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खदानों पर एनजीटी की टेड़ी नजर
अमर उजाला ब्यूरो बागेश्वर
Updated Sat, 18 Mar 2017 10:37 PM IST
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बागेश्वर में खड़िया खनन करती मशीन।
- फोटो : अमर उजाला
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मानकों की अनदेखी करने वाली खड़िया खदानों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने टेड़ी निगाहें कर दी हैं। शिकायत मिलने के बाद केंद्र सरकार की टीम ने खदानों का दौरा कर संयुक्त रिपोर्ट तैयार कर ली है। यदि खड़िया खनन के मानकों में किसी तरह की खामियां पाई जाती हैं तो जिले की कई खड़िया खदानें बंद हो सकती हैं।
बागेश्वर जिले में खड़िया खनन का बड़ा कारोबार है। इस समय जिले में लगभग 67 खड़िया की खानें हैं। इन खानों से हर साल तीन लाख टन सोप स्टोन निकाला जाता है। खड़िया के कारोबार का सालाना टर्नओवर 150 करोड़ का है। खड़िया से बीस हजार लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है। इसके अलावा हर साल सरकार को भी लगभग 20 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता है, लेकिन दूसरा पहलू यह है कि पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण खड़िया खनन से पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुंच रही है। आबादी से दूर खेतों से शुरू होने वाला खनन पिछले एक दशक में कई जगहों पर घरों के करीब तक पहुंच गया है। खड़िया खनन में मशीनों का प्रयोग हो रहा है।
कुछ खदानों में मानकों के विपरीत खनन की शिकायतें हर साल प्रशासन तक पहुंचती रहती हैं। खनन कारोबारियों द्वारा खानें स्वीकृत कराने के लिए मृत लोगों के नाम तक की एनओसी देने की शिकायतें भी आ चुकी हैं। खड़िया खनन में मानकों की अनदेखी करने की शिकायत अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक पहुंच गई है। एनजीटी ने इसे गंभीरता से लिया है। एनजीटी के निर्देश पर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सोइल एंड वाटर कंजरवेसन, इंडियन ब्यूरो ऑफ माइनिंग, आईआईटी रुड़की, सेंट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड नई दिल्ली, इंडियन काउंसिल ऑफ फारेस्ट्री रिसर्च एंड एजूकेशन और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सीनियर साइंटिस्ट वाली सात सदस्यीय टीम ने जिले भर में चल रही खड़िया खदानों का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार कर ली है।
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सूत्रों के अनुसार सात सदस्यीय टीम खड़िया खदान के कारण पर्यावरण और वनों को होने वाले नुकसान, भूस्खलन की संभावनाएं, पेयजल स्रोत सूखने, मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव, खनन में मशीनों के प्रयोग से होने वाले नुकसान सहित कई अन्य बिंदुओं पर तैयार इस जांच रिपोर्ट को एनजीटी को सौंपेगी। सूत्र बताते हैं कि यदि खड़िया खनन में मानकों की अनदेखी पाई जाती है तो कई खदानें बंद हो जाएंगी। इसके अलावा खड़िया खनन के खिलाफ कुछ मामलों में हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं भी दायर की गई हैं। जिन पर सुनवाई चल रही है।
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बागेश्वर जिले में खड़िया खनन का बड़ा कारोबार है। इस समय जिले में लगभग 67 खड़िया की खानें हैं। इन खानों से हर साल तीन लाख टन सोप स्टोन निकाला जाता है। खड़िया के कारोबार का सालाना टर्नओवर 150 करोड़ का है। खड़िया से बीस हजार लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है। इसके अलावा हर साल सरकार को भी लगभग 20 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता है, लेकिन दूसरा पहलू यह है कि पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण खड़िया खनन से पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुंच रही है। आबादी से दूर खेतों से शुरू होने वाला खनन पिछले एक दशक में कई जगहों पर घरों के करीब तक पहुंच गया है। खड़िया खनन में मशीनों का प्रयोग हो रहा है।
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कुछ खदानों में मानकों के विपरीत खनन की शिकायतें हर साल प्रशासन तक पहुंचती रहती हैं। खनन कारोबारियों द्वारा खानें स्वीकृत कराने के लिए मृत लोगों के नाम तक की एनओसी देने की शिकायतें भी आ चुकी हैं। खड़िया खनन में मानकों की अनदेखी करने की शिकायत अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक पहुंच गई है। एनजीटी ने इसे गंभीरता से लिया है। एनजीटी के निर्देश पर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सोइल एंड वाटर कंजरवेसन, इंडियन ब्यूरो ऑफ माइनिंग, आईआईटी रुड़की, सेंट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड नई दिल्ली, इंडियन काउंसिल ऑफ फारेस्ट्री रिसर्च एंड एजूकेशन और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सीनियर साइंटिस्ट वाली सात सदस्यीय टीम ने जिले भर में चल रही खड़िया खदानों का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार कर ली है।
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सूत्रों के अनुसार सात सदस्यीय टीम खड़िया खदान के कारण पर्यावरण और वनों को होने वाले नुकसान, भूस्खलन की संभावनाएं, पेयजल स्रोत सूखने, मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव, खनन में मशीनों के प्रयोग से होने वाले नुकसान सहित कई अन्य बिंदुओं पर तैयार इस जांच रिपोर्ट को एनजीटी को सौंपेगी। सूत्र बताते हैं कि यदि खड़िया खनन में मानकों की अनदेखी पाई जाती है तो कई खदानें बंद हो जाएंगी। इसके अलावा खड़िया खनन के खिलाफ कुछ मामलों में हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं भी दायर की गई हैं। जिन पर सुनवाई चल रही है।