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बागीश्वर ने कत्यूरी, गोरखा, अंग्रेजों के शासन के किए हैं दीदार
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सरयू और गोमती के तट पर बसी बागेश्वर नगरी। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : BAGESHWAR
बागेश्वर। भगवान बागनाथ के बाघ के रूप में दर्शन देने से ही वर्तमान बागेश्वर का नाम बागीश्वर पड़ा। जो बाद में बागेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। बागेश्वर ने कत्यूरी राजवंश का शासन देखा, गोरखा और अंग्रेजों के राज के भी दीदार किए। अंग्रेजी काल में बागेश्वर को परगने का दर्जा मिला था। आजाद भारत में बागेश्वर को जिले का दर्जा हासिल है। आगामी 15 सितंबर को जिला 24वें वर्ष में प्रवेश कर जाएगा।
बागेश्वर का इतिहास प्राचीन है। ईसा की 7वीं शताब्दी में यहां कत्यूरी राजवंश का शासन था। 13वीं शताब्दी में कत्यूरी शासन के विघटन के बाद बागेश्वर बैजनाथ के कत्यूरी राजवंश के अधीन आ गया। वर्ष 1565 में राजा बालो कल्याण चंद ने पाली, बारामंडल, गंगोली के साथ ही इस क्षेत्र पर भी कब्जा कर इसे कुमाऊं में शामिल कर लिया। वर्ष 1602 में राजा लक्ष्मी चंद ने बागनाथ के मुख्य मंदिर और मंदिर समूह का पुनर्निर्माण किया था। वर्ष 1791 में कुमाऊं की राजधानी अल्मोड़ा पर नेपाल के गोरखाओं ने हमला कर कब्जा जमा लिया। इस क्षेत्र पर 24 वर्ष तक गोरखाओं का शासन रहा। वर्ष 1815-16 में गोरखाओं को ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों शिकस्त मिली और सुगौली की संधि के अनुपालन में कुमाऊं पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया। 15 अगस्त 1947 के बाद से बागनाथ की धरती भी देश के अन्य हिस्सों की तरह आजादी की सांस ले रही है।
बागेश्वर को 1974 में मिला था तहसील का दर्जा
बागेश्वर। प्रशासनिक सुविधा के लिए बागेश्वर को 1974 में तहसील का दर्जा मिला। वर्ष 1976 में परगना घोषित किया गया। परगने में दानपुर के 473, कमस्यार के 166, पुंगराऊ के 87, खरही पट्टी के 66 गांव शामिल थे। वर्ष 1985 से बागेश्वर को जिला घोषित करने की मांग मुखर होने लगी। जिले के लिए आंदोलन हुए। 15 सितंबर 1997 को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने बागेश्वर को जिले का दर्जा दे दिया।
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आजादी के आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा बागेश्वर
बागेश्वर। भगवान बागनाथ की धरती आजादी के आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा है। वर्ष 1921 के उत्तरायणी मेले में कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडेय, हरगोविंद पंत, श्याम लाल साह, विक्टर मोहन जोशी, राम लाल साह आदि के नेतृत्व में आंदोलनकारियों ने कुली बेगार के रजिस्टर बहा कर सरयू के तट पर इस प्रथा को समाप्त करने की शपथ ली थी। आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी जी का भी बागेश्वर में पदार्पण हुआ था।
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बागेश्वर का इतिहास प्राचीन है। ईसा की 7वीं शताब्दी में यहां कत्यूरी राजवंश का शासन था। 13वीं शताब्दी में कत्यूरी शासन के विघटन के बाद बागेश्वर बैजनाथ के कत्यूरी राजवंश के अधीन आ गया। वर्ष 1565 में राजा बालो कल्याण चंद ने पाली, बारामंडल, गंगोली के साथ ही इस क्षेत्र पर भी कब्जा कर इसे कुमाऊं में शामिल कर लिया। वर्ष 1602 में राजा लक्ष्मी चंद ने बागनाथ के मुख्य मंदिर और मंदिर समूह का पुनर्निर्माण किया था। वर्ष 1791 में कुमाऊं की राजधानी अल्मोड़ा पर नेपाल के गोरखाओं ने हमला कर कब्जा जमा लिया। इस क्षेत्र पर 24 वर्ष तक गोरखाओं का शासन रहा। वर्ष 1815-16 में गोरखाओं को ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों शिकस्त मिली और सुगौली की संधि के अनुपालन में कुमाऊं पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया। 15 अगस्त 1947 के बाद से बागनाथ की धरती भी देश के अन्य हिस्सों की तरह आजादी की सांस ले रही है।
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बागेश्वर को 1974 में मिला था तहसील का दर्जा
बागेश्वर। प्रशासनिक सुविधा के लिए बागेश्वर को 1974 में तहसील का दर्जा मिला। वर्ष 1976 में परगना घोषित किया गया। परगने में दानपुर के 473, कमस्यार के 166, पुंगराऊ के 87, खरही पट्टी के 66 गांव शामिल थे। वर्ष 1985 से बागेश्वर को जिला घोषित करने की मांग मुखर होने लगी। जिले के लिए आंदोलन हुए। 15 सितंबर 1997 को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने बागेश्वर को जिले का दर्जा दे दिया।
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आजादी के आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा बागेश्वर
बागेश्वर। भगवान बागनाथ की धरती आजादी के आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा है। वर्ष 1921 के उत्तरायणी मेले में कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडेय, हरगोविंद पंत, श्याम लाल साह, विक्टर मोहन जोशी, राम लाल साह आदि के नेतृत्व में आंदोलनकारियों ने कुली बेगार के रजिस्टर बहा कर सरयू के तट पर इस प्रथा को समाप्त करने की शपथ ली थी। आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी जी का भी बागेश्वर में पदार्पण हुआ था।