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Bageshwar News: पैसिया के आंगन में सन्नाटे की दस्तक, नलों में पानी पर पीने वाला कोई नहीं

Thu, 05 Mar 2026 11:01 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर Updated Thu, 05 Mar 2026 11:01 PM IST
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Silence descends on Paisia's courtyard, taps ooze water but no one to drink it.
बागेश्वर। जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर का सफर और फिर एक किलोमीटर की वह पथरीली, उबड़-खाबड़ चढ़ाई पार कर जब आप पैसिया गांव की दहलीज पर कदम रखते हैं, तो विकास के दावों की कलई खुलते देर नहीं लगती। यह गांव आज उत्तराखंड के उन घोस्ट विलेज की फेहरिस्त में शामिल होने की कगार पर है, जहां सुविधाएं तो कागजों पर पहुंच गईं, लेकिन उन्हें बरतने वाले हाथ अब शहरों की भीड़ में कहीं खो गए हैं। गांव के हर घर के बाहर जल जीवन मिशन के तहत चमचमाते नल तो लगे हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि उन नलों से टपकते पानी को पीने वाला अब कोई नहीं बचा। घर के आंगनों में आज भी वे खूंटे गड़े हुए हैं, जहाँ कभी दर्जनों मवेशी बंधा करते थे और दूध-दही की भरमार हुआ करती थीं। आज उन खूंटों पर केवल सन्नाटा बंधा है। पेड़ों पर लदे रसीले फल नीचे गिरकर सड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें तोड़ने वाला बचपन और सहेजने वाली जवानी अब इस पथरीली डगर को छोड़कर जा चुकी है।
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अपनों और विकास की तलाश में पहरेदार
पैसिया गांव में 10 साल पहले तक 35 से 40 परिवार निवास करते थे। वर्तमान में कई परिवार यहां से पलायन कर चुके हैं अधिकांश घरों में केवल बुजुर्ग घरों के पहरेदारी भर कर रहे हैं। जो मौका मिलते ही गांव छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
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कोट
घर के बाहर नल लग गया, पर प्यास बुझाने वाला बेटा शहर चला गया। अब इन नलों का क्या करें जब आंगन में किलकारियां ही नहीं गूंजतीं।

ईश्वरी दत्त (53 वर्ष), ग्रामीण

खूंटे आज भी गड़े हैं, पर गाय-भैंस पालने की हिम्मत अब इस ढलती उम्र में नहीं रही। सड़क होती तो शायद दूध बाजार तक जाता और बच्चे यहीं रुक जाते।

.....प्रयाग दत्त पांडेय (65 वर्ष)


पेड़ों पर फल लदे हैं, पर उन्हें खाने वाला कोई नहीं। बंदर और जंगली जानवर ही अब इस गांव के असली वारिस बन गए हैं। हम तो बस इस वीराने की रखवाली कर रहे है।
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.....पुष्पा भट्ट (45 वर्ष)



सरकार ने नल दे दिया, बिजली दे दी, पर सड़क देना भूल गई। बिना सड़क के इस एक किलोमीटर की चढ़ाई ने हमारे पूरे गांव को ही उजाड़ कर रख दिया।

......हरूली देवी (70 वर्ष), ग्रामीण

कमल कांडपाल
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