{"_id":"5a1af2bf4f1c1b95188b663e","slug":"in-the-village-of-lahore-the-worship-of-lord-dev-is-known-as-nag-devta","type":"story","status":"publish","title_hn":"लाहुर गांव में नाग देवता के रूप में पूजे जाते हैं राजन देवता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लाहुर गांव में नाग देवता के रूप में पूजे जाते हैं राजन देवता
गणेश उपाध्याय /अमर उजाला, बागेश्वर।
Updated Sun, 26 Nov 2017 10:28 PM IST
विज्ञापन
लाहुर गांव स्थित राजन देवता का मंदिर।
- फोटो : amar ujala
विकास खंड कपकोट के सुदूरवर्ती लाहुर गांव स्थित भगवान राजन देव के मंदिर पर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था है। इस लोकदेव को ग्रामीण नाग देवता के रूप में पूजते हैं। मंदिर के पुजारी और देव डांगर पूजा के दौरान सिर्फ एक बार ही मंदिर के भीतर जाते हैं। मार्गशीर्ष महीने के नवरात्र पर मंदिर में विशेष पूजा के साथ ही क्षेत्र में मेला लगता है। दूर-दूर से लोग मेले में आते हैं। इस बार मेला 28 और 29 नवंबर को लगेगा।
विज्ञापन
मान्यता के अनुसार लाहुर ग्राम पंचायत में सदियों पहले राजन और भावचंद देवता रहते थे। वह सगे भाई थे। बड़े भाई राजन का गांव की पहाड़ी पर जबकि छोटे भाई भावचंद तलहटी पर रहते थे। तलहटी पर पानी का एक मनोरम कुंड था। एक दिन राजन की पत्नी ने अपने पति से कहा कि भावचंद सुंदर जगह रहते हैं और आप अभावग्रस्त पहाड़ी पर।
विज्ञापन
आप तलहटी पर क्यों नहीं रह सकते। इतना सुनकर राजन ने भावचंद पर तीर चला दिया। इससे उनका सिर, धड़ से अलग हो गया। तीर लगने से भावचंद देवता का सिर आगे-आगे और पानी का कुंड उनके पीछे-पीछे चलकर मुनस्यारी के भिपातल में रुक गया। उसी जगह भावचंद की पूजा होने लगी।
विज्ञापन
भावचंद के मुनस्यारी जाते ही राजन पहाड़ी से नीचे उतरकर तलहटी पर रहने लगे। तब गांव के किसी बुजुर्ग को सपने में घटना की सारी जानकारी हुई। गांव के सात भाईयों ने राजन देवता के मंदिर के निर्माण की बात सोची और इसके लिए उन्होंने 72 नाली भूमि का इंतजाम किया।
उन्होंने मंदिर के लिए पहाड़ी पर थुनेर के पेड़ों से सात लट्ठे तैयार किए। छह भाईयों ने तय किया कि पेड़ों को लेने के लिए दूसरी सुबह आएंगे जबकि सबसे छोटे भाई ने कहा कि जब भगवान राजन तलहटी में आ सकते हैं तो लट्ठे भी तो खुद ही यहां आ सकते हैं। दूसरी सुबह देखा तो पेड़ मंदिर के निर्माणस्थल पर पहुंचे हुए थे।
इस समय मंदिर के पुजारी भीम सिंह पांडा नियुक्त हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सूबेदार खीम सिंह पांडा कहते हैं कि मंदिर में पूजा के दौरान पुजारी सिर्फ एक बार लिपाई और दिया बत्ती के लिए जबकि देव डांगर लोटपोट करते हुए मंदिर के भीतर जाते हैं। वह पूजा लगाने के लिए ही मंदिर के भीतर जाते हैं। इसके बाद कोई भी अंदर नहीं जाता है। मंदिर में एक साल बलिदान तो दूसरे साल खीर का भोग लगता है। इस बार श्री भगवान को खीर का भोग लगेेगा।