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Holi: ढोलकाें की थाप और हजारों होल्यारों की आवाज से गूंज उठती थी बाबा की नगरी, अब नहीं दिखता पहले जैसा नजारा

Thu, 13 Mar 2025 01:47 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, बागेश्वर
अमर उजाला नेटवर्क, बागेश्वर Published by: हीरा मेहरा Updated Thu, 13 Mar 2025 01:47 PM IST
सार

बागनाथ मंदिर से बस स्टेशन, सरयू पुल और गोमती पुल तक लंबी कतार, सौ से अधिक ढोलकों की थाप और हजारों होल्यारों की बुलंद आवाज अब बीते समय की बात हो गई है। वर्तमान में 30 से 35 गांवों के होल्यार ही बागनाथ मंदिर में होली गायन करने आते हैं।

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huge crowd used to reach Bagnath temple On the occasion of Holi 2025
बागनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बागेश्वर जिले में बागनाथ मंदिर से बस स्टेशन, सरयू पुल और गोमती पुल तक लंबी कतार, सौ से अधिक ढोलकों की थाप और हजारों होल्यारों की बुलंद आवाज अब बीते समय की बात हो गई है। 40-45 साल पहले तक चतुर्दशी के दिन नगर अबीर-गुलाल के रंग में डूबा रहता था। बदलते समय में अलग-अलग कारणों से अनेक गांवों के होल्यारों ने बागनाथ मंदिर आना बंद कर दिया। वर्तमान में 30 से 35 गांवों के होल्यार ही बागनाथ मंदिर में होली गायन करने आते हैं।

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बागनाथ मंदिर में चतुर्दशी के दिन सामूहिक होली गायन का चलन सैकड़ों साल पुराना माना जाता है। हालांकि इसकी शुरूआत कब हुई, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। 1960 के दशक तक आधे जिले के होल्यार बागनाथ धाम आते थे। काफलीगैर तहसील के धूराफाट क्षेत्र की होली का बागनाथ मंदिर आना धीरे-धीरे कम हो गया लेकिन 80 के दशक तक कत्यूर पट्टी के द्यांगण से लेकर सिमार तक, कांडा क्षेत्र के घिंघारूतोला से लेकर नगर के मंडलसेरा तक, आरे गांव से लेकर दुग नाकुरी तक, बिलौना से खरही मंडल तक और टंगड़िया फाट के सभी गांवों से होल्यार बागनाथ मंदिर आते थे। 1992 से पूर्व तक बागनाथ में होली गायन के दौरान हजारों की संख्या में होल्यार पहुंचते थे। बाद के वर्षों में होल्यारों की संख्य कम होती गई। अब बमुश्किल आठ सौ से हजार होल्यार मंदिर में होली गायन करने पहुंचते हैं।

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चौक बाजार में भी नहीं दिखता पहले जैसा नजारा
चतुर्दशी के दिन सभी गांवों के होल्यार अलग-अलग मार्ग से चौक बाजार पहुंचते थे। यहां पर होल्यारों की टोली का संगम होता था। मंदिर में प्रवेश के लिए सब अपने-अपने ढोलक का दम दिखाते थे। इस प्रतिस्पर्द्धा में कई बार हालात बिगड़ने का डर रहता था। इसके बाद मंदिर में पहले प्रवेश करने वाली टोली का निर्धारण होली के समय प्रशासन की ओर से किया जाने लगा था। हालांकि अब होल्यार अलग-अलग टोली बनाकर ही मंदिर पहुंच जाते हैं। मंदिर में पहले प्रवेश के लिए न कोई प्रतिस्पर्द्धा होती है और न ढोलक का दम दिखाया जाता है।

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बचपन में भीड़ में खोने के डर से घरवाले चतुर्दशी के दिन बागेश्वर जाने नहीं देते थे। युवा होने के बाद 25-26 किमी पैदल चलकर चतुर्दशी के दिन होली गायन करने जाने लगे। बाद में बुजुर्गों की सहमति के बाद बागनाथ मंदिर जाने का रिवाज ही खत्म कर दिया। अब तो नशे ने होली का रंग ही बिगाड़ दिया है। आज भी उन सुनहरे दिनों की याद आती है। -चंद्र सिंह रावत, होल्यार, बोहाला

80 के दशक में सामूहिक होली में 100 से अधिक गांवों के हजारों होल्यार शामिल होते थे। उनके स्वागत में पूरा बाजार खुला रहता था। दुकानदार अबीर-गुलाल उड़ाकर होल्यारों का स्वागत करते थे। मंदिर में होली के साथ ढोल बजाने की प्रतियोगिता होती थी। नशे का प्रभाव बढ़ने से बागनाथ मंदिर में होली गायन का रिवाज भी हाशिये की तरफ जाने लगा है। -उमेश साह, व्यापारी/रंगकर्मी, बागेश्वर

बुजुर्ग होल्यार बताते हैं कि 1980 तक जब होल्यारों के दल नगर में प्रवेश करते तो ढोलकों की थाप से लोगों के खिड़की-दरवाजे तक आवाज करने लगते थे। होल्यारों का जोश उनकी गायकी में दिखता था। हमारे गांव के युवा आज भी बुजुर्गों के मार्गदर्शन में इस परिपाटी का पालन कर रहे हैं। हालांकि अन्य गांवों में होली के प्रति कम होता उत्साह चिंता बढ़ाने वाला है। -दीपक खेतवाल, युवा होल्यार, आरे

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