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आजादी की जंग की याद आते ही बढ़ा जोश

Mon, 15 Aug 2016 12:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर।
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर। Updated Mon, 15 Aug 2016 12:16 AM IST
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War of independence
राम दत्‍त जोशी - फोटो : अमर उजाला

बागेश्वर। दुग नाकुरी तहसील के अक्सोड़ा लेसानी गांव निवासी महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित राम दत्त जोशी अब 101 बसंत देख चुके हैं। उनमें राष्ट्रभक्ति का गजब का जज्बा है। आजादी के जंग की याद आते ही उनकी बांहें आज भी वैसे फड़कने लगती हैं। भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने के लिए वह सेंट्रल जेल बरेली में बंद रहे। वहां उन्हें कई यातनाएं सहनी पड़ी। 10 दिन तक भोजन भी नहीं मिला। 

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अक्सोड़ा लेसानी के आजाद हिंद फौज के प्रथम युद्ध के सेनानी कमला पति जोशी के पुत्र राम दत्त जोशी का 15 जनवरी 1915 को हुआ था। उन्होंने पांचवीं की पढ़ाई गांव के प्राइमरी स्कूल जबकि जूनियर हाईस्कूल की पढ़ाई कांडा से पूरी की। उनमें राष्ट्रभक्ति का जज्बा बचपन से ही भरा था। सितंबर 1930 में रानीखेत निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जय दत्त वैला के संपर्क में आ गए। उन्हीं से उन्हें स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से जुड़ने की प्रेरणा मिली।
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जोशी बताते हैं कि उन्होंने उसी साल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निर्देशन पर बनलेख क्षेत्र से जुड़े गांवों में 10 दिन का सत्याग्रह आंदोलन चलाया। अंग्रेज हुक्मरानों ने आंदोलन बंद करने के लिए उन पर दबाव डाला लेकिन वह नहीं माने। वह गिरफ्तार करना चाहते थे लेकिन जेल की व्यवस्था न होने के कारण उन पर हाथ नहीं डाल सके। वर्ष 1940 में वह रोजगार की तलाश के लिए हल्द्वानी चले गए। उनका कांग्रेस कार्यालय से संपर्क हो गया और सत्याग्रह आंदोलन से जुड़ गए।
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दूसरे साल मार्च में उन्हें चार महीने के लिए संपूर्णानंद जेल में डाल दिया। न्यायालय ने उन्हें 25 जुलाई 1942 को डीआईआर के तहत एक साल की सजा सुनाकर बरेली सेेंट्रल जेल भेजने का फरमान सुनाया। वहां उन्हें 10 दिन तक भोजन पानी तक नहीं दिया गया। काफी दुर्व्यवहार किया गया। लोहे के तसले बजा बजाकर जेलकर्मियों की नींद हराम की। इसी के बाद उन्हें भोजन दिया गया। उनका कैदी नंबर 4422 था।  

सजा काटने के बाद उन्हें डीआईआर की धारा 129 के तहत 10 दिन और जेल में ही रोका गया। इसके बाद वह पंडित जवाहर लाल नेहरू से मिलने इलाहाबाद चले गए। नेहरू जी ने उन्हें गांधी से मिलने के लिए दिल्ली भेज दिया। गांधी जी ने उन्हें गांधी आश्रम के संचालक विचित्रानंद के पास भेजकर आश्रम का काम देखने का निर्देश दिया। आजादी के कुछ समय बाद गांधी जी हत्या के बाद देश में ऊहापोह की स्थिति हो गई।

उन्होंने रानीखेेत आकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देवकीनंदन पांडे की भारत सेवक समाज से जुड़कर पर्वतीय क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया। हरित क्रांति योजना के तहत साधन सहकारी समिति बागेश्वर 1972 से 76 तक जुड़े रहे। बनलेख क्षेत्र का विकास, तहसील, डिग्री कॉलेज, सड़क के लिए लगातार काम किए। उन्होंने लोगों से देश की रक्षा के लिए हमेशा सजग रहने की सीख दी है।


उनके पांव में फ्रैक्चर है। बगैर सहारे चल नहीं पाते। कानों से भी वह कम ही सुनते हैं। उनके तीन पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र गणेश जोशी अवकाश प्राप्त प्रधानाचार्य, दूसरे पुत्र यहां सिंचाई खंड में सींचपाल और तीसरे पुत्र पूरन चंद्र जोशी शोबन सिंह जीना बेस अस्पताल हल्द्वानी में चीफ फार्मेसिस्ट हैं।

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