कर्मचारी महासंघ के वरिष्ठ नेता दिनेश गुरुरानी का कहना है कि महासंघ ने फैक्ट्री को बचाने के लिए आवाज उठाई मगर लीसा आवंटन की नीति में बदलाव से फैक्ट्री को जरूरत के मुताबिक लीसा नहीं मिला। इसके चलते मुनाफा और स्थानीय लोगों को रोजगार देने वाली इस फैक्ट्री में ताले लटक गए।
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गोपाल दत्त का कहना है कि उद्यमिता को लेकर जमीनी स्तर पर खास कुछ नहीं हो रहा है। जितनी योजनाएं घोषित की गई हैं उनमें से ज्यादातरों में क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। इससे नौजवानों को रोजगार देने के अवसर बढ़ नहीं पा रहे हैं। कैलाश जोशी का कहना है कि उद्यमिता के क्षेत्र में एलान बहुत हुए लेकिन जमीन पर अधिकतर योजनाओं का कोई असर नजर नहीं आ रहा है। जिले में न तो कोई नई फैक्ट्री लगी है और न ही उद्योगों का विस्तार हो रहा है।
निगम की जमीन पर हो रहे हैं ये गैर औद्योगिक काम
- जमीन के एक हिस्से में जिला अस्पताल खुला है।
-चाय की फैक्ट्री भी निगम की ही जमीन पर है।
- चंपावत तहसील के नए भवन का निर्माण भी इसी जमीन पर हो रहा है।
अंजाम तक नहीं पहुंचा उद्यमियों के साथ हुआ करार
जिले में उद्योगों को गति देने के लिए जिला प्रशासन और 19 उद्यमियों के बीच सितंबर 2018 में करार हुआ। इसके तहत 18.38 करोड़ रुपये की लागत से होटल, अंडा उत्पादन, बियर उत्पादन, स्कूलों के जूते, आटा मिल, सोयाबड़ी, मिनिरल वाटर, बैटरी वाटर, ग्रीन फोडर, मिल्क प्रोडेक्ट, सभी प्रकार के मसाले, कुक्कुट उत्पादन आदि औद्योगिक इकाइयों का गठन होना था जिससे 138 लोगों को रोजगार मिलना था। अभी इनमें से ज्यादातर में शुरुआती दौर का काम भी नहीं हुआ है।