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Bageshwar News: कपकोट के लोगों ने 200 साल से संजो रखी होली की परंपरा
Sun, 24 Mar 2024 11:12 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Sun, 24 Mar 2024 11:12 PM IST
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मथुरा से चीर लेकर आए थे बुजुर्ग
महेश गढि़या
कपकोट (बागेश्वर)। कपकोट में होली का इतिहास करीब 200 साल पुराना है। क्षेत्र के लोग आज भी होली की परंपरा को पूरी सिद्दत के साथ संजोये हुए हैं। कपकोट के 102 वर्षीय बुजुर्ग नारायण सिंह कपकोटी बताते हैं कि होली का कोई लिखित इतिहास नहीं है, लेकिन होली की परंपरा करीब 200 साल पुरानी बताई जाती है। बुजुर्ग बताते थे कि पूर्वज मथुरा से चीर लेकर आए थे। तब से होली मनाई जाती है।
कपकोट में होली का चीर बंधन 200 वर्षों से आणु में स्वर्गीय ईश्वरी दत्त जोशी पुत्र स्वर्गीय राम दत्त जोशी के परिवार के आंगन जिसको अखाड़ा नाम दिया गया, वहीं पर होता है। दो सौ साल से इसी अखाड़े (आंगन) में चीर बंधन होता आया है।
रंग भरणी एकादशी के दिन होली के अखाड़े में चीर बंधन के बाद बैठक होली गायन शुरू होता है, जो छलड़ी तक बदस्तूर जारी रहता है। एकादशी को आणू के जोशी परिवार के जगदीश चंद्र जोशी, विपिन चंद्र जोशी, बसंत बल्लभ जोशी के साथ ही सभी जोशी परिवारों के घर पर होली होती है। दूसरे दिन लीलाधर उपाध्याय के घर से शुरू होकर चखतरी के बिष्ट परिवार, भंडारी गांव, बुधेश्वर मंदिर, पुल बाजार से होकर सिलकानी जाती है। तीसरे दिन कपकोट गांव में बैठक होली गायन होता है।
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चतुर्दशी के दिन शिवालय मंदिर से शुरू होकर पनौरा स्थित ईश्वरीय माई मंदिर में होली गायन होता है। पुरातन काल से ही पनौरा स्थित यह मंदिर सामूहिक होली गायन और मिलन का मुख्य पड़ाव बना हुआ है।
इनसेट
कर्मचारी भी करते थे शिरकत
बागेश्वर। 78 वर्षीय सेवानिवृत्त अध्यापक विपिन चंद्र जोशी बताते हैं कि पुराने समय में कपकोट में कार्यरत सरकारी कर्मचारी भी पनौरा स्थित ईश्वरी माई मंदिर में आयोजित होली में शिरकत करते थे। 68 वर्षीय अध्यापक दयाल चंद्र जोशी बताते हैं कि पहले रात्रि होली गायन की परंपरा भी थी जो वर्तमान में कुछ परिस्थितियों के कारण बंद हो गई है।
इनसेट
बुजुर्ग स्वयं बनाते थे होली गीत
बागेश्वर। सेवानिवृत्त अध्यापक विपिन चंद्र जोशी बताते हैं कि होली गायन के कोई लिखित बोल नहीं हैं, लेकिन होली गायन में दक्ष लोग स्वर्गीय जनार्दन जोशी, खीमानंद जोशी सहित कई अन्य बुजुर्ग स्वयं होली गीत बना लेते थे। होली गीत शुरू से ही शिव, कृष्ण और श्रीराम की लीलाओं पर आधारित रहे हैं। आज भी शिवके मन माही बसे काशी , शिव गंग गई जगतारन को , कृष्ण मुरारी के दर्शन को जब विप्र सुदामा आये लला... आदि बोलों के साथ होली गाई जाती है।
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महेश गढि़या
कपकोट (बागेश्वर)। कपकोट में होली का इतिहास करीब 200 साल पुराना है। क्षेत्र के लोग आज भी होली की परंपरा को पूरी सिद्दत के साथ संजोये हुए हैं। कपकोट के 102 वर्षीय बुजुर्ग नारायण सिंह कपकोटी बताते हैं कि होली का कोई लिखित इतिहास नहीं है, लेकिन होली की परंपरा करीब 200 साल पुरानी बताई जाती है। बुजुर्ग बताते थे कि पूर्वज मथुरा से चीर लेकर आए थे। तब से होली मनाई जाती है।
कपकोट में होली का चीर बंधन 200 वर्षों से आणु में स्वर्गीय ईश्वरी दत्त जोशी पुत्र स्वर्गीय राम दत्त जोशी के परिवार के आंगन जिसको अखाड़ा नाम दिया गया, वहीं पर होता है। दो सौ साल से इसी अखाड़े (आंगन) में चीर बंधन होता आया है।
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रंग भरणी एकादशी के दिन होली के अखाड़े में चीर बंधन के बाद बैठक होली गायन शुरू होता है, जो छलड़ी तक बदस्तूर जारी रहता है। एकादशी को आणू के जोशी परिवार के जगदीश चंद्र जोशी, विपिन चंद्र जोशी, बसंत बल्लभ जोशी के साथ ही सभी जोशी परिवारों के घर पर होली होती है। दूसरे दिन लीलाधर उपाध्याय के घर से शुरू होकर चखतरी के बिष्ट परिवार, भंडारी गांव, बुधेश्वर मंदिर, पुल बाजार से होकर सिलकानी जाती है। तीसरे दिन कपकोट गांव में बैठक होली गायन होता है।
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चतुर्दशी के दिन शिवालय मंदिर से शुरू होकर पनौरा स्थित ईश्वरीय माई मंदिर में होली गायन होता है। पुरातन काल से ही पनौरा स्थित यह मंदिर सामूहिक होली गायन और मिलन का मुख्य पड़ाव बना हुआ है।
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कर्मचारी भी करते थे शिरकत
बागेश्वर। 78 वर्षीय सेवानिवृत्त अध्यापक विपिन चंद्र जोशी बताते हैं कि पुराने समय में कपकोट में कार्यरत सरकारी कर्मचारी भी पनौरा स्थित ईश्वरी माई मंदिर में आयोजित होली में शिरकत करते थे। 68 वर्षीय अध्यापक दयाल चंद्र जोशी बताते हैं कि पहले रात्रि होली गायन की परंपरा भी थी जो वर्तमान में कुछ परिस्थितियों के कारण बंद हो गई है।
इनसेट
बुजुर्ग स्वयं बनाते थे होली गीत
बागेश्वर। सेवानिवृत्त अध्यापक विपिन चंद्र जोशी बताते हैं कि होली गायन के कोई लिखित बोल नहीं हैं, लेकिन होली गायन में दक्ष लोग स्वर्गीय जनार्दन जोशी, खीमानंद जोशी सहित कई अन्य बुजुर्ग स्वयं होली गीत बना लेते थे। होली गीत शुरू से ही शिव, कृष्ण और श्रीराम की लीलाओं पर आधारित रहे हैं। आज भी शिवके मन माही बसे काशी , शिव गंग गई जगतारन को , कृष्ण मुरारी के दर्शन को जब विप्र सुदामा आये लला... आदि बोलों के साथ होली गाई जाती है।