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स्वाधीनता आंदोलन में सरला बहन का योगदान भुलाया नहीं जा सकता
महेश पाठक/अमर उजाला ब्यूरो, धरमघर (बागेश्वर)।
Updated Wed, 05 Apr 2017 01:04 AM IST
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हिमदर्शन कुटीर धरमघर
- फोटो : अमर उजाला
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महेश पाठक
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धरमघर (बागेश्वर)। इंग्लैंड में जन्मी और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रिय शिष्या प्रख्यात सरला बहन ने देश की आजादी में जो योगदान दिया उसे कृतज्ञ राष्ट्र कभी भी नहीं भूल सकता। अंग्रेजों की भूमि इंग्लैंड की रहने वाली सरला बहन का कूर्मांचल की भूमि से खास लगाव था। उसमें भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण साल धरमघर में ही बीता।
पांच अप्रैल 1901 को इंग्लैंड में पैदा हुई मिस कैथरीन हाईलामैन गांधी से प्रभावित होकर सन 1932 में भारत आई और यहीं की होकर रह गई। वह आठ साल तक गांधी जी के सानिध्य में रही। राष्ट्रपिता ने उन्हें सरला नाम दिया। गांधी जी के निर्देशन पर उन्होंने महाराष्ट्र के सेवाग्राम में आश्रम की स्थापना की। वर्ष 1941 में अचानक उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। गांधी जी ने उनकी हालत देखते हुए उन्हें चनौदा (अल्मोड़ा) आश्रम जाने की सलाह दी।
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इसी दौर में वह आश्रम के संचालक शांति लाल त्रिवेदी के साथ पहाड़ के भ्रमण को निकली। वर्ष 1946 में उन्होंने मिलम ग्लेशियर की पैदल यात्रा की। उन्होंने गांधी जी की आज्ञा से वर्ष 1947 में पहाड़ों की रानी कौसानी में बालिकाओं की शिक्षा के लिए लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की। सरला बहन में भारत भक्ति का गजब का जज्बा था। उन्होंने अपने ही देश की सरकार के खिलाफ आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
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आजादी के लिए दो बार जेल भी गई। गोरी हुकूमत ने तब उन्हें एक खतरनाक महिला का तमगा दे रखा था। धरमघर में उनके कदम 1975 में पड़े। उन्होंने यहां हिमदर्शन कुटीर की स्थापना कि और इसी को अपनी कर्मभूमि बनाया। शारदा विदुषी बताती हैं कि सरला बहन ने 22 पुस्तकें लिखी थी। इसमें से संरक्षण या विनाश, वन और मानव पुस्तक की रचना धरमघर में ही की। आठ जुलाई 1982 को नैनीताल से अल्मोड़ा आते समय उनका निधन हो गया।
धरमघर(बागेश्वर)। वह आचार्य विनोबा भावे के भूदान, ग्राम दान आंदोलन से जुड़ी रही। देश की आजादी और अच्छे समाज के निर्माण में दिए गए योगदान पर सरला बहन को प्रतिष्ठित जमुना लाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन पुरस्कार में मिली एक लाख रुपये कि धनराशि को उन्होंने समाज सेवा के काम में लगा दिया।